Breaking News

एसआईआर पर बोला सुप्रीम कोर्ट, कोई भी शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती

राष्ट्रीय            Jan 22, 2026


मल्हार मीडिया ब्यूरो।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण से उन लोगों के लिए गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं, जिनके नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जाते। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी जोड़ा, ''कोई भी शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती।'

सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने ये टिप्पणियां बिहार सहित कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करने के निर्वाचन आयोग के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की अंतिम सुनवाई के दौरान कीं।

पीठ ने निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी द्वारा दी गई विस्तृत दलीलों को सुना। पीठ इस सवाल पर विचार कर रही है कि क्या एसआईआर प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं से विचलित हो सकती है।

प्रधान न्यायाधीश ने चिंता जताते हुए कहा कि मतदाता सूची में संशोधन से उन व्यक्तियों के लिए गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं जिनके नाम उसमें शामिल नहीं हैं।

सीजेआई ने मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन से जुड़ी जन प्रतिनिधि 1950 अधिनियम की धारा 21 का जिक्र करते हुए सवाल किया, ''यदि कोई बात लोगों के नागरिक अधिकारों को प्रभावित करती है, तो अपनाई जाने वाली प्रक्रिया उपधारा (2) के अनुसार क्यों नहीं होनी चाहिए?' जस्टिस बागची ने भी इन्हीं चिंताओं को दोहराते हुए सवाल उठाया कि क्या निर्वाचन आयोग न्यायिक समीक्षा से परे ''असीमित'' शक्ति का प्रयोग कर सकता है।

वैधानिक योजना का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि नियमों में से एक में यह प्रावधान है कि जब गहन पुनरीक्षण किया जाता है, तो मतदाता सूचियां नए सिरे से तैयार की जाती हैं। न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि क्या ऐसे सुरक्षा उपायों को पूरी तरह से दरकिनार किया जा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा, ''कोई भी शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती।''

अधिनियम की धारा 21 की उपधारा 3 का हवाला

द्विवेदी ने बचाव में अधिनियम की धारा 21 की उपधारा 3 का हवाला दिया, जिसमें लिखा है: ''उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, निर्वाचन आयोग किसी भी समय, दर्ज किए जाने वाले कारणों से, किसी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी भाग के लिए मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण ऐसे तरीके से निर्देशित कर सकता है जैसा वह उचित समझे।

बशर्ते कि इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची, ऐसे किसी निर्देश के जारी होने के समय लागू होने के अनुसार, निर्दिष्ट विशेष गहन पुनरीक्षण के पूरा होने तक लागू रहेगी।''

द्विवेदी ने दलील दी कि 1950 अधिनियम की धारा 21(3) आयोग को विशेष पुनरीक्षण करने के लिए एक विशिष्ट और स्वतंत्र शक्ति प्रदान करती है, जो धारा 21(1) और 21(2) के तहत परिकल्पित नियमित या आवधिक संशोधनों से अलग है। उन्होंने कहा, ''मेरा दलील है कि धारा 21 की उपधारा (2) और (3) एक ही क्षेत्र में लागू नहीं होती हैं।''

चीफ जस्टिस ने हालांकि एक तीखा सवाल किया कि क्या धारा 21(2) आयोग को नियमों से परे जाने में सक्षम बनाती है, तो क्या आयोग धारा 21(3) के तहत एसआईआर करते समय अपनी अधिसूचित प्रक्रियाओं से खुद को छूट दे सकता है। जस्टिस बागची ने धारा 21(2) और 21(3) के तहत जांच की प्रकृति पर विशेष रूप से दस्तावेजी आवश्यकताओं के आलोक में सवाल उठाया।

एसआईआर प्रक्रिया में 11 दस्तावेजों की आवश्यकता

उन्होंने बताया कि जहां फॉर्म-छह में सात दस्तावेजों का प्रावधान है, वहीं एसआईआर प्रक्रिया में 11 दस्तावेजों की आवश्यकता होती है। उन्होंने सवाल किया क्या निर्वाचन आयोग निर्धारित सूची में कुछ जोड़ या घटा सकता है और फॉर्म-छह के दस्तावेजों को पूरी तरह से बाहर कर सकता है। द्विवेदी ने दलील दी कि वैधानिक भाषा ने इस तरह के लचीलेपन की अनुमति दी और नियमों से विचलित होने का अधिकार धारा 21(3) में निहित है।

हालांकि, उन्होंने दोहराया कि आयोग मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकता और उसे अदालत को यह संतुष्ट करना होगा कि प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और पारदर्शी थी, संविधान के अनुच्छेद 326 को ध्यान में रखते हुए, जो वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। वर्तमान सुनवाई गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा दायर एक प्रमुख याचिका सहित विभिन्न याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें एसआईआर प्रक्रिया की वैधता और संवैधानिकता को चुनौती दी गई है।

 


Tags:

malhaar-media sir-madhya-pradesh supreme-court-of-india election-commision-of-india

इस खबर को शेयर करें


Comments