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झाारखंड सरकार की राहत और पेट्रोलियम पदार्थों का गणित

खास खबर            Jan 01, 2022


राकेश दुबे।

चलिए ,देश में कहीं तो राज्य सरकार नागरिकों के हितों  का सोच रही है| यह झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार है। जिसने अपने राज्य के राशनकार्डधारी दुपहिया वाहन चालकों को प्रति लीटर पेट्रोल में 25 रुपये की राहत देने की घोषणा की है।

वैसे तो सारे देश में पेट्रोलियम पदार्थ {ईंधन}के दाम एक समान करने की कोशिश राज्यों और केंद्र को मिलकर करना चाहिए, पर पता नहीं क्यों, इस मुद्दे पर विचार नहीं होता|

मध्यप्रदेश जैसे अन्य राज्यों के लोगों को भी इसी दर पर ये सामग्री उपलब्ध होना चाहिए अभी मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थ सबसे महंगे है|
 
यूं तो पूरे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली में रचनात्मक विकास से जनता की आकांक्षाओं पर खरे न उतर पाने वाले राजनेता जनता को मुफ्त का प्रलोभन अक्सर देते नजर आते हैं। खासकर उन राज्यों में, जहां चुनाव नजदीक हों।

झारखंड की सोरेन सरकार ने अपने कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर सस्ता पेट्रोल देने का वादा किया है, लेकिन हर किसी के दिमाग में यही सवाल है कि इस सस्ते पेट्रोल का अर्थशास्त्र क्या होगा?

इसकी वजह यह है कि पेट्रोल के दाम में राज्य सरकार का हिस्सा सिर्फ वैट के रूप में होता है। यदि कोई सरकार पूरा वैट माफ कर दे तो भी 25 रुपये की छूट नहीं दी जा सकती।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों दीवाली के आसपास मोदी सरकार ने उत्पाद शुल्क में कमी करके जनता को राहत दी थी, जिसके बाद कुछ राज्य सरकारों ने भी वैट में कमी करके जनता को अतिरिक्त राहत दी थी। लेकिन यह राहत ज्यादा बड़ी है।

झारखंड में 26 जनवरी, 2022 से राहत की नई व्यवस्था लागू हो रही है, लेकिन सवाल वही है कि यह मुमकिन कैसे होगा?

कह सकते हैं कि यह फैसला अभूतपूर्व है और महंगाई के दौर में जनता को राहत देने के लिये अन्य राज्यों के लिये अनुकरणीय है।

हाल के महीनों में जिस तेजी से पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़े हैं, उसने लोगों का बजट बिगाड़ दिया है। वहीं बाजार में महंगाई में जो अभूतपूर्व तेजी देखी जा रही है, उसमें पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई की भी भूमिका हैं क्योंकि डीजल के दामों में वृद्धि से मालभाड़े में वृद्धि हो जाती है। हालांकि यह ट्रेंड वैश्विक है।

पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में तेजी से जनता में बेचैनी है। ऐसे में जहां एक ओर देश के अन्य राज्यों की जनता में झारखंड की तरह दामों में राहत देने की आकांक्षा बढ़ेगी, वहीं राजनीतिक कारणों से ऐसी प्रतिस्पर्धा भी पैदा हो सकती है।

निस्संदेह, समाज के कमजोर वर्गों को राहत दी जानी चाहिए। ऐसे में यह प्रयास एक मिसाल है, जो स्कूटर व मोटरसाइकिल धारकों के लिये  तुरंत राहतदेता  है। हालांकि, इस योजना के क्रियान्वयन की अपनी दिक्कतें होंगी।

इसे लागू करना सरल नहीं होगा। जहां एक ओर पेट्रोल पंपों पर पारदर्शी व्यवस्था बनानी होगी, वहीं कोशिश करनी होगी कि इस छूट का दुरुपयोग न हो। कहीं रियायती दरों के पेट्रोल का उपयोग चौपहिया वाहन चालक येन-केन प्रकारेण न करने लग जाएं।

पेट्रोल पंपों की कार्यप्रणाली को लेकर तमाम सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में जरूरतमंदों को दी जानी वाली राहत का क्षरण रोकना प्राथमिकता हो, जिसके लिये हर राज्य में एक व्यावहारिक ढांचा बनाये जाने की जरूरत है, ताकि छूट व सब्सिडी का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच पाये।

सवाल वही है कि पहले से कर्ज में डूबे राज्य में पूरा वैट माफ करने के बाद भी सब्सिडी देने से राज्य की वित्तीय सेहत कैसे कायम रह सकेगी। उल्लेखनीय है कि पेट्रोल पर मुख्य रूप से तीन कर लगते हैं। पहला केंद्र सरकार द्वारा लगाये जाने वाला उत्पाद शुल्क, जिसमें राज्य सरकार कटौती नहीं कर सकती।

दूसरा डीलर का कमीशन होता है जिसे वे छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। तीसरा राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाला वैट है, जो फिलहाल कहीं –कहीं  न्यूनतम बाइस प्रतिशत है, जो प्रति लीटर पेट्रोल पर साढ़े सत्रह रुपये के आसपास होता है।

ऐसे में राज्य सरकार को पूरा वैट छोड़ने के बावजूद साढ़े सात रुपये के करीब सब्सिडी प्रति लीटर देनी पड़ेगी। तब जाकर राज्य सरकार प्रति लीटर पच्चीस रुपये की छूट दे पायेगी। ऐसे में सरकार इस योजना को खस्ता माली हालत में कितने दिन चला पायेगी?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और प्रतिदिन पत्रिका के संपादक हैं।

 


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