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सियासत में ताकत, ताकत को खींचती है, रोने-धोने से कुछ नहीं होता

राजनीति, खरी-खरी            Apr 19, 2019


प्रकाश भटनागर।
बात दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान की ही है। विधानसभा के प्रेस रूम में आते ही तत्कालीन उस महिला विधायक ने सप्रयास आंखों से आंसू बाहर किये। यह कोशिश आसान नहीं थी। लिहाजा, उन्होंने कुर्सी पर बैठते ही सिर टेबल से यूं एकाकार किया कि उनका चेहरा न दिख सके।

फिर तेजी से हिचकी लेकर रोने के कुछ स्वर हवा में तैरे। करीब पौन मिनट बाद जब उन्होंने चेहरा उठाया तो उस पर आंसू थे, लेकिन उनका बहना इतनी सीमित अवधि के लिए था कि वे हिचकी लेकर किए गए उस भारी-भरकम रुदन को ठीक से संगत नहीं दे पाये।

इतने सब जतन के बाद जब उन्होंने मूल बात पर आने की बजाय मैं नारी, यह महिला शक्ति का अपमान, और जो गुजर रही है मुझ पर, जैसे शब्द मुंह से धकेले तो मीडिया का संयम जाता रहा।

पत्रकारों ने महिला विधायक से साफ कहा कि वे सीधे वह बात बयान करें, जिसके लिए मीडिया से चर्चा करने आयी हैं। यह सुनते ही रहे-सहे आंसू भी सूख गये। हिचकी और रुदन का स्वर यकायक आरोह से अवरोह पर आ गया।

अगले दिन के अखबारों में विधायक की पत्रकार वार्ता को न के बराबर तवज्जो मिली। हां, उनके साथ हुए घटनाक्रम को प्रमुखता से स्थान दिया गया। विधायक द्वारा आपबीती को भुनाने की कोशिश नाकाम रही।

घटनाक्रम दिग्विजय सिंह सरकार के समय का है। महिला राज्य के मंदसौर जिले की आरक्षित सीट से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करती थी। जिन्होंने एक भाजपा विधायक पर सदन के भीतर अपने लिए अशोभानीय टिप्पणी करने का आरोप लगाया था।

क्या भोपाल से भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भी इस महिला की ही तरह गलती कर रही हैं? इस सवाल को अन्यथा न लें। इसका आशय मुद्दे की बात को जज्बातों का जामा पहनानकर उसका मूल स्वरूप खराब कर देने जैसी गलती का है।

मीडिया में प्रज्ञा के इंटरव्यू चल रहे हैं। इनमें मालेगांव कांड में गिरफ्तारी के बाद किया गया अमानवीय टॉर्चर, संघ प्रचारक सुनील जोशी हत्याकांड के चलते सहे गये अत्याचार, इन सबको याद करके आंसू पोंछना, बस यही प्रमुखता से दिख रहा है।

निश्चित तौर पर प्रज्ञा जब इस घटनाक्रम को याद कर रही होती होंगी तो न तो उन्हें आंसू लाने के प्रयास करना होते होंगे ना ही वे कोई दिखावा कर रही हो सकती हैं। जिस पीड़ा को उन्होंने भुगता है, वो उनके प्रति सहानुभूति से भरता है। अभी कोर्ट से इस मामले में उनका बरी होना बाकी है।

जाहिर है वे सहानुभूति में वोट लेने का प्रयास करेंगी, करें, लेकिन यह चुनाव है। इस चुनाव को धर्म युद्ध बताना भी भावुकता वाले इस ऐपिसोड की एक कड़ी बन गया है। लेकिन जरा बताइए, भोपाल संसदीय क्षेत्र के किसी सुदूर गांव में बैठकर अपनी समस्याओं के निजात की अंतहीन बाट जोहते किसी गरीब परिवार पर इन बातों का भला कितना असर होगा!

