सियासत ने बेरोजगार युवा को अपना हथियार बना लिया

राजनीति            Feb 26, 2019


पुण्य प्रसून बाजपेयी।
2019 के चुनाव का मुद्दा क्या है? बीजेपी ने पारंपरिक मुद्दो को दरकिनार रख विकास का राग ही क्यो अपना लिया। काग्रेस का कारपोरेट प्रेम अब किसान प्रेम में क्यों तब्दिल हो गया?

संघ स्वदेशी छोड़ मोदी के कारपोरेट प्रेम के साथ क्यों जुड़ गया? विदेशी निवेश तो दूर चीन के साथ भी जिस तरह मोदी सत्ता का प्रेम जागा है वह क्यों संघ परिवार को परेशान नहीं कर रहा है?

जाहिर है हर सवाल 2019 के चुनाव प्रचार में किसी ना किसी तरीके से उभरेगा ही लेकिन इन

तमाम मुद्दों के बीच असल सवाल युवा भारत का है जिसे बतौर वोटर तो मान्यता दी जा रही है लेकिन बिना रोजगार उसकी त्रासदी राजनीति का हिस्सा बन नहीं पा रही है।

राजनीति की त्रासदी ये है कि बेरोजगार युवाओं के सामने सिवाय राजनीति दल के साथ जुड़ने या नेताओ के पीछे खड़े होने के अलावा कोई चारा बच नही पा रहा है।

यानी युवा एकजुट ना हो या फिर युवा सियासी पेंच को ही जिन्दगी मान लें , ऐसे हालात बनाये जा रहे हैं।

आलम ये है कि देश में 35 करोड युवा वोटर, 10 करोड़ बेरोजगार युवा, छह करोड़ रजिस्टर्ड बेरोजगार और इन आंकड़ों के अक्स में ये सवाल उठ सकता है कि ये आंकड़े देश की
सियासत को हिलाने के लिये काफी है।

जेपी से लेकर वीपी और अन्या आंदोलन में भागेदारी तो युवा की ही रही। लेकिन अब राजनीति के तौर तरीके बदल गये हैं तो युवाओं के ये आंकड़े राजनीति करने वालों को लुभाते हैं कि जो इनकी भावनाओं को अपने साथ जोड़लें।

2019 के चुनाव में उसका बेडा पार हो जायेगा इसीलिये संसद में आखिरी सत्र में प्रधानमंत्री मोदी रोजगार देने के अपने आंकड़े रखते हैं। सड़क चौराहे पर रैलियों में राहुल गांधी बेरोजगारी का मुद्दा जोर शोर से उठाते हैं और प्रधानमंत्री को बेरोजगारी के कटघरे में खड़ा करते हैं।

राजनीति का ये शोर ये बताने के लिये काफी है कि 2019 के चुनाव के केन्द्र में बेरोजगारी सबसे बडा मुद्दा रहेगा। क्योकि युवा भारत की तस्वीर बेरोजगार युवाओ में बदल चुकी है।

जो वोटर है लेकिन बेरोजगार है, जो डिग्रीधारी है लेकिन बेरोजगार है, जो हायर एजुकेशन लिये हुये है लेकिन बेरोजगार है। इसीलिये चपरासी के पद तक के लिये हाथों में डिग्री थामे कितनी बड़ी तादाद में रोजगार की लाइन में देश का युवा लग जाता है।

ये इससे भी समझा जा सकता है कि राज्य दर राज्य रोजगार कितने कम है। मसलन आंकड़ों
को पढ़ें और कल्पना कीजिए राजस्थान में 2017 में ग्रूप डी के लिये 35 पद के लिये आवेदन निकलते हैं और 60 हजार लोग आवेदन कर देते हैं। छत्तीसगढ़ में 2016 में ग्रुप डी की 245 वेकेंसी निकलती है और दो लाख 30 हजार आवेदन आ जाते हैं।

मध्यप्रदेश में 2016 में ही ग्रूप डी के 125 वेकेंसी निकलती है और 1 लाख 90 हजार आवेदन आ जाते हैं । पं बंगाल में 2017 में ग्रूप डी की 6 हजार वेकेंसी निकलती है और 25 लाख आवेदन आ जाते हैं। राजस्थान में साल भरपहले चपरासी के लिये 18 वेकेंसी निकलती है और 12 हजार 453 आवेदन आ जाते हैं । मुबंई में महिला पुलिस के लिये 1137 वेकेंसी निकलती है और 9 लाख आवेदन आ जाते है।

