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भारत यूरोप नहीं है, यहां पैसे वालों को हर चीज पैसे के बल पर चाहिए

खरी-खरी            Jun 01, 2026


हेमंत कुमार झा।

स्वास्थ्य और शिक्षा का जितना ही निजीकरण करते जाओगे उतना ही माफिया का शिकंजा इन क्षेत्रों में कसता जाएगा, उसी अनुपात में ये दोनों क्षेत्र गरीबों से दूर होते जाएंगे, इन सेक्टर्स में काम कर रहे कर्मचारियों का शोषण उसी अनुपात में बढ़ता जाएगा और...उसी अनुपात में इन माफियाओं की ओर से राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले घोषित अघोषित चंदे की राशि भी बढ़ती जाएगी।

भारत यूरोप नहीं है कि बाजार की शक्तियों की मनमानियों को नियंत्रित करने वाली नियामक एजेंसियां सुदृढ़ और सक्रिय हों, अपने नागरिकों को माफिया की लूट से बचाने के लिए कानूनी एजेंसियां तत्पर हों।

कहने और सुनने में बुरा लगता है लेकिन सच यही है कि भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूंजी निवेश कर मुनाफा कूट रहे निजी क्षेत्र के खिलाड़ी जितने अनैतिक, बेईमान और निडर हैं उसकी कल्पना भी किसी सभ्य और सुसंस्कृत देश में नहीं की जा सकती।

भारत के पैसे वालों को हर चीज पैसे के बल पर चाहिए और इसलिए वह हर शै को निजी क्षेत्र के हवाले करने को कटिबद्ध हैं। लोअर मिडिल क्लास भी अपनी औकात भर बाजार में कूद फान मचाने को और इस तरह निर्धन तबके को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाने की मंशा से निजी क्षेत्र का पैरोकार बन कर अपनी जेबें कटवाने को उत्सुक रहा और अपनी भावी पीढ़ियों को अपनी अदूरदर्शिता का अभिशाप विरासत में सौंपता गया।

मेडिकल शिक्षा इतनी महंगी हो चुकी है कि कोई सामान्य परिवार अपने बच्चे को डॉक्टरी तभी पढ़ा सकता है जब उसका बच्चा नीट में सर्वोच्च स्कोर लाने वालों की लिस्ट में शामिल हो ताकि किसी सस्ते सरकारी संस्थान में उसका एडमिशन हो सके।

लेकिन नहीं, उन सस्ते सरकारी संस्थानों की सीट पर भी पैसे वालों की ही नजर है। माफिया है न। वह सब अरेंज कर देगा। अगर बेटा या बेटी अधिक स्कोर करने में सक्षम नहीं हैं तो पेपर लीक करवा लेंगे। हजारों करोड़ का यह खेल बताया जा रहा है और निर्धन मेधावियों के भविष्य की कीमत पर अवैध पैसों का नग्न नृत्य आज सारा भारत देख रहा है।

बाकी, करोड़ से अधिक खर्च कर किसी निजी संस्थान से डॉक्टर बनने का रास्ता तो खुला है ही। भारत की मेडिकल शिक्षा और चिकित्सा सुविधा के सेक्टर्स माफियाओं के चंगुल में हैं जहां न जाने कितने डॉक्टर्स भी निजी अस्पताल खोल कर माफिया के रूप में ढल चुके हैं।

नेता तो सबसे ऊपर हैं ही। अधिकतर निजी अस्पताल, निजी विश्वविद्यालय, निजी संस्थानों आदि में नेताओं की प्रत्यक्ष या परोक्ष पूंजी लगी हुई है और उनके संरक्षण में मुनाफा कूटने का हर खेल खेला जाता है। नियामक एजेंसियों की बात ही क्या करें। भारत की नियामक एजेंसियां दुनिया की सबसे नाकारा एजेंसियों में शुमार हैं और हमें इस पर लाज भी नहीं आती।

