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सपनों के टूटने का,भ्रमजाल के बिखरने का दौर मैनेजमेंट कोर्सेज का बुलबुला फूटा

खरी-खरी            Aug 31, 2019


हेमंत कुमार झा।
अधिक वक्त नहीं बीता जब छोटे-बड़े शहरों की गलियों में फलाना इंस्टीच्यूट ऑफ मैनेजमेंट के इतने सारे बोर्ड टँगने लगे थे कि लगने लगा कि अब कम से कम पैसे वालों की संतानों का हाकिम बनना पक्का। न सही सरकारी, प्राइवेट जॉब की अफसरी भी बुरी नहीं।

संस्थानों के बड़े-बड़े विज्ञापन, अधिकतर में कैम्पस प्लेसमेंट की गारंटी। अब क्या चाहिये? मुक्ति का मार्ग मिल गया। बीबीए, एमबीए में दाखिला लो, गिटिर-पिटिर ही सही, थोड़ी-बहुत अंग्रेजी बोलना सीख लो, जिनके लिये अलग से गली-मुहल्लों में 'इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स' के न जाने कितने बोर्ड टँगे हैं।

इधर पढ़ाई पूरी, उधर नौकरी का ऑफर। बन जाओ मैनेजर। फिर तो जलवे।

किसान पिता ने खेत बेचा, नौकरी करने वाले पिता ने लोन लिया, लाइन से भटका बेटा मोटा माल लेकर दाखिले की लाइन में लगा। चमचमाते कैम्पस, एसी क्लास रूम्स में टाई लगाए, अंग्रेजी बोलते फैकल्टीज को देख कर वह संभ्रम में रहा कि बहुत भारी कोर्स वो कर रहा है कि बाहर निकलने की देर है, नौकरियां तो उसके सामने बिछती सी आएंगी।

फिर कोर्स की मियाद पूरी होते-होते वह किसी लायक नहीं रह गया। जितने पैसे प्रतिमाह उसका पिता उसको भेजता रहा उतने प्रतिमाह की नौकरी भी उसे नहीं मिली। कितनों को तो कोई नौकरी ही नहीं मिली। कैम्पस सेलेक्शन में 'सेलेक्ट' होने वालों का भ्रम तब टूटा जब उनमें से अधिकतर ने अपने को किसी मसाला कम्पनी के सेल्स मैन के रूप में सड़कों पर भटकते पाया।

बुलबुला फूटने लगा। मैनेजमेंट कोर्सेज में दाखिले की लंबी लाइनें छोटी होने लगी। संस्थान बंद होने लगे।

एक पूरी पीढ़ी इस भ्रमजाल में उलझ कर रह गई। जब तक भ्रम टूटता, विकल्पहीनता सामने खड़ी थी। रोजगार के अभाव में कुछ भी, कैसी भी नौकरी करने की बेबसी, जिनमें एक आदमी के ठीक से रहने-खाने लायक का वेतन भी नहीं। शोषण की कोई इंतेहा नहीं, मानवीय गरिमा के बचे रहने का कोई सवाल नहीं।

90 प्रतिशत प्राइवेट प्रबंधन संस्थानों की फीस चाहे जितनी हो, बाहरी आडम्बर चाहे जितने हों, उनकी शिक्षा की गुणवत्ता किसी लायक नहीं थी। इसलिये उनसे निकले अधिकतर छात्र किसी लायक नहीं हो पाए। नतीजा, ऐसे अधिकतर संस्थानों के मालिकों ने अब मल्टीप्लेक्स खोल लिए हैं, मॉल में निवेश किया है।

भले ही उनके छात्र किसी लायक नहीं बन पाए, मालिकों ने तो अकूत कमाई कर ही डाली। अब पूंजी का क्या है, कल कॉलेज चलाने में लगाई थी, धंधा मंदा पड़ने लगा तो अब उसी पूंजी को मल्टीप्लेक्स में लगाएंगे। लक्ष्मी तो वैसे भी चंचला कही जाती हैं। उन्हें घुमाते-फिराते रहना चाहिए।

