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डिजिटल न्यूज के गिरते ट्रैफिक का कड़वा सच: आपका कंटेंट नहीं, आपका 'CIBIL' खराब है

मीडिया            Jan 15, 2026


मनोज खांडेकर।

आज डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर तरफ हैरानी और बेचैनी का माहौल है. इन दिनों आप किसी भी न्यूज रूम में फोन कीजिए, बातचीत की शुरुआत इसी सवाल से होती है, "भाई, तुम्हारे यहां ट्रैफिक का क्या हाल है?" पब्लिशर्स हर पैंतरा आजमा चुके हैं, हर रणनीति बदल कर देख ली, लेकिन नतीजा सिफर है. जो खबरें पहले चंद मिनटों में वायरल हो जाया करती थीं, आज उन पर क्लिक्स तक नहीं आ रहे हैं.

दरअसल, यह कड़वी सच्चाई अब स्वीकार करनी होगी कि पुराने दिनों का वह 'बंपर ट्रैफिक' अब शायद कभी वापस नहीं आएगा. गूगल डिस्कवर का 'Golden Era' अब पीछे छूट चुका है. वह दौर खत्म हो गया जब सिर्फ एक आकर्षक फोटो और 'क्लिकबेयट' हेडलाइन के दम पर लाखों का ट्रैफिक बटोर लिया जाता था.

अब सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है?

असल में गूगल अब जो भी थोड़ा-बहुत ट्रैफिक दे रहा है, वह केवल उन्हीं को मिल रहा है, जिनकी उस टॉपिक पर अथॉरिटी है. अब केवल खबर देना काफी नहीं है; आपकी 'Topic-Authority' और ऑथर की उस विषय पर पकड़ ही यह तय करेगी कि आपकी खबर लोगों की फीड में जगह पाएगी या नहीं. इतना ही नहीं यदि कटेंट सतही होगा और केवल क्यूरेशन किया होगा तो उस पर भी नंबर नहीं आएंगे. साफतौर पर ऐसा कटेंट, जिसे AI भी लिख सकता है, उसके लिए अब कटेंट क्रिएटर्स को डिस्कवर से ट्रैफिक नहीं मिलेगा.

Google की नजर में आपका CIBIL Score!

इसे समझने के लिए हमें बैंकिंग की दुनिया के एक शब्द को समझना होगा, CIBIL Score! जिस तरह एक खराब सिबिल स्कोर आपके लोन मिलने की संभावनाओं को खत्म कर देता है, ठीक वैसे ही गूगल की नजर में आपकी गिरती हुई क्रेडिबिलिटी आपके ट्रैफिक के रास्ते बंद कर देती है. फर्क सिर्फ इतना है कि बैंक आपका 'पैसों का लेन-देन' देखता है और गूगल आपके 'कंटेंट का ट्रैक रिकॉर्ड'.

कुछ-कुछ होता है नहीं गूगल को सब कुछ पता है..!

"राहुल... नाम तो सुना होगा!" 'कुछ-कुछ होता है' का यह मशहूर संवाद गूगल के सामने फेल है. गूगल को केवल ऑथर का नाम नहीं, उसके काम का पूरा रिकॉर्ड पता होता है. अब रवि के उदाहरण को ही लीजिए. रवि को उस दिन भी भरोसा था कि लोन मिल ही जाएगा. नौकरी ठीक थी, सैलरी अकाउंट साफ था और जरूरत भी बहुत बड़ी नहीं थी. बैंक मैनेजर ने फॉर्म देखा और वही पुरानी लाइन बोली, “आपका सिबिल स्कोर ठीक नहीं है.” रवि को पहली बार समझ आया कि बैंक आज की हालत नहीं देखता, वह इंसान का अतीत पढ़ता है. समय पर न भरी गई EMI और बिना सोचे लिए गए क्रेडिट कार्ड्स ने उसे बैंक की नज़र में 'Risky' बना दिया.

