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कर्मयोगी माधवराव सप्रे की संपूर्ण लेखकीय-पत्रकारीय विरासत अब भोपाल में

मीडिया            May 18, 2019


मल्हार मीडिया भोपाल।
विश्व संग्रहालय दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित बौद्धिक तीर्थ माने जाने वाले माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय के खजाने में तब और वृद्धि हुई जब स्वयं कर्मयोगी पं. माधवराव सप्रे जी की संपूर्ण विरासत संग्रहालय को प्राप्त हुई।

इसके साथ ही साहित्य मनीषी डा. कृष्ण बिहारी मिश्र, कोलकाता, विज्ञान लेखक डा. शिवगोपाल मिश्र, प्रयागराज तथा प्रख्यात भाषा-विज्ञानी डा. उदय नारायण तिवारी के महत्वपूर्ण पांडुलिपियां, पत्रादि सप्रे संग्रहालय को प्राप्त हुए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री प्रो. रमेशचंद्र शाह ने साहित्यकार द्वय डॉ. रमेश दवे तथा ध्रुव शुक्ल की विशेष उपस्थिति में इस विपुल सामग्री को ग्रहण किया। इसके साथ ही यह महत्वपूर्ण और दुर्लभ सामग्रियां संग्रहालय के ज्ञान कोश का हिस्सा बन गईं।

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि रमेश चंद्र शाह ने कहा कि संग्रहालय अपने समय के जीवित साक्ष्य होते हैं। शहरवासियों को इस विपुल संपदा का लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने संग्रहालय को मिली इस उपलब्धि के लिए बधाई भी दी।

इसी बहाने उन्होंने लुप्त होती पत्र संस्कृति पर दु:ख व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्यकारों की चिट्ठियां केवल सुख-दु:ख के आदान-प्रदान का साधन नहीं होती बल्कि उस लेखक के मन की उथल-पुथल को भी बयां करती थीं। उन्होंने इस संस्कृति को पुनर्जीवित करने की जरूरत पर बल दिया। डा. शाह ने पत्र संस्कृति पर संग्रहालय द्वारा एक संगोष्ठी आयोजित करने का सुझाव भी दिया।

कार्यक्रम के विशेष अतिथि डा. रमेश दवे ने कहा कि संग्रहालयों में संरक्षित सामग्री में कई दुर्लभ जानकारियां छुपी होती हैं। इस संदर्भ में उन्होंने बिरला द्वारा अंगरेज शासकों के लिखे पत्रों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने भी सप्रे संग्रहालय द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। जो बर्घिंघम पैलेस में सुरक्षित हैं।

अन्य विशेष अतिथि साहित्यकार ध्रुव शुक्ल ने भी खत्म होती जा रही पत्र संस्कृति पर क्षोभ जताते हुए कहा कि इंटरनेट के युग ने इस पर हमला किया है। जबकि विश्व साहित्य का अवलोकन करें तो यह एक विधा के रूप में स्थापित है। कई महापुरुषों के पत्र बकायदा किताब की शक्ल में आए हैं। एक रचनाकार जो अपनी रचना में नहीं कह पाता वह पत्रों के जरिए कह देता था। यह उसके अंतर्द्वंद्व को भी उभारती थीं। आने वाले समय में इस संस्कृति को बचाना होगा।

आरंभ में सप्रे संग्रहालय के संस्थापक-संयोजक विजयदत्त श्रीधर ने अतिथियों का स्वागत् करते हुए कहा कि अभी तक सप्रे जी की कुछ-कुछ सामग्री ही संग्रहालय के पास थी लेकिन आज उनकी समूची सामग्री हमें प्राप्त हुई है इस दृष्टि से यह हमारे लिए महत्वपूर्ण दिवस है।

मालूम हो कि शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री के रूप में सप्रे संग्रहालय में आज 2000 ग्रंथों, 500 हस्तलिखित पाण्डुलिपियां तथा 2000 से ज्यादा पत्रों का इजाफा हुआ है।

इनमें महापंडित राहुल सांकृत्यायन, बनारसीदास चतुर्वेदी, भदंत आनंद कौसल्यायन, नारायण दत्त, जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी, डा. धर्मवीर भारती, रामेश्वर गुरु, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, डा. उदय नारायण तिवारी, डा. शिवगोपाल मिश्र, वासुदेव शरण अग्रवाल, नंददुलारे वाजपेयी प्रभृति विद्वानों के पत्र शामिल हैं।

अंगरेजों के जमाने में जेल से कैसे सेंसर होकर पत्र आते थे इसका अध्ययन भी किया जा सकता है। कर्मयोगी पंडित माधवराव सप्रे की विरासत के रूप में 'हिन्दी केसरी' और 'छत्तीसगढ़ मित्र' की पूरी फाइल आई है।

'हिन्दी केसरी' की ओजस्वी इबारत से फिरंगी हुकूमत कांपती थी। लोकमान्य तिलक के 'गीता रहस्य' और समर्थ श्री रामदास स्वामी के 'दासबोध' के सप्रे जी द्वारा किए गए उत्कृष्ट अनुवाद भी संग्रह में हैं। प्राप्त पुस्तकों में सबसे महत्वपूर्ण जान अब्राहम ग्रियर्सन का 'भारत का भाषा सर्वेक्षण' है। हिन्दी के एक सौ से ज्यादा लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकारों के ग्रंथ सप्रे संग्रहालय के ज्ञान कोश में आज शामिल हुए हैं।

सप्रे संग्रहालय के पाण्डुलिपि संग्रह में 2000 से ज्यादा हस्तलिखित पाण्डुलिपियां हैं। अभी-अभी प्राप्त पाण्डुलिपियों में जयदीप कृत 'गीत गोविंद' रघुवंश महाकाव्य कालिदास कुमार संभव किरातार्जुनीयम, रस कवित्त, विज्ञान गीता, रसकल्लोल, केशवदासकृत कविप्रियां रामदेव उपाध्याय कृत राम चंद्रोदय नाटक जगन्नाथ पंडित कृत भामिनी विलास, भाषा भूषण, सुंदरदास कृत ज्ञान समुद्र श्रीराम चंद्रिका आदि 17वीं-18वीं शताब्दी की हैं।

 


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