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एक लघुकथा:बनारस में विधवाएं

वीथिका            Jan 31, 2018


वीरेंदर भाटिया।
"तुम यहाँ कैसे आई बहन?"बनारस के एक मंदिर में प्रसाद की इंतजार में बैठी एक विधवा ने दूसरी से पूछा।

"पति का देहांत हो गया था, बड़े साल हुए। बच्चे बाहर सेट हो गए। जब छुटियों में लौटेंगे तब वापिस चली जाउंगी। क्या करती अकेली बुढ़िया घर पर। सोचा कुछ पुण्य कमा लूं, सो चली आई। तुम यहाँ कैसे आई बहन?" पहली ने प्रतिप्रश्न किया।

दूसरी महिला अपनी वेदना बांटना चाहती थी लेकिन पहले वाली का झूठ ताड़ गयी। फटाफट कोई झूठ सोचा, चेहरे के भाव तेजी से बदलती हई बोली-" क्या कहूँ बहन, एक दिन सुरति लग गयी। ध्यान में खुद कन्हैया आये। बोले, सारी उम्र आसक्तियों में ही डूबी रहोगी? छोड़ो पोतों पोतियों का मोह, हरि भजन करो कुछ। रोते हुए पोते पोतियों, बहुओं को छोड़ कर आई। बहुत मुश्किल होता है बहन अपनों को छोड़ पाना।

"दूसरी औरत ने अपने दुख को झूठ से छिपाने की सफल कोशिश की।

दोनो महिलाएं एक दूसरे से असहज हो गईं। दोनों का ध्यान मंदिर में बजने वाले भजन ने एकाएक खींचा- "सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है, सत्यम शिवम सुन्दरम।"

दोनो ही विधवाओं ने ठंडी लम्बी आह भरी-मन ही मन खुद से बोलीं,- "सत्य तो सुंदर नही है हे शिव।" और शून्य में ताकने लगीं।

फेसबुक वॉल से।

 


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बनारस-में-विधवाएं

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