मल्हार मीडिया ब्यूरो।
उत्तरप्रदेश अयोध्या के डिप्टी जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने योगी आदित्यनाथ को लेकर शंकराचार्य द्वारा की गई कथित टिप्पणी पर भावुक होकर सार्वजनिक रूप से इस्तीफा दे दिया।
उनके रोने का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ अब उनको लेकर खबर है कि कथित तौर पर फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की और मामला अब जांच की आख़िरी अवस्था में बताया जा रहा है।
आरोप है कि उन्होंने आंखों की ऐसी बीमारी दर्शाई, जिसे लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि 50 वर्ष से कम उम्र में यह बीमारी लगभग न के बराबर पाई जाती है।
इस पूरे प्रकरण की शिकायत किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उनके सगे बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह ने स्वयं की है जो इस मामले को और गंभीर बनाता है।
शिकायत के बाद उन्हें कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए बुलाया गया, लेकिन वे लगातार अनुपस्थित रहे।
इस संबंध में मऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने 19 दिसंबर 2025 को महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं, उत्तर प्रदेश को पत्र लिखकर औपचारिक जानकारी दी यह एक रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्य है।
खुद को सत्ता-भक्ति का प्रतीक बताने की कोशिश करने वाले डिप्टी जीएसटी कमिश्नर से सवाल है क्या यह इस्तीफा आस्था या सिद्धांत का मामला था, या फिर जांच और संभावित रिकवरी से बचने की रणनीति?
अगर सब कुछ वैध है, तो मेडिकल बोर्ड के सामने जाने से परहेज़ क्यों? क्या सत्ता के नाम पर नियम, कानून और प्रक्रिया गौण हो जाते हैं? यह पोस्ट किसी को दोषी घोषित करने के लिए नहीं, बल्कि यह पूछने के लिए है कि कानून सबके लिए बराबर है, या कुछ के लिए भावनात्मक ड्रामा ही ढाल बन जाता है।
फैसला तो जांच ही करेगी,लेकिन अब उनके रुदन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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