फिर इंजीनियरिंग संस्थानों का बुलबुला फूटने का दौर आया। यहां भी वही आलम। प्राइवेट संस्थानों के चमकदार कैम्पस, भ्रमित कर देने वाला माहौल, पैसे का खेल, शिक्षा-परीक्षा की गुणवत्ता से कोई मतलब नहीं। हर साल निकलते असंख्य इंजीनियरिंग स्नातक।

लेकिन, रोजगार के बाजार में अधिकतर इंजीनियरिंग स्नातक नाकारा साबित हुए। फिर वही बेबसी या तो बेरोजगार होकर घर बैठो या फिर कुछ भी, कैसी भी नौकरी। फिर वही अमानवीय शोषण का सिलसिला।

कोढ़ में खाज की तरह 'एसोचैम' ( एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) का वह बहुचर्चित वक्तव्य कि भारत के 75 प्रतिशत इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट स्नातक नौकरी देने के लायक नहीं। बेरोजगार स्नातकों के मनोबल को तोड़ने वाले इस वक्तव्य के बाद कोई संशय नहीं रह गया कि प्राइवेट प्रबंधन और इंजीनियरिंग कॉलेजों ने इस देश में कौन सा खेल खेला है।

शिक्षा चाहे जिस भी क्षेत्र की हो, गुणवत्ता उसकी पहली शर्त्त है। वरना सबकुछ बेमानी है। भारत में अधिकांश प्राइवेट संस्थानों ने अगर सबसे अधिक उपेक्षा किसी चीज की की तो वह शिक्षा की गुणवत्ता ही थी।

मुनाफा अगर प्राथमिक और अंतिम उद्देश्य हो तो फिर कुछ और नहीं सूझता। कम पैसे पर अयोग्य फैकल्टीज रख लो, जो फैकल्टीज कम दलाल की भूमिका अच्छे से निभा सकें। प्रैक्टिकल परीक्षाओं में मनमाने नम्बर दे दो भले ही लड़के ने कभी प्रैक्टिकल क्लास में झांकने की जहमत भी न उठाई हो। रिजल्ट अच्छा होना चाहिये ताकि लड़के के बाप को लगे कि पीएफ से लोन लेना या जमीन बेचना सफल रहा। अब तो लड़के की ज़िंदगी बन जाएगी। अच्छा दहेज तो बोनस है ही।

सपनों के टूटने का, भ्रमजाल के बिखरने का दौर है यह।

महाराष्ट्र, जो कि प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों का गढ़ है, में ऐसे कालेजों की 70 प्रतिशत से अधिक सीटें नामांकन के अभाव में खाली जा रही हैं। कर्नाटक सहित देश के अन्य राज्यों में भी यही हाल है।

तो भविष्य की महाशक्ति बनने का दावा करने वाले देश में तकनीकी शिक्षा का हाल सामने है। तकनीकी शिक्षा प्राप्त बेरोजगारों के मामले में यह देश अव्वल है।

पर ऐसे प्राइवेट संस्थानों के उन मालिकों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिन्होंने मुनाफा कमाने की अंधी दौड़ में तमाम नैतिकताओं और कानूनों को ताक पर रख कर लाखों युवकों का जीवन बर्बाद किया। आज वे संस्थानों को बंद कर रहे हैं और पूंजी समेट कर किसी अन्य बिजनेस में लगाने की जुगत लगा रहे हैं।

कायदे से उन संस्थानों की तमाम परिसंपत्तियों की नीलामी कर उन्हें जब्त कर लेना चाहिये। यह मैसेज जाना चाहिये कि शिक्षा के प्राइवेटीकरण का यह मतलब कदापि नहीं कि किसी को इस नाम पर दुकानें खोलने और ठगने का लाइसेंस मिल गया।

लेकिन ऐसा नहीं होगा। अरविंद केजरीवाल की बात याद आती है सब मिले हुए हैं जी।

लेखक पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय में एसोशिएट प्रोफेसर हैं।

 


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