
प्रशांत पाठक।
लखनऊ से अयोध्या की ओर जब यूपी भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का रथ लाव-लश्कर के साथ निकला, तो यह सिर्फ़ एक यात्रा नहीं थी यह संदेश था।
संदेश सत्ता को भी, संगठन को भी और भीतर-ही-भीतर चल रही खींचतान को भी।रास्ते भर जिस तरह क़ाफ़िले में गाड़ियों की कतार जुड़ती गई, कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़ती गई, जिलों-जिलों में स्वागत के मंच सजे जिलों जिलों से स्वागत के लिए पार्टी के लोगो की ड्यूटी लगाई थी,यह सब किसी सहज उत्साह का परिणाम नहीं था।
यह सोच-समझकर रचा गया राजनीतिक दृश्य था।
कई जिलों के पदाधिकारियों को पहले से बुलाया गया, ज़िम्मेदारियाँ बाँटी गईं, ताकि साफ़ दिखे —
नया अध्यक्ष अकेला नहीं है
संगठन उसके पीछे खड़ा है
असल सवाल यही है।
क्या यह यात्रा सत्ता को आश्वस्त करने के लिए थी,
या सत्ता को चेतावनी देने के लिए? प्रदेश में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि सत्ता का केंद्र अलग दिशा में चल रहा है और संगठन की धड़कन कहीं और तेज़ हो रही है। एक डिप्टी सीएम ने जब सत्ता से बड़ा संगठन बताया तब से उनके अच्छे दिन बहुत अच्छे नही रहे लेकिन अब संगठन की इस रथयात्रा ने उस अंतर को और साफ़ कर दिया।
अयोध्या की ओर कूच कोई संयोग नहीं।यह हिंदुत्व के केंद्र से संगठन की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश है।

मानो यह कहा जा रहा हो
“सत्ता सरकार चलाए,
संगठन एजेंडा तय करेगा।”
यह भी साफ़ है कि यह पूरा आयोजन सिर्फ़ स्वागत नहीं,
बल्कि नए प्रदेश अध्यक्ष का ‘टैम्पो हाई’ करने का अभियान था और भाजपा में टैम्पो यूँ ही नहीं बढ़ाया जाता वह बढ़ाया जाता है जब भविष्य की लड़ाइयों के लिए जमीन तैयार करनी हो आज तस्वीर बदलती दिख रही है।कल समीकरण बदलेंगे और परसों… शायद नेतृत्व की भाषा भी
यूपी की राजनीति में
अब सवाल यह नहीं कि कौन सत्ता में है,
सवाल यह है कि
एजेंडा कौन तय कर रहा है?
और आने वाले चुनावों में कमान किसके हाथ होगी?
रथ चल चुका है।
काफ़िला बढ़ रहा है।
और टकराव… अब सिर्फ़ पर्दे के पीछे नहीं रहा।
राजनीति में संकेत कभी बेवजह नहीं होते।
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