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बौद्धिकता और एकेडेमिक्स का मलबा बहुत वजनी होता है

खरी-खरी            Mar 21, 2026


 

हेमंत कुमार झा।

समय के साथ यह देश क्रोनी कैपिटलिज्म से तो निबट सकता है लेकिन एकेडमिक स्पेस में जो क्रोनिज्म का सिलसिला चल रहा है वह इतना खतरनाक और दीर्घकालीन असर छोड़ने वाला है कि इससे निबटने में पीढ़ियां निबट जाएंगी।

नरेंद्र मोदी के दौर पर दो आरोप बहुत लगते हैं। पहला कि इसने अर्थव्यवस्था को कुछ खास घरानों के लिए चरागाह बन जाने दिया है और दूसरा कि इसने शिक्षा और शोध संस्थानों को अधिकतर ऐसे लोगों से भर दिया है जिनकी बौद्धिक क्षमताएं सवालों के घेरे में है और वैचारिक प्रतिबद्धता कोई है ही नहीं। अकादमिक विमर्शों की जो गूंज सत्ता के मानस को सहलाने वाली होगी, इन लोगों की वही वैचारिकता होगी। अब इससे एकेडमिक्स की ऐसी की तैसी हो रही है तो हो।

मुनाफा के लिए सत्ता की परिक्रमा करते किसी बनिया से अधिक खतरनाक है वह एकेडेमिशियन, जो ताकतवर लोगों को सेट करने के लिए एकेडमिक्स के सिद्धांतों से समझौता करता है और नई पीढ़ी की बौद्धिकता को दांव पर लगा देता है।

एक मान्यता रही है कि भले ही संघ और भाजपा की सदस्यता का आधार व्यापक है किंतु उनसे पारंपरिक रूप से जुड़े रहने वालों में अकादमिक दुनिया के लोग कम ही रहे हैं। फिर, वे लोग कौन हैं जो बीते एक दशक में भाजपा ब्रांड राष्ट्रवाद का चोला ओढ़ कर कुकुरमुत्ते की तरह संस्थानों में उग आए हैं और इस देश की अकादमिक आत्मा को कुतर रहे हैं।

  50 के दशक से ही, जब भारत में उच्च शिक्षा और शोध के नए नए केंद्र स्थापित हो रहे थे, ऐसे कई विद्वान रहे जिनकी विचारधारा दक्षिणपंथ की अकादमिक मान्यताओं से कहीं न कहीं प्रभावित रही और वे अपनी वैचारिकता को लेकर मुखर भी रहे। वे तर्क करते थे, अपने विचार रखते थे और भले ही कोई उनसे सहमत हो या न हो, उनका सम्मान था। लोग उन्हें सुनते थे, उन्हें पढ़ते थे, उन्हें उद्धृत करते थे। उनकी वैचारिकता सत्तापेक्षी नहीं थी, लोकप्रियतावादी भी नहीं थी, बल्कि वे किसी खास सिरे पर खड़े होकर चीजों को देखते थे, उनका विश्लेषण करते थे।

लेकिन, एकेडेमिशियंस की यह जो नई जमात पिछले दस वर्षों में उभर कर सामने आई है इसने मूर्खताओं को एकेडेमिक्स की मुख्यधारा में ला दिया है। जो छात्र जीवन मे सोशलिस्ट था, 2005 में कैरियरिस्ट था वह 2015 में नेशनलिस्ट का जैकेट पहन घूमता नजर आने लगा।

सबसे अधिक प्रभावित होने वालों में हैं ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंस के क्षेत्र, किंतु विज्ञान की दुनिया भी इनसे अछूती नहीं है। सोशल साइंस और ह्यूमैनिटीज के पाठ्यक्रमों के निर्धारण और शोधों, सेमिनारों के कंटेंट पर सवाल निरंतर गहराते जा रहे हैं।

हमारे गोबरपट्टी के संस्थानों में तो संगोष्ठियां, सेमिनार अधिकतर ऐसे ही होने लगे हैं जिनमें वक्ताओं को सुनकर फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि यह अकादमिक व्याख्यान है या राजनीतिक प्रोपेगेंडा। आजकल भारत की ज्ञान परंपरा, जिसे अंग्रेज़ीदां लोग इंडियन नॉलेज सिस्टम कहते हैं, से जुड़े टॉपिक्स पर सेमिनारों का फैशन चल पड़ा है। तामझाम से मुख्य वक्ता को बुलाया जाता है, लग्जरी व्यवस्था, खान पान की उत्तम व्यवस्था, लाखों का खर्च, दूर दूर से भाग लेने आए प्राध्यापक और शोधार्थी...और मुख्य वक्ता को सुनिए तो अगले कुछेक मिनट में ही लगने लगता है कि यह तो मोदी का गुणगान और भाजपा का प्रचार कर रहा है, इसे सही से  ज्ञान ही नहीं है या यह बता ही नहीं रहा है कि भारत के नॉलेज सिस्टम की महानता किन बिंदुओं में निहित है और हमारी प्राचीन सभ्यता ने इस संदर्भ में उत्कृष्टता के किन आयामों का स्पर्श किया है।

अगर स्वयं मोदी या भागवत पीछे की किसी सीट पर बैठ कर ऐसे व्याख्यानों को सुन लें तो माथा पीट लें कि यह तो सरदार का नाम खराब करने के अलावा कुछ और नहीं कर रहा। लेकिन, सामने मोदी या भागवत नहीं, प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्र होते हैं जो समझते तो सबकुछ हैं, बोलते कुछ नहीं।

