जीतिये सर जी 23 मई को जीत सकें तो पर आप याद किये जायेंगे क्योंकि...

खरी-खरी            May 15, 2019


हेमंत कुमार झा।
आप जीतें या हारें, आप याद किये जाएंगे कि जब दुनिया भर के अखबार भारत की अर्थव्यवस्था के गम्भीर संकटों से घिरते जाने की खबरें छाप रहे थे, आपके लोग सड़कों पर राजनीतिक जुलूसों की शक्ल में जय श्री राम के नारे लगाते घूम रहे थे।

आपने, आपके सलाहकारों और राजनीतिक बगलगीरों ने इस बात की पुख्ता व्यवस्था की कि आम चुनाव में बेरोजगारी, मंदी की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था, आम लोगों के जीवन से जुड़े जरूरी मुद्दों का कोई जिक्र तक न हो और तमाम विमर्शों की धाराओं को पाकिस्तान, आतंकवाद, राष्ट्रवाद, संस्कृतिवाद आदि की ओर मोड़ दिया जाए।

निस्संदेह, आप इसमें बहुत हद तक सफल रहे। धारणाओं की कृत्रिम निर्मिति में आपके लोगों को महारत हासिल है और जैसे-जैसे चुनाव के दिन निकट आते गए, देश के माहौल में एक अजीब सी नकारात्मकता का संचार करने में वे सफल रहे।

तभी तो...जिन युवकों को आपसे यह सवाल पूछना था कि आपके 5 वर्षों के कार्यकाल में बेरोजगारी की दर इतनी बढ़ कैसे गई, आपके कौशल विकास कार्यक्रम का क्या नतीजा निकला, तकनीकी शिक्षा इतनी महंगी कैसे हो गई..., उनमें से अधिकतर मगन हैं कि आपने पाकिस्तान को "उसकी औकात दिखा दी"...कि... "पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया है" आदि-आदि।

आप भाग्यशाली हैं कि आपके दौर में देश में ऐसी पीढ़ी जवान हुई है जिसमें अधिकतर ने अधकचरी शिक्षा प्राप्त की है और उनका इतिहास बोध इतने निम्नस्तर का है कि खुद इतिहास को उन पर रोना आता होगा।

वाकई, आपको शुक्रगुजार होना चाहिये अपनी पूर्ववर्त्ती सरकारों का, जिन्होंने आमलोगों की शिक्षा के तंत्र को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यह उनकी ही विरासत है कि आज बंद दिमाग युवकों की फौज आपको प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जो आपके लिये सड़कों पर उत्पात मचाते हैं, माथे पर भगवा पट्टी बांध जय श्रीराम, जय हनुमान के नारे लगाते पूरे राजनीतिक माहौल को गंदा और शान्तिकामी समाज को आतंकित करते हैं।

आप याद किये जाएंगे कि भारत में 'आईटी सेल' नामक अवधारणा को आपके ही दौर में व्यापक स्तर पर जाना गया और महसूस किया गया कि लोक मानस में गलत तथ्यों की प्रतिस्थापना में इस सेल की कितनी प्रभावी भूमिका हो सकती है।

तभी तो...अंतरराष्ट्रीय मीडिया बार-बार कहता रहा कि बालाकोट एयर स्ट्राइक में कोई आदमी नामक जीव हताहत नहीं हुआ, न आतंकी कैम्प नामक कोई बिल्डिंग धराशायी हुई...लेकिन, आपके आईटी सेल ने सफलता पूर्वक यह सुनिश्चित किया कि कूढ़मगज लोगों की भीड़ न सिर्फ यह मान रही है, बल्कि बहस तक करने पर उतारू है कि एयरस्ट्राइक में ढाई-तीन सौ आतंकी मारे गए, कि फलां आतंकी कैम्प तो तहस-नहस कर दिया गया।

आपको याद किया जाएगा कि चुनाव प्रचार में आपने बतौर प्रधानमंत्री रैलियां करने का रिकार्ड कायम किया और किसी भी रैली में शायद ही कोई ऐसी बात की जो लोगों के जीवन के जरूरी मुद्दों से जुड़ी हो।


