मप्र में अगले 3 महीने किसान, कमल, मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल भरे

खास खबर            Jun 17, 2019


राघवेंद्र सिंह।
मध्यप्रदेश में आने वाले तीन महीने किसान, मुख्यमंत्री कमलनाथ और प्रदेश भाजपा के लिए मुश्किल भरे हैं। चुनाव हो चुके हैं, पार्टी और प्रत्याशी अब आराम फरमा रहे हैं। लेकिन ऐसे में धान, सोयाबीन और मक्का जैसी खरीफ की फसल लगाने की तैयारी किसान कर रहा है और इस बार बिजली के जो हालात हैं, उसे लेकर कमलनाथ सरकार कसौटी पर है।

बारिश शुरू होते ही देहात में बिजली के खंभे गिरने और तार टूटने की घटनाएं बढ़ जाएंगी। ऐसे में ट्रांसफॉर्मर भी फुंक जाते हैं।

यही मौका होता है धान की रोप लगाने का। अगर बिजली नहीं मिली तो किसानों का धीरज टूटेगा और फसलों के तबाह होने की स्थिति में गर्मी में उबल रहा किसान सड़क पर आएगा।

ऐसे सीन जुलाई-अगस्त में ज्यादा देखने को मिलेंगे। चूंकि मंडी चुनाव भी अभी होने के आसार नहीं हैं इसलिए भाजपा भी किसानों के लिए संघर्ष करने की बजाय खामोशी से कांग्रेस की कमल सरकार को बदनाम होता हुआ देखेगी।

मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी सरकार के शुरुआती दिनों से ही संघर्ष में फंस गए हैं। इसका आरंभ किसान कर्जमाफी के मुद्दे से हुआ था जिसे भाजपा ने लोकसभा चुनाव के चलते खूब उछाला।

अभी कमल सरकार किसानों के बीच कर्जमाफी के अपयश से उबर भी नहीं पाई थी कि गांव-देहात में बिजली आपूर्ति का संकट मुंह बाये खड़ा हो गया है। बारिश पूर्व मेंटेनेंस नहीं होने के कारण सरकार असहाय है।

जुबानी जंग में कांग्रेस बिजली आपूर्ति संकट के लिए भाजपा और अधिकारियों को दोषी ठहरा रही है। लेकिन जैसे ही धान रोपने के लिए खेतों में बिजली की जरूरत महसूस होगी तब बिजली में बाधा किसानों को सड़क पर आने को मजबूर करेगी।

ट्रांसफॉर्मर, बिजली के खंभे और तारों का रखरखाव हालात देख युद्ध स्तर पर करने की जरूरत है। मगर मौके की नजाकत देखते हुए विभाग जागने की बजाय सो रहा है। कुल मिलाकर किसानों के लिए कमलनाथ सरकार और भाजपा फिर कसौटी पर है।

संकट में आए किसान की भाजपा हो सकता है रणनीति के तहत मदद न करे लेकिन इससे किसान अकेला पड़ जाएगा। भाजपा चाहती है कि परेशान किसान जी भरकर कांग्रेस को कोसे और फिर जब पानी सिर से ऊपर जाए तब सड़क पर संघर्ष के लिए वो मैदान में उतरे।

इधर मुख्यमंत्री कमलनाथ अधिकारियों से तालमेल बैठाने और मैदान में सरकार का इकबाल बुलंद करने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं।

फिलहाल इस काम में जरूरत के मुताबिक सफलता नहीं मिल रही है। दूसरी तरफ मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें पार्टी हाईकमान से भेंट नहीं होने की वजह से अटक गई है। अब यह मामला राज्य विधानसभा सत्र के बाद सुलझता हुआ नजर आएगा।

असल में कांग्रेस में गुटबाजी के चलते चार से छह मंत्रियों के हटाना और इतने ही नए मंत्रियों के शपथ दिलाना आसान काम नहीं है। इसके साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का चयन भी विधानसभा सत्र के बाद ही पटरी पर आता दिख रहा है।

हालांकि प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर मीनाक्षी नटराजन, बाला बच्चन, उमंग सिंघार, जीतू पटवारी के नाम सुर्खियों में हैं। महिला नेता को प्राथमिकता मिली तो मीनाक्षी बाजी मार सकती हैं।

मध्यप्रदेश भाजपा की सियासत में उलटफेर अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन के बाद होगा। नई घटना में प्रदेश भाजपा सदस्यता अभियान का काम विधायक अरविन्द भदौरिया को दोबारा सौंप दिया गया है।

पिछली बार भी उन्होंने इस दायित्व को निभाया था। भदौरिया उन नेताओं में हैं जो विद्यार्थी परिषद की टीम से भाजपा में आए थे और तत्कालीन संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी के साथ कदमताल करते हुए अपने कद में लगातार इजाफा कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय स्तर पर सदस्यता अभियान का प्रभारी बनाए जाने के साथ उन्हें राज्य की राजनीति से दूर करने के प्रबंध किए जा रहे हैं।

इस बीच राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की सक्रियता प्रदेश में बढ़ने के कारण इसे पार्टी में नए समीकरण के रूप में देखा जा रहा है।

मोदी मंत्रिमंडल में प्रदेश के जिन नेताओं ने सफलता का परचम फहराया उनमें नरेंद्र सिंह तोमर सबसे आगे हैं।

हालांकि अब प्रहलाद पटेल भी टीम मोदी में शामिल हो गए हैं। काम के लिहाज से पटेल के पास अटल सरकार में मंत्री रहने का अनुभव है। संगठन की दृष्टि से भी वह कद्दावर नेता माने जाते हैं।

 


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