
ममता मल्हार।
जिन लाहौर नहीं देख्या ओ जम्याइ नई" का ही फ़िल्मी रूपांतरण है फ़िल्म 1947 बंटवारा। असगर वजाहत द्वारा लिखे गए इस नाटक को हबीब तनवीर साहब के नया थियेटर ग्रुप द्वारा मंचित किया जाता रहा है।
फ़िल्म की जरूरत के मुताबिक शामिल किए गए एक्शन को छोड़ दें तो बाकि फ़िल्म जस की तस धर दीनी चदरिया वाला मामला है।
मैसेज एक ही समाज देश में समस्या बुरे लोगों से उतनी नहीं है जितनी अच्छे शरीफ लोगों की चुप्पी से है।
बंटवारे के बाद अपने ही घर में ऊपरी मंजिल पर भीतर से ताला लगाकर रहती एक हिन्दू वृद्धा जो अपने बेटे के लौटने के इंतजार में है।
जिसे यह नहीं पता कि उसका बेटा-बहू-पोती सहित दंगों की भेंट चढ़ गया। पर इतने बड़े मुस्लिम मोहल्ले में किसी को दिक्कत नहीं है न ही कुछ भले लोग उसे बताते हैं कि तुम्हारा बेटा अब नहीं लौटेगा।
दिक्कत है तो छुटभैये सियासती आदमी को। जो अपने फायदे के लिए लोगों को भड़काकर उनका उपयोग करता रहता है।
भारत से पहुंचे मुस्लिम परिवार को वह घर मिलता है। शुरुआती नाराजगी,अविश्वास शक संदेह नोकझोंक के बाद वह हिंदू महिला मुस्लिम परिवार की माई बन जाती है।
मुस्लिम परिवार ने अपने भाई बंद भारत में खोए तो उनकी नाराज़गी अपनी जगह पर बुढ़िया का यह विश्वास अपनी जगह कि मैं अपना घर नहीं छोडूंगी चाहो तो मुझे मारकर फेंक दो।
देश की मिट्टी से लगाव बहुत मेहनत,जतन से बनाया सजाया घर जिसमें जिन्दगी गुजर गई उसे ऐसे ही तो कोई नहीं छोड़ पाता। नए परिवार को कारोबार के लिये जगह चाहिए पर सियासी चुरकुट यह काम नहीं होने देते और बुढ़िया चुपचाप अपनी जगह उस परिवार को बिना बताए दे देती है।
जब खुलासा होता है तो नाराजगी अविश्वास की जगह अनजाने में बने प्रेम औऱ भरोसे के रिश्तों ने ले ली होती है।
वह इनकी माई बन गई। जब माई को अहसास होता है कि उसके कारण सिकंदर मिर्जा की परेशानी बढ़ रही है तो वह आधी रात निकल पड़ती है दिल्ली के लिये। पर उसे रास्ते में मुंहबोले बेटे के साथ वापस आना पड़ता है। यह वही मां थी जो अपने सगे बेटे के इंतजार में घर नहीं छोड़ना चाह्ती थी और वही मां मुँहबोले बेटे को बचाने चुपचाप निकल जाती है।
आखिरी सीन प्रभावी बन पड़ा है। बुढ़िया अंतिम समय में सिकंदर मिर्जा में अपने बेटे को देख उससे वादा लेती है कि वह उनका ख्याल रखेगा। इसके बाद एकमात्र हिन्दू महिला दुर्गावती की मौत और फिर 7-8 मुस्लिम मौलवी से चर्चा करते हैं कि अंतिम संस्कार कैसे किया जाए हनन तो कुछ पता ही नहीं है।
एक कहता हस जब पता ही नहीं तो दफना देते हैं। मौलवी कहता है धर्म मजहब के मुताबिक यह गलत है। आखिर में तय होता है कि हिन्दू रीति-रिवाह से ही अंतिम संस्कार होगा। कुक 5-6 मुस्लिम अर्थी सजाने से लेकर अगरबती फूक तक की तैयारी कर लेते हैं। जब ले जाने की बारी आती है तो एक कहता है कुछ कहते भी हैं तो सिकंदर मिर्जा याद कर कहता है रामनाम सत्य है।
और रामनाम सत्य के साथ मुस्लिम कंधों पर हिन्दू माई की शवयात्रा शुरु होती है पूरे रास्ते रामनाम सत्य गूँजता हुआ। यह सीन देखकर मुझे मेरी माँ की अंतिम विदाई की तैयारी और उनका जाना याद आ गया। इस बीच सियासी चुरकुट नेता अपने लोगों के साथ तलवार लेकर निकल पड़ता है कि 10-12 ही तो होंगे चलो सबको मार देंगे।
पर तब तक लाहौर की उस गली का हर शख़्स टोपी पहन इस शवयात्रा में शामिल हो चुका होता है। इनकी एकता देख सियासती नफरती नेता के हाथ से डरकर तलवार छूट जाती है। और मुस्लिम मुंहबोले बेटे के हाथ से हिन्दू माई की मुखाग्नि के साथ फ़िल्म खत्म हो जाती है।
कुछ डायलॉग सोचने पर मजबूर करते हैं जैसे छोटी बच्ची पूछती है क्या हिन्दू मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते तो? मां कहती है क्यों नहीं रह सकते पहले तो रहते ही थे।
कुलमिलाकर समाज को तोड़ने वालों की संख्या मुट्ठी भर है। शबाना आजमी दुर्गावती के रोल में इस कदर डूबीं कि शबाना याद ही नहीं रहतीं। बस माई ही याद रह जाती है।
प्रीति जिंटा भी भूमिका ठीक निभा गईं। सनी देओल का तो वही चिरपरिचित अंदाज है ढाई किलो के हाथ के साथ ढाई किलो वजनी संवाद। इनके बेटे को अभी मेहनत की जरूरत है चेहरे पर भाव नहीं आते सपाट चेहरा रहता है।
अली फ़ज़ल भी अपनी भूमिका के साथ न्याय कर गए हैं।। उनका एक संवाद याद रह जाता है जब मुस्लिम कहते हैं वे ऐसे ही हैं तो अली फ़ज़ल पूछते हैं और हम कैसे हैं?
बेशक दूसरे को देखने से पहले खुद को देखने की जरूरत है।
हर कौम में दो तरह के लोग हैं एक वो जिनने साम्प्रदायिक सद्भाव वाला माहौल देखा है जिया है जी रहे हैं दूसरे वे हैं जो इस माहौल से या तो अनजान हैं या अब जानबूझकर अनजान बने रहना चाहते हैं और अलाय-बलाय बक्कर माहौल खराब करने की कोशिश करते रहते हैं।
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