मान लिया कि मतदाता जज्बाती होकर उनके समर्थन का मन बना लें, लेकिन उस बहुत बड़ी आबादी का क्या, जिसे प्रज्ञा की आंख में आंसू नहीं, बल्कि भोपाल संसदीय क्षेत्र के लिए विकास का एक विजन देखना है! उनके प्रतिद्वंद्वी दिग्विजय सिंह भोपाल के लिए एक विजन सामने रख रहे हैं तो प्रज्ञा ठाकुर को भी भोपाल के बारे में अपने दृष्टिकोण को तो लोगों के सामने रखना ही होगा।

भोपाल के लोगों के लिए प्रज्ञा की दर्द भरी दास्तां तो ठीक है लेकिन यह बात भी अपनी जगह महत्व रखती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह साध्वी किस तरह का योगदान देने के लिए तैयार है। जिन मतदाताओं को भोपाल के विकास के प्रति उनके दृष्टिकोण का इंतजार रहेगा, वे लोग इस भावुकता से नकारात्मक रूप से विचलित ही होंगे। आप महीने भर तक केवल अपने पर हुए अत्याचार को सुनाते हुए वोट नहीं मांगते रह सकते।

आंध्रप्रदेश में एनटी रामाराव के निधन के बाद उनकी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती ने पति की सियासी विरासत संभालने का जतन किया। जगह-जगह उन्होंने बताया कि किस तरह रामाराव के दामाद एन चंद्रबाबू नायडू उन्हें प्रताड़ित तथा लांछित कर रहे हैं।

अंदाज वही आंसूओं और दया की भीख में लिपटा हुआ था। मुझे आज भी याद है कि तब लालू प्रसाद यादव किसी सिलसिले में उस राज्य पहुंचे थे। लक्ष्मी ने उनके समर्थन से अपने बिखरते वजूद को बचाने का प्रयास किया।

किसी सार्वजनिक स्थान पर वही सारी बातें दोहराते हुए वह फूट-फूटकर रोने लगीं। लालू ने तब पार्वती को अपनी बहन और बेटी बताते हुए कहा कि वह आखिरी दम तक उसकी मदद करेंगे।

यह सुनकर पार्वती ने कम से कम दो बार लालू का बिलखते हुए हाथ पकड़कर कृतज्ञता ज्ञापित की। लेकिन हुआ यह कि आज आंध्रप्रदेश की राजनीतिक हलचल में लक्ष्मी पार्वती का जिक्र ढूंढे से भी नहीं मिल पाता है। क्योंकि यह राजनीति है। इसमें हारे को हरिनाम नहीं मिलता।

साध्वी प्रज्ञा जो कुछ भी सहने का दावा कर रही हैं, कमोबेश उतने ही पीड़ादायी अनुभव दिवंगत जे जयललिता अपने सियासी गुरू एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद झेले, लेकिन अन्नाद्रमुक की ताकत बन कर ही उन्होंने दम लिया।

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन से संघर्ष के दौरान सतत रूप से पीड़ादायी संघर्ष किया। फिर इस राज्य से वामपंथियों का जनाधार कम कर सकीं। मेनका गांधी के लिए पति संजय की मौत के बाद के हालात भीषण प्रतिकूल रहे। फिर भी उन्होंने हिम्मत के साथ राजनीति में खुद और बेटे वरुण के लिए सफल मुकाम तय किया।

उमा भारती भी विरोधी हालात के बीच अपने दम पर मुकाम हासिल करने का बड़ा उदाहरण हैं।

साफ है कि सियासत के मैदान में आपको मतदाता की ताकत तब ही हासिल होती है, जब आप खुद के भीतर किसी ताकत का परिचय सार्वजनिक कर सकें। तिजारत में यदि पैसा-पैसे को खींचता है, तो सियासत में ताकत, ताकत को खींचती है।

आरम्भ में जिस महिला का जिक्र किया गया था, कांग्रेस के सियासी परिदृश्य में आज उनका कोई वजूद नहीं दिखता है। साध्वी प्रज्ञा के साथ जो कुछ हुआ, वह चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता। भगवा आतंकवाद पर बात तो हो सकती है लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने में अकेला मददगार नहीं हो सकता है। लेकिन उसे मुद्दे की शक्ल देने का जतन किया जा रहा है।

यह जानते हुए भी कि मामला उस जनता का है, जो भावुकता को टीवी सीरियल या फिल्म में ही तरजीह देती है, वह भी पॉपकॉर्न चबाते या चाय/कॉफी/ कोल्ड ड्रिंक की चुस्कियों के बीच। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा का खुद को ट्रेजडी क्वीन बनाने का प्रयास उनके संघर्ष एवं क्षमताओं पर सवालिया निशान लगा सकता है।

बेहतर होगा कि वह भोपाल की बात करें, अपने हाल की नहीं।लेकिन हां, प्रज्ञा ठाकुर और दिग्विजय सिंह दोनों ही आमने सामने हैं तो भगवा आतंकवाद पर भी निर्णायक निष्कर्ष निकल ही सकता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एलएन स्टार समाचार पत्र में संपादक हैं।

 



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