रेलवे ने तो इतिहास ही रच दिया जब ग्रूप डी के लिये 90 हजार वेकेंसी निकाली जाती है तो तीन दिन के भीतर ही आन लाइन 2 करोड 80 लाख आवेदन अप्लाई होते है । यानी रेलवे में ड्इवर , गैगमैन , टैक मैन , स्विच मैन , कैबिन मैन, हेल्पर और पोर्टर समेत देश के अलग अलग राज्यो में चपरासी या डी ग्रुप में नौकरी के लिये जो आनवेदन कर रहे थे या कर रहे हैं।
वह कैसे डिग्रीधारी हैं?

यह देखकर शर्म से नजरे भी झुक जाये कि बेरोजगारी बड़ी है या एजुकेशन का कोई महत्व ही देश में नहीं बच पा रहा है। क्योंकि इस फेरहिस्त में 7767 इंजिनियर, 3985 एमबीए, 6980 पीएचडी,991 बीबीए, करीब पांच हजार एमए याऔर 198 एलएलबी की डिर्गी ले चुके युवा भी
शामिल थे।

यानी बेरोजगारी इस कदर व्यापक रुप ले रही है कि आने वाले दिनों में रोजगार के लिये कोई व्यापक नीति सत्ता ने बनायी नहीं तो फिर हालात कितने बिगड़ जायेगें ये कहना बेहद मुस्किल होगा।

पर देश की मुश्किल यहीं नहीं ठहरती। दरअसल नीतियां ना हो तो जो रोजगार है वह भी खत्म हो जायेगा और मोदी की सत्ता के दौर की त्रासदी यही रही कि अतिरक्त रोजगार तो दूर
झटके में जो रोजगार पहले से चल रहे थे उसमें भी कमी गई।

केन्द्रीय लोकसेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग और रेलवे भर्ती बोर्ड में जितनी नौकरियां थीं वह बरस दर बरस घटती गई।

मनमोहन सिंह के दौर में सवा लाख बहाली हुई। तो 2014-15 में उसमें 11 हजार 908 की कमी आ गई । इसी तरह 2015-16 में 1717 बहाली कम हुई और 2016-17 में तो 10 हजार 874 नौकरियां कम निकली पर बेरोजगारी का दर्द सिर्फ यही नहीं ठहरता।

झटका तो केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रम में नौकरी करने वालो की तादाद में कमी आने से भी लगा।

मोदी के सत्ता में आते ही 2013-14 के मुकाबले 2014-15 में 40 हजार नौकरियां कम हो गईं और 2015-16 में 66 हजार नौकरियां और खत्म हो गईं।

यानी पहले दो बरस में ही एक लाख से ज्यादा नौकरियां केन्द्रीय सार्वजिक उपक्रम
में खत्म हो गईं।

हालाकि 2016-17 में हालत संबालने की कोशिश हुई लेकिन सिर्फ 2 हजार ही नई बहाली हुई पर नौकरियों को लेकर देश को असल झटका तो नोटबंदी से लगा।

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के जरीये जो भी सोचा वह सब नोटबंदी के बाद काफूर हो गया। हालात इतने बुरे हो गये कि बरस भर में करीब दो करोड रोजगार देश में खत्म हो गये।

सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2017 में देश में 40 करोड 97 लाख लोग के पास काम था। बरस भर बाद यानी दिसंबर 2018 में ये घटकर 39 करोड 7 लाख पर आ गया ।

ये सवाल अब भी ज्यों का त्यों है कि सरकार ने रोजगार को लेकर कुछ सोचा क्यों नहीं? या
फिर देश में जो आर्थिक नीति अपनायी जा रही है उससे रोजगार अब खत्म ही
होंगे या फिर रोजगार कैसे पैदा हो?

सरकार के पास कोई नीति है ही नहीं। ऐसे में आखरी सवाल सिर्फ इतना है कि सियासत ने युवा को अगर अपना हथियार बना लिया है तो फिर युवा भी राजनीति को अपना हथियार बना सकने में सक्षम क्यों नहीं है।

 


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