
ममता यादव।
जबतक बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं लाओगे यूं ही बदनाम होते रहोगे। प्रायोजित इंफ्लून्सर वर्सेस असल पत्रकार।
लंबे समय से सुनियोजित तरीके से इनको पत्रकारों के बीच घुसाया जा रहा है, बैठाया जा रहा है और आप भले मानुष बनकर चुप बैठे रहते हैं।
जब कुछ हो जाता है तो वरिष्ठ से वरिष्ठतम पत्रकार पूरी बिरादरी को लपेटते हुए ज्ञान बांटने लगते हैं।
मगर ये यह नहीं पूछ पाते कि सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर हर अहम जगह तक यह पहुंच कैसे जाते हैं? थैला लुटाई कांड याद है न?
ये कौन लोग हैं जो किसी के भी मुंह में बदतमीजी से माइक घुसाकर बदतमीजी भरे लहजे में ऐसे सवाल पूछते हैं कि पत्रकारिता ही कटघरे में खड़ी कर दी जाती है? बालाघाट की वीडियो में एक ग्रुप है पूरा एक जैसी ही उम्र का।
ढाई साल पहले चेताया था जब पहली इंफ्लून्सर वर्कशॉप सरकारी खर्च और तामझाम के साथ हुई थी और हमारे भोले साथी खबर भी चला रहे थे।
यह डिजिटल/वेब मीडिया के बजट पर पहला अघोषित प्रायोजित डाका था। पर पत्रकार भोले ही बने रहे, अनजान।
अफ़सोस है कि हमारे बीच के ही लोगों ने अपनी रोटियां सेंकने के चक्कर में आग ही नहीं लगाई बल्कि समय-समय पर पैट्रोल भी छिड़कते रहते हैं। समय रहते जो नहीं जागते वे पहले कम्फर्ट जोन खोजकर कहते हैं क्या कर सकते हैं धीरे-धीरे समाप्ति की ओर चले जाते हैं। बिना किसी पक्ष विपक्ष के सारे पहलू देख समझकर इस पत्रकार को सुनिए। 20 साल का अनुभव क्या बोल रहा है?
जो हो रहा है यह तो वही बात हुई कि जबरा मारै भी और रोन भी न दे।
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