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शीराजा बिखर रहा है, क्योंकि सत्ता की नैतिक आभा नष्ट होती जा रही है

खरी-खरी            Jul 07, 2026


हेमंत कुमार झा।

 सत्ता के नैतिक बल में जब क्षरण होने लगता है तो मजबूत से मजबूत शक्तियों की सत्ता का भी शीराजा बिखरने लगता है।

शीराजा बिखर रहा है, क्योंकि सत्ता की नैतिक आभा नष्ट होती जा रही है। ज्ञात अज्ञात तरीकों से सांसद और विधायक तो तोड़े जा सकते हैं, विपक्ष की पार्टियों को तोड़ा जा सकता है, बिकाऊ लोगों का साथ लेकर कुछेक कानून बदले जा सकते हैं, कुछ विधेयक पास करवाए जा सकते हैं, ज्वलंत सवालों को हाशिए पर धकेलने के लिए कृत्रिम या गैर जरूरी सवालों को विमर्श के केंद्र में ला कर कुछ वक्त के लिए जनता का ध्यान भटकाया जा सकता है, लेकिन, जनमानस में धीरे धीरे ही सही, बढ़ती अनास्था किसी भी शक्तिशाली सत्ता को जमींदोज कर सकती है।

नीट परीक्षा प्रकरण ने देश के मध्य वर्ग को आशंकाओं से भर दिया है कि कुछ तो ऐसा है जो सरकार के नियंत्रण में नहीं है और इससे जुड़ा माफिया तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि मेडिकल शिक्षा में पहुंचना उसके मेधावी और परिश्रमी बच्चों के लिए कठिन होता जा रहा है। बात जब बालबच्चों के भविष्य की और मध्यवर्गीय आकांक्षाओं पर चोट की आती है तो लोगों के सिर पर चढ़े सत्ता संरचना के प्रायोजित नैरेटिव्स अपना असर खुद ब खुद खोने लगते हैं। कितने बच्चों ने आत्महत्या की, कितने बच्चे डिप्रेशन में चले गए, कितने धरना प्रदर्शन से लेकर भूख हड़ताल तक कर रहे हैं लेकिन सरकारी सिस्टम इन सबको संवेदशीलता के साथ एड्रेस करने की जगह अपने ही अहंकार में डूबी हुई है।

भाजपा के समर्थन में अपने वर्गीय स्वार्थों के कारण थेथरई की हद तक उतरा रहा अपर मिडिल क्लास पेट्रोल और इथेनॉल विवाद को लेकर संशय और डर की स्थिति में है। घर के पोर्टिको में लगी कार उसकी सुविधा और उसके स्टेटस को बढ़ाती है, घोषित-अघोषित तरीकों से पैसा कमा कर वह एक से एक लक्जरी गाड़ियों के मोहजाल में पड़ता है, उन्हें खरीदता है, उन्हें देख कर मुग्ध होता है और फिर, खुद पर भी मुग्ध होता है। अगर उसके भीतर आशंकाएं बढ़ती हैं कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उसकी गाड़ियों के इंजन को क्षति पहुंचा सकती हैं, उसके माइलेज को कम कर सकती हैं तो इस वर्ग का स्वभाव है कि अपने आर्थिक और निजी स्वार्थ पर थोड़ी भी चोट वह सहन नहीं कर पाता।

कॉरपोरेट शक्तियों के बाद यही वह वर्ग है जो अपने स्वार्थ के लिए किसी भी सत्ता को सलाम कर सकता है और स्वार्थों पर चोट पहुँचे तो किसी की भी जड़ों में मट्ठा डालने पर उतारू हो सकता है। हालांकि, यह वर्ग अभी इस मुद्दे को समझने का प्रयास कर रहा है, टीवी पर एक्सपर्ट्स के ओपिनियन्स पर दिमाग खपा रहा है और दिलचस्प यह कि इन सब के लिए वह तथाकथित "गोदी मीडिया" पर निर्भर न रह कर उन स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जा रहा है जिनके प्रति उसके मन में हिकारत का भाव रहा है।

नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत आभामंडल को उनके "डियर फ्रेंड" डोनाल्ड ट्रंप ने जितनी क्षति पहुंचाई है वह तो अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है। इजरायल के साथ राजनयिक संबंध निभाना और ईरान पर उसके आक्रमण के ठीक एक दिन पहले वहां जा कर उसे अपना "फादरलैंड" घोषित करना, दोनों दो अलग अलग बातें हैं। भारतीय प्रधानमंत्री के इस कदम के पीछे रहस्य की ऐसी कुहेलिका है जिसे समझने में लोग लगे हुए हैं लेकिन कोई माकूल जवाब नहीं मिल पाया है।

गाजा में किए गए इजरायली नरसंहार के प्रति भारत के रवैये को खुद भारतवासी नहीं समझ पा रहे क्योंकि अतीत की किसी भी भारत सरकार के ऐसा रवैया अपनाने का कोई उदाहरण नहीं मिलता। भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार का भी नहीं। इस प्रकरण ने दुनिया के एक बड़े हिस्से की नजरों में भारत सरकार की छवि पर आघात किया है।

विदेश नीति को लेकर भारत में आमतौर पर एक "कन्सेंशस" की परंपरा रही है। नरेंद्र मोदी के दौर में यह परंपरा अक्सर थोड़ी हाशिए पर जाती दिखी लेकिन    ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के दौरान तो भारतीय विदेश नीति को लेकर देश में ही बहस शुरू हो गई और विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग के साथ ही विपक्ष के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं ने भी जोरदार आपत्तियां दर्ज की।  विशेषज्ञों का मानना रहा कि इस युद्ध के दौरान भारत सरकार का रवैया देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं रहा।

"मजबूत नेता" का मिथक गढ़ने के लिए बीते वर्षों में जितने प्रयत्न किए गए, हाल के कुछ महीनों के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में वह मिथक विवादों और संदेहों में घिरता दिखा।

 भारत और अमेरिका के संबंध किस हद तक परस्पर सम्मान पर आधारित रह गए हैं, परस्पर हितों को कितना महत्व दिया जा रहा है, अमेरिका में रह रहे या वहां जाने को इच्छुक भारतीयों के साथ अमेरिकी तंत्र कैसा व्यवहार कर रहा है यह सब अब खुल कर सामने है। बेड़ियों में जकड़ कर अमेरिका से भारत भेजे गए लोगों के विजुअल्स और टैरिफ विवाद ने उन लोगों को भी भीतर ही भीतर अपनी औकात का अहसास करवा दिया है जो "अमेरिका से आँख से आँख मिला कर" बात करने की शक्ति बन जाने का भ्रम पाल कर अपने ड्राइंग रूम में घटिया न्यूज चैनलों के सामने "मजबूत राष्ट्र के निर्माण" का स्वप्न साकार होने के मुगालते में जी रहे थे। वे इस तथ्य को समझने से सदैव इन्कार करते रहे कि जनता की मजबूती ही किसी राष्ट्र को मजबूत बनाती है और भारत में जनता के बड़े हिस्से के आर्थिक अधिकारों को हाशिए पर डाल कर, उनके श्रम का शोषण बढ़ा कर, उनके हितों की कीमत पर ऊपर के कुछेक प्रतिशत आबादी के हितों का पोषण कर कोई देश वास्तविक अर्थों में सशक्त होने की ओर कदम नहीं बढ़ा सकता।

