
समीर चौगांवकर।
आदि शंकाराचार्य ने भारत के चार कोनों के चार धामों मे चार मठ स्थापित किए।उत्तर में बद्री,पश्चिम में द्धारका,पूर्व में पूरी और दक्षिण में श्रृगेरी।
इन मठों के नाम हुए ज्योति पीठ,शारदा पीठ,गोवर्धन पीठ और श्रृगेरी पीठ।
शंकाराचार्य ने चार पीठ स्थापित करके संन्यासियों का संगठन करने के साथ ही हर मठ को एक निश्चित क्षेत्र भी दिया।
ज्योर्तिमठ को क्षेत्र मिला उत्तर और उत्तर पश्चिम, द्धारका मठ को मिला पश्चिम,पूरा दक्षिण श्रृगेरी मठ के जिम्में आया, भारत का पूर्व और उत्तर पूर्व गोवर्धन मठ को मिला।
भारत के साधु सन्यासियों को संगठित करके उन्हें मठों से जोड़ने और मठों को पहले से चले आ रहे धामों में स्थित करने का यह महत्व का कार्य आदि शंकराचार्य ने किया।
इससे भारत के साधु जीवन में व्यवस्था आई और वे लोकोत्तर हुए।
आदि शंकराचार्य ने चार पीठों में चार शंकराचार्य बैठाए, लेकिन किसी एक शंकराचार्य के अधीन किसी दूसरे शंकराचार्य को नहीं किया।
किसी एक पीठ को दूसरे से ऊंचा नहीं बनाया।किसी भी शंकराचार्य को अधिकार नहीं दिया कि वह पूरे हिदू समाज के लिए बाध्यकारी धर्मादेश निकाल सके।
यह भी व्यवस्था नहीं की कि चारों शंकराचार्य मिलकर धर्मादेश निकाल सके जो सभी हिंदुओं पर बाध्यकारी हों।
आदि शंकाराचार्य चार वेदों,एक सौ आठ उपनिषदों अठारह महापुराणों,रामायण और महाभारत जैसे धर्मशास्त्रों वाले धर्म के सेवक थे।
हिेदू धर्म में एक सर्वाच्च धर्मग्रंथ,एक सर्वाच्च और सर्वसत्तासम्पन्न धर्माचार्य और उपासना की एक ही सर्वमान्य पद्धति की स्थापना नहीं है। अपने धर्म और समाज की पंरपरा से ही शंकाराचार्य ने वैदिक सनातन धर्म को देखा।
किसी हिंदू ने किसी शंकाराचार्य की योग्यता प्रश्न नहीं उठाया। किसी हिंदू ने किसी शंकाराचार्य से उसके शंकाराचार्य होने का प्रमाण पत्र नहीं मांगा। संत का सम्मान हिंदू संस्कारों में रहा है।
हिंदू समाज में सम्मान से देखे जाने वाले शंकाराचार्य अब सार्वजनिक अपमानित हो रहे हैं, उनको भक्तों को दौड़ाकर पीटा जा रहा है।प्र शासन पीट भी रहा है और शंकाराचार्य से उनके शंकाराचार्य होने का सर्टिफिकेट भी मांगा जा रहा है।
इस मामले में सबकी अपनी चुनी हुई चुप्पी है। हिंदू संत और हिंदू समाज भी बंट गया है।
पूरा हिंदू समाज चुप है।
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