भारत का धनाढ्य, विशेष कर नवधनाढ्य तबका, जो नवउदारवाद की अवैध संतानों की शक्ल में देश के हर बड़े छोटे शहर में पनप कर अब जम चुका है, इस देश के कानून, इस देश के संस्थानों, इस देश के संसाधनों और सुविधाओं को अपने वैध अवैध पैसों के बल पर कब्जे में कर लेना चाहता है। आजकल धर्मवाद और राष्ट्रभक्तिवाद की हवा चल रही है तो वह इन हवाओं के साथ भी उड़ता दिख रहा है। कल कोई और हवा चलेगी तो चोला बदलते उन्हें बिल्कुल भी देर नहीं लगेगी। उनकी न कोई नैतिकता है न कोई वैचारिकता। इस वर्ग में लंपटों की भरमार है और उनकी बेलगाम लंपटई का नतीजा पूरा सिस्टम भुगतता रहता है।

प्रधानमंत्री मोदी जी पेट्रोल बचाने के लिए निजी की जगह सार्वजनिक वाहनों के उपयोग की अपील कर रहे हैं। सड़कों पर देखिए कि उनकी इस अपील का कितना असर किस तबके पर है।

निजी वाहनों के बाजार को बूस्ट करने के लिए सार्वजनिक परिवहन सिस्टम को जानबूझ कर बर्बाद किया गया और कम औकात वालों के लिए भी सेफ्टी मानकों पर नितांत असुरक्षित छोटे कारों के निर्माण और विपणन को बढ़ावा दिया गया। आज इस लचर सार्वजनिक परिवहन के भरोसे प्रधानमंत्री की यह अपील कितनी प्रभावी साबित होगी, समय बताएगा।

 मोदी जी को पुलिस को आदेश देना चाहिए कि सड़कों पर जितनी अति महंगी लक्जरी गाड़ियां दिखें, उन्हें रोको और उन पर सवार लोगों से पूछो कि कौन हो भाई, क्या करते हो, कहां से और कैसे खरीदी यह गाड़ी...। गारंटी है कि दो तिहाई लक्जरी सवार लंपट लुटेरे निकलेंगे, चाहे वे सरकारी मुलाजिम हों, ठेकेदार हों, माफिया हों, कुछ भी हों।

यही लोग कम्पीटीटिव परीक्षाओं के पेपर अपने लोगों के लिए आउट करवाते हैं, यही लोग अपने मातहतों का शोषण करते हैं, यही लोग कानून को ठेंगा दिखाते हैं और इन्हें नियंत्रित करने वाली एजेंसियां...? उनकी तो बात ही क्या करनी। कभी कोई इन एजेंसियों की चपेट में आता है तो न्यूज बनते हैं, फिर सबकुछ सामान्य हो जाता है।

नीट परीक्षा की विश्वसनीयता पर पहले भी सवाल उठे थे। फिर, मामले को दबा दिया गया। अब जो हुआ उससे पूरा देश सन्न है और हर मेधावी किन्तु निर्धन बच्चा निराश है, उसका मोटिवेशन लेवल गिर रहा है।

कुछेक लोग गिरफ्तार हो रहे हैं, लकीरें पीटी जा रही हैं, मीडिया "मास्टरमाइंड" टाइप की सनसनीखेज खबरें डाल रहा है।

क्या वास्तविक मास्टरमाइंड कभी पकड़े जाएंगे? निकट अतीत, जिसमें ऐसी घटनाएं बढ़ती गई हैं, में कितने मास्टरमाइंड कानून के घेरे में आए? बिहार का ही उदाहरण देख लें जो पेपर लीक होने के मामले में दुनिया की अग्रणी लिस्ट में शामिल होने का गौरव रखता है।

अगर कोई सिस्टम अवैध कमाई के अबाध स्रोतों पर अंकुश लगाने में अक्षम है तो वह अवैध कारगुज़ारियों पर अंकुश लगा ही नहीं सकता। बिल्कुल नहीं लगा सकता। अवैध पैसे का स्वभाव है कि वह सिर चढ़ कर बोलता है और हर शै को खरीद लेने का अहंकार पैदा करता है।

सभ्य और सुसंस्कृत समाजों में भी अवैध कागुजरियां होती हैं, लंपट लोग रहते हैं, लेकिन वहां कानून और नियामक एजेंसियों के साथ सिस्टम का एक संतुलन है। भारत में तो कोई संतुलन रहा ही नहीं। यहां का निर्धन तबका और सामान्य तबका हर तरह से लूजर है और माफियाओं का बोलबाला कितना है यह हर सेक्टर की अंतर्कथा बता रही है।

 


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