    भारत का अपर मिडिल क्लास ड्राइंग रूम में अपने सोफे पर बैठ कर अपनी टांगें फैला कर टीवी के अपने पसंदीदा न्यूज चैनल देख देख कर राष्ट्रवाद का उत्सव मनाता रहा और देश की 150 करोड़ की आबादी में 100 करोड़ लोगों को मनुष्य मानने से भी इन्कार कर देना उसका स्वभाव बनता गया। अतीत के दशकों में भी उसका मानस इन्हीं प्रवृत्तियों से प्रेरित था लेकिन उसे डर लगता था कि आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए बड़ी आबादी अगर जागरूक होने लगे तो उसका क्या होगा। नरेंद्र मोदी के दौर में उसका यह डर कम हुआ क्योंकि उसने ऐसी सत्ता संरचना को मजबूत होते देखा जो बड़ी आबादी के हितों की कीमत पर उसके हितों की रक्षा कर रही है और "विकसित भारत 2047" का विजन के माध्यम से क्वालिटी शिक्षा, क्वालिटी चिकित्सा, क्वालिटी संसाधनों और क्वालिटी लाइफ स्टाइल पर उनके अधिकार बढ़ा रही है। बड़ी आबादी को हाशिए पर धकेल खुद को सिस्टम के केंद्र में महसूस करना अपर मिडिल क्लास को बहुत सुहाया और वह "मोदी मोदी" का जाप करता रहा।

अब, उसे भी भय लगने लगा है क्योंकि वह देख रहा है कि वास्तविक रूप से सशक्त तो ऊपर के 1-2 प्रतिशत लोग हो रहे हैं और उनके मुकाबले वह भी कहीं न कहीं हाशिए पर ही धकेला गया है। अपने अपने हाशिए हैं। कुछ लोग पहचान लेते हैं कुछ नहीं पहचान पाते या पहचान कर भी इसे अपनी नियति मान लेते हैं। जो नियति से समझौता नहीं करते, वे किसान आंदोलन की शक्ल में तन कर खड़े हो जाते हैं और कृषि से जुड़े सवालों को और उस पर कॉरपोरेट की लुब्ध नजरों को बेपर्दा कर सरकार को घुटनों पर ला देते हैं।

नोएडा, गुरूग्राम सहित कई शहरों में श्रमिकों के आंदोलन को सत्ता संपोषित मीडिया ने कितना भी बदनाम किया हो, उस पर देशद्रोही होने तक के आरोप लगाए हों, लेकिन उनके भीतर प्रतिरोध की आग को राख में तब्दील नहीं किया जा सका। यह संकेत है कि किसानों और मजदूरों की सबसे बड़ी और निर्णायक आबादी वाले इस देश में भ्रामक नैरेटिव्स पर आधारित राजनीति कुछ समय के लिए तो सफल हो सकती है, लेकिन दीर्घजीवी नहीं हो सकती।

भारत के 100 करोड़ लोगों में यह अहसास तो है कि वे देश की विकास प्रक्रिया में एकदम हाशिए पर हैं लेकिन अधिकतर संदर्भों में आज भी उनमें अपनी इस स्थिति के विरोध में कोई प्रभावी सुगबुगाहट नहीं। किंतु, कुछ न कुछ है ऐसा जो भीतर ही भीतर सुलग रहा है। उनकी नेतृत्व विहीनता और उनकी मानसिक बुनावट कहीं न कहीं एक अवरोध अब भी है। किंतु, मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास न इतना भोला है न अपनी नियति के समक्ष नतमस्तक रहने की उसकी प्रवृत्ति रही है। इस आबादी की आस्था में अब दरारें चौड़ी होती जा रही हैं। यह बढ़ती अनास्था वर्तमान सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बन रही है।

राम मंदिर के चढ़ावा की चोरी या उसकी संगठित लूट का विवाद कोई मामूली बात नहीं है। कुछ शातिर प्रवक्तागण और कुछ कूढ़मगज भक्त तर्क दे रहे हैं कि जिन्होंने राममन्दिर में चंदा नहीं दिया या निर्माण के बाद उसे देखने नहीं आए उन्हें इस चोरी और लूट पर बोलने का अधिकार नहीं। यह कुतर्क हंसने और तरस खाने लायक ही है क्योंकि आम जनमानस, जिसने चंदा चढ़ावा दिया हो या न दिया हो, मंदिर दर्शन करने गया हो या न गया हो, मंदिर प्रबंधन से जुड़े प्रतीक पुरुषों के इस घोर नैतिक पतन से हैरान है। इस नैतिक पतन ने "शुचिता" और "आदर्श" के उन दावों की धज्जिया उड़ा दी हैं जो किसी संगठन के सार्वजनिक नैरेटिव का मेरुदंड रहा है।