गूगल ठीक यही करता है. फर्क बस इतना है कि वहां पैसा नहीं, यूजर का ध्यान (Attention) दांव पर होता है. हर बार जब कोई आर्टिकल डिस्कवर में आता है, गूगल एक खामोश फैसला लेता है, "किस पर भरोसा किया जाए?" यह फैसला सिर्फ हेडलाइन देखकर नहीं, बल्कि यह देखकर होता है कि इस 'नाम' (Author) ने पहले क्या परोसा था.

AI को बना दिया है 'डिफॉल्टर'

एडिटोरियल रिव्यू में सारा दोष 'एल्गोरिदम' या 'AI' पर मढ़ा जा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है. ट्रैफिक की अंधी दौड़ में ऑथर्स ने अपनी पहचान खो दी है. बिना किसी 'स्पेशलाइजेशन' के आप गूगल के लिए सिर्फ एक 'Unpredictable Risk' बनकर रह जाते हैं. गूगल किसी ऑथर को महज एक 'URL' नहीं, बल्कि एक इंसान की तरह पढ़ता है. जब ऑथर की पहचान (Niche) साफ नहीं होती, तो गूगल सजा नहीं देता, बस आपसे दूरी बना लेता है.

यहां CTR का व्यवहार बिल्कुल EMI जैसा है. जब गूगल मौका देता है और यूजर उसे पूरा पढ़ता है, तो यह 'भरोसा' बढ़ाता है. लेकिन अगर अंदर वही पुराना, सतही या मशीनी कंटेंट मिलता है, तो इसे एक 'मौका बर्बाद' माना जाता है. गूगल सब याद रखता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे बैंक हर मिस्ड पेमेंट याद रखता है.

AI नहीं हम सब जिम्मेदार

ऑथर की 'क्रेडिबिलिटी' खराब करने के जिम्मेदार हम सब हैं सच तो यह है कि बहुत से ऑथर खराब नहीं थे, वे बस उस सिस्टम के हिसाब से काम कर रहे थे जो उनसे करवाया जा रहा था. न्यूज़रूम्स में एक दौर था जब दबाव होता था, “हेडलाइन में पंच लाओ”, “थोड़ा सनसनीखेज बनाओ”, “फैक्ट्स बाद में देखेंगे, पहले क्लिक्स आने चाहिए.”

 गूगल भी उस वक्त अलग था. जैसे बैंक फ्री क्रेडिट कार्ड और जीरो प्रोसेसिंग फीस के ऑफर में आपको फंसाता है, डिस्कवर भी खुले हाथ से ट्रैफिक बांट रहा था. ऑथर ने वही किया जो मैनेजर ने KPI के नाम पर उससे करवाया. किसी ने चेतावनी नहीं दी कि वह 'शॉर्ट-टर्म नंबर्स' के लिए अपनी 'लॉन्ग-टर्म क्रेडिबिलिटी' गिरवी रख रहा है.

फिर गूगल के 'कोर अपडेट्स' आए और प्राथमिकताएं बदल गईं. अचानक वही ऑथर, जो कल तक 'टॉप परफॉर्मर' था, गूगल की नजर में 'कमजोर' हो गया.

सारा ठीकरा ऑथर के सिर फोड़ दिया गया, जबकि जिम्मेदारी उस 'एडिटोरियल पॉलिसी' की थी जिसने उसे यहां तक पहुंचाया.

यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी कर्मचारी ने कंपनी के कहने पर अपने क्रेडिट कार्ड से खर्च किया, और बाद में कंपनी ने हाथ खड़े कर लिए. बैंक कर्मचारी की मजबूरी नहीं, उसका 'स्टेटमेंट' देखता है.

पर ऐसा नहीं है कि उम्मीद की किरण नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि सबकुछ खत्म हो गया है.

जैसे खराब सिबिल स्कोर एक दिन में नहीं सुधरता, वैसे ही ऑथर अथॉरिटी बहाल करने में समय और अनुशासन लगता है.

बैंक पैसा तभी देता है जब उसे भरोसा हो कि आप लौटाएंगे. गूगल ट्रैफिक तभी देता है जब उसे भरोसा हो कि आप यूजर का समय बर्बाद नहीं करेंगे.

दोनों जगह भरोसा 'कमाया' जाता है, 'मांगा' नहीं जाता..!

Editor of Original Videos for News 18 Languages.

 


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