आपने नेहरू से राजीव तक को कोसने में जितना वक्त जाया किया उसका दस प्रतिशत भी यह बताने में नहीं किया कि कांग्रेस द्वारा बर्बाद की गई चीजों को सुधारने में आपने क्या-क्या किया और आपके उन कदमों के कौन से सकारात्मक परिणाम देश के सामने आए।

आप सेना के राजनीतिकरण के लिये तो इतने याद किये जाएंगे कि खुद सेना मन ही मन शर्मसार होगी। आपके लोगों ने देश, सरकार, पार्टी और सेना को एक ही धरातल पर ला कर जब विमर्शों को विकृत करने का प्रयास किया तो सेना के जवानों के मन पर क्या गुजरी होगी, यह सोचने की जहमत भी आपने नहीं उठाई।

दरअसल, आप और आपके सलाहकार ही तो इन प्रयासों के मूल में थे। मानना होगा कि पूरी तरह तो नहीं, लेकिन, आंशिक तौर पर इन प्रयासों से भी आपने विमर्शों को विकृत करने में सफलता पाई।

इन नकारात्मक अर्थों में ही सही, योजनाबद्ध राजनीति और चुनावनीति के शिखर पुरुष तो आप साबित हुए ही। भले देश के सामूहिक मानस पर इसका जो भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा हो।

हमारे कान तरस गए कि किसी चुनावी रैली में आप हमें यह बताते कि नोटबन्दी के ढाई वर्षों बाद इसके कौन से सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं, आयुष्मान भारत योजना के बजट में कितनी राशि आपकी सरकार ने डाली है, जियो यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेलेंस का अकादमिक जलवा कितनी उफान पर है, कितनी विश्वस्तरीय अकादमिक या चिकित्सा संस्थाओं की स्थापना आपने की है...।

नहीं, आप याद किये जाएंगे कि आपने प्रधानमंत्री की शब्द मर्यादाओं का कितना उल्लंघन कितनी बार, बार-बार किया और उन संस्थाओं को नाकाम बनाने में पूरी सफलता पाई जो इसके लिये आपको रोक सकते थे।

आप उन साक्षात्कारों के लिये भी याद किये जाएंगे जैसा किसी देश के किसी शासनाध्यक्ष ने शायद ही कभी दिया हो। पूरी तरह प्रायोजित और एकालाप से भरे साक्षात्कारों में उस पत्रकार रूपी विदूषक को कोई याद नहीं करेगा...हाँ, आप याद आएंगे और बहुत याद आएंगे। आपके दौर ने मीडिया के नैतिक पतन का जो अध्याय रचा है वह ऐतिहासिक है। स्टार एंकरों/एंकरानियों का इस तरह दलाल बन जाना और बड़े न्यूज चैनलों का इस तरह भोंपू बन जाना याद किया जाएगा...जैसे आप याद किये जाएंगे।

जीतिये सर जी...23 मई को अगर जीत सके तो। अभी तो कोई कुछ नहीं कह सकता कि क्या होगा, लेकिन इस देश की युवा पीढ़ी की बड़ी संख्या जिस तरह भ्रमित की गई है और खाए-पिए अघाए लोग जिस कदर स्वार्थी और जनविरोधी बन गए हैं, कमजोर वर्गों में जिस तरह राजनीतिक विभाजन हो गया है, आप के जीत जाने में क्या आश्चर्य।

वैसे, आप जीतें या हारें, आपका दौर भारतीय राजनीति की पतनशीलता, मध्यवर्ग की विचारहीनता और विश्लेषण रहित, सूचनानिष्ठ शिक्षा प्रक्रिया से निकलते भ्रमित युवाओं के लिये याद किया जाएगा, जिन्हें विविधताओं, जटिलताओं और समस्याओं से भरे इस देश में भ्रामक राष्ट्रवाद की घुट्टी पिला कर खुद से ही गाफिल रखने में आपने और आपके लोगों ने बड़ी सफलता पाई है।

आप याद रहेंगे...क्योंकि आपने इतिहास की सबसे गरीब विरोधी सरकार चलाते हुए भी सबसे अधिक जिस शब्द का उच्चारण किया है, वह है...'गरीब'।
लेखक पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय में एसोशिएट प्रोफेसर हैं।

 


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