नैरेटिव्स के सहारे राजनीति को परवान चढ़ाने वाली शक्तियां अब नैरेटिव्स की दुनिया में ही घिरने लगी है। काउंटर नैरेटिव्स अब अधिक प्रभावी तरीके से उभरने लगे हैं। यह अलग विमर्श का विषय है कि विपक्ष इनका राजनीतिक लाभ उठाने की स्थिति में है या नहीं क्योंकि कुछेक नेताओं को अपवाद मान लें तो बाकी, टुकड़ों में विभक्त और हितों के अलग अलग द्वीपों पर विचरते भटकते विपक्ष के नेताओं का नैतिक संकट भी गहरा है। उनकी वैचारिकता का कोई ठोस आधार अगर है भी तो अपवादों को छोड़ उसके लिए संघर्ष करने की न उन्होंने क्षमता दिखाई है न उनके पास इस संघर्ष के लिए अधिक नैतिक बल है।

जीवंत लोकतंत्र में विकल्पहीनता कोई स्थायी संकट नहीं होती। बावजूद इसके कि लोकतंत्र की प्रहरी संस्थाओं के संस्कारों का हरण किया जा रहा है, वे जनता की नजरों में गिरती जा रही हैं, लेकिन लोकतंत्र अंततः जनचेतना पर ही निर्भर करता है। जनता सब देख रही है। भ्रमित करने वाले नैरेटिव्स के कुहासों पर अब ज्वलंत सवालों कीे जलती मशालें अपना आक्रमण तीव्र करने लगी हैं।

अब ऐसे सवाल कि आखिर क्यों देश पिछले 45-50 वर्षों की सबसे अधिक बेरोजगारी झेल रहा है, विशेषज्ञों की रिपोर्ट्स से बाहर आ कर अब जनता के दिमागों को मथने लगे हैं। नौकरी, रोजगार संबंधी नरेंद्र मोदी के तमाम दावे, तमाम संकल्प भोथरे साबित हुए और अब अधिकतर लोग उनकी ऐसी बातों, ऐसे दावों को गंभीरता से नहीं लेते। विश्वसनीयता का यह संकट गहराता जा रहा है।

आर्थिक सवालों से जूझने में नाकामयाबियों ने अवतार घोषित किए जा चुके नेताओं की छवियों, नीतियों और कार्यकलापों पर सवालों की बौछारें तेज कर दी है। पिछले दशक में कंपनियों के मुनाफे में वृद्धि के प्रतिशत और उसके कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के प्रतिशत में इतना अंतर है कि मोदी राज को बहुत सारे लोग कंपनी राज का पर्याय मानने लगे। ऑक्सफैम की रिपोर्ट में तो यहां तक बताया गया कि भारत में वेतन भोगियों की वास्तविक वेतन वृद्धि "नकारात्मक वृद्धि" की श्रेणी में आ चुकी है। सरकार की नीतियों और कार्यव्यापार में कॉरपोरेट हितों का वर्चस्व संदेहों को गहरा करता गया और जनमानस में यह धारणा पुष्ट होती गई कि सरकार के क्रियाकलाप बड़े पूंजीपतियों को और अधिक धनी जबकि गरीबों को और गरीब बना रहे हैं।

हाल के कई घटनाक्रमों से "शुचिता" और "डिफरेंट" होने के दावों में इतने झोल आ गए हैं कि अब ऐसी बातों पर किसी को भी हंसी आती होगी, मन ही मन में उन समर्थकों को भी, जो खुल कर शायद अभी भी इन शब्दों के उच्चारण पर हंस नहीं सकते।

सत्ता के नैतिक बल में ह्रास अंततः उसका शीराजा बिखेर देता है। शीराजा बिखरने लगा है।

लेखक पाटलीपुत्र यूनिवर्सिटी में एसोशिएट प्रोफेसर हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



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