हां, तालियां खूब पीटते हैं और समारोह खत्म होने के बाद उनमें से कुछ तो खीसें निपोड़े इसलिए मुख्य वक्ता को घेर लेते हैं, उसकी नजर में आने को आतुर होते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अगले इंटरव्यू में यह एक्सपर्ट बन कर आ सकता है। आयोजकों को और अधिक ऊंची कुर्सियों की ललक है जिस तक पहुंचाने में यह वक्ता प्रभावी सेटर साबित हो सकता है।

विश्वविद्यालयों में सोशल साइंस, ह्यूमैनिटीज आदि के क्षेत्रों जो शोध हो रहे हैं, उनमें अधिकतर टॉपिक्स, कॉन्टेंट्स और निष्कर्ष पर ऐसे प्रभावी लोग ही काबिज हैं और शोधार्थियों की जमात कहीं न कहीं इन दायरों से बंधी महसूस कर रही है खुद को। कितनों की मजाल है कि इतिहास और साहित्य में रिसर्च के लिए ऐसे टॉपिक का चयन करे जो सत्ता के विमर्श को सीधी चुनौती दे।

नौकरी और प्रमोशन से रिसर्च को जोड़ने के ये अनिवार्य साइड इफेक्ट्स हैं और इन्हें स्वीकार कर ही प्रतिभाएं इस रास्ते आगे बढ़ने को विवश हैं। जो रिसर्च नौकरी या प्रोमोशन से जुड़े नहीं हैं वही देश और दुनिया को रोशनी दे रहे हैं बाकी तो लकीर ही पीटी जा रही है।

 विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी शोध परियोजनाओं का फैशन चल पड़ा है, उन्हें ग्रांट्स भी मिल रहे हैं, जिनमें गोमूत्र और गोबर के चिकित्सकीय या अन्य प्रभावों पर शोध किए जा रहे हैं। ऐसे कितने रिसर्च प्रोजेक्ट्स पूरे भी किए जा चुके हैं किंतु यह पता नहीं चला कि प्राप्त निष्कर्षों के वैज्ञानिक साक्ष्य क्या हैं या मानवता के लिए ऐसे शोधों की कितनी उपयोगिता साबित हुई।

चूंकि ऐसे टॉपिक्स सत्ताधीशों को प्रिय हैं तो लग गए लोग ऐसे रिसर्च में, आनन फानन में उन्हें ग्रांट भी स्वीकृत हो गया, रिसर्च के निष्कर्ष भी प्राप्त हो गए, फिर सब कुछ फाइलों में बंद हो गया। इतिहास मोदी के दौर को अडाणी जैसों के लिए जितने सवालों के घेरे में लाएगा उससे अधिक इन सेटर टाइप एकेडेमिशियंस के लिए सवाल उठाएगा।

अडाणी जैसों ने इस निजाम को जितनी बदनामी दी है वह सीधे सुनी जा सकती है, देखी जा सकती है, पढ़ी जा सकती है, निजाम बदलने पर अर्थव्यवस्था पर उसके असर को भी कम किया जा सकता है, किंतु, अकादमिक पाठ्यक्रमों, विमर्शों, नियुक्तियों और संगोष्ठियों को मूर्खताओं के उत्सव में तब्दील कर देने वाले इन खुशामदियों की नई उभरी जमात ने जो क्षति पहुंचाई है उसका परिमार्जन इतना आसान नहीं होगा।

संस्थानों में भ्रष्टाचार के मामले 80,के दशक से कुछ अधिक ही सुने जाने लगे थे लेकिन उनकी तासीर इतनी नहीं थी कि सुनने वालों की रूह कांप जाए। 90 के दशक में यह तासीर बढ़ गई और जब से देश में नवउदारवाद की राजनीति शुरू हुई, पैसों का प्रवाह बढ़ा, यह तासीर बढ़ती ही गई।

लेकिन, अब के दौर में राष्ट्रवाद, संस्कृतिवाद की चादर ओढ कर पदों को हासिल करने वाले "विद्वतजनों" ने अकादमिक संस्थानों में भ्रष्टाचार की जो संस्कृति विकसित की, पूरी प्रक्रिया को जिस तरह सांस्थानिक लूट में बदल दिया उसने आम लोगों का कलेजा कंपा दिया है। सितम यह कि इसे न्यू नॉर्मल मान लिया गया है जिस पर अगर शिकायतें भी हों तो अक्सर कोई कार्रवाई नहीं होती।

हर दौर जब बीतता है तो नए दौर के ध्वजवाहकों को पुराने के कुछ मलबों को साफ करना होता है ताकि वे अपनी तरह का सिस्टम डेवलप कर सकें। मोदी और भाजपा का दौर बीतने के बाद पोस्ट-भाजपा दौर में मलबों को हटाने के क्रम में इन "विद्वतजनों" द्वारा क्रिएट किया हुआ बौद्धिक और अकादमिक मलबा हटाने में उनका दम उखड़ता प्रतीत होगा। बौद्धिकता और एकेडेमिक्स का मलबा बहुत वजनी होता है और इसके बोझ में पीढ़ियां दब जाती हैं। कई दौर बीतेंगे, कई पीढ़ियां लगेंगी तब जाकर शायद यह मलबा साफ हो सकें।

 


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