Breaking News

पत्रकार दलाल नहीं हो सकता और दलाल कभी पत्रकार नहीं हो सकता।

मीडिया            Oct 04, 2019


राघवेंद्र सिंह।
दलालों पत्रकारिता छोड़ो ये शीर्षक श्रमजीवी पत्रकारों के बीच एक नारे की पहली लाईन है और इसकी अगली लाईन है पत्रकारों दलाली छोड़ो भोपाल के हमीदिया कॉलेज से एलएल बी. करने के बाद 1985-86 में मैंने शाम के अखबार सांध्य प्रकाश में नौकरी शुरू की थी।

पहले जूनियर पत्रकारों को बतौर प्रशिक्षु रखा जाता था। इसमें खबरों के प्रूफ पढ़ने और प्रेसनोट बनाने से प्रशिक्षण का आरंभ होता था। हमारे हिसाब से वर्ष 85 से पत्रकारिता का सूरज भरी दोपहरी में तपने के साथ 2003 के बाद ऐसा लगता है पत्रकारिता ढलान पर आने लगी थी।

बात 1992 के बाद की है। दैनिक नई दुनिया में पत्रकारों ने हड़ताल की, तब यह नारा बुलन्द हुआ दलालों पत्रकारिता छोड़ो

उस समय मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया थे और उनके अभिन्न मित्रों में थे जुझारु जगत पाठक। हड़ताल से पहले जगत दादा से पत्रकार संघ की अनबन थी। मगर हड़ताल के दौरान उनके भीतर का कामरेड जागा और वे हड़तालियों के तंबू मे आ पहुंचे और उनकी आमद से ही पत्रकारों में जोश आया।

सुबह पांच-छह बजे तक नारेबाजी होने के साथ अखबार को छपने से रोकने के लिए बिजली कट करना और किसी तरह छपे अखबार को बंटने से रोकने के लिए पुलिस से भी दो- दो हाथ करना हमारी आँखों के सामने हुआ। इसमें एक डीएसपी का हाथ भी टूट गया था।

तब मैं नई दुनिया में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा था। लेकिन पत्रकारिता और दलाली के बीच की लाईन में जब फंसे तो मुझ जैसे कई लोग आंदोलन करने वालों के साथ खड़े थे।

अखबार प्रबंधन की खिलाफत में नौकरी जाने का अंदेशा मंडरा रहा था। लेकिन आंदोलन विशेष संवाददाता दिनेश जोशी और सरिता अरगरे से प्रबंधन के दुर्व्यवहार को लेकर था। इन दोनों के लिए भोपाल के पत्रकारों का एकजुट होना एक मिसाल बन गया था।

आंदोलन सफल हुआ बाद में उसके क्या नतीजे हुए ये आज का विषय नहीं है लेकिन यह जरूर है कि तब पत्रकार केवल सच्ची पत्रकारिता और उसके मूल्यों के लिए भूखे रहकर भी काम करने का माद्दा रखते थे। बात लंबी हो रही है मगर मुद्दा पत्रकारों का इसलिए एक बात और जोड़ूंगा कि तब सच्ची और अच्छी पत्रकारिता ज्यादा थी।

यही वजह है कि अर्जुन सिंह से लेकर सुन्दरलाल पटवा,दिग्विजय सिंह और बाबूलाल गौर तक खबरों को लेकर न तो कोई भय था और न संकोच। अच्छी बात यह थी कि राजनेता भी इसका बुरा भले ही मानते हों मगर रोजमर्रा की बातचीत में उसे व्यक्त नहीं करते थे। होने को तो शिवराज सिंह चौहान तक कह सकते हैं व्यक्तिगत तौर पर यह सिलसिला चला।

पूरे मामले में जनसंपर्क और सरकार के शुभचिंतक अलबत्ता 2003 के बाद पत्रकारिता को ज्यादा प्रभावित करने के प्रयास करने लगे। अखबार और मीडिया हाउस के मालिकों की तरफ से मार्केटिंग डिपार्टमेंट से होता हुआ दलाली तक जा पहुंचा। कभी ऐसा होगा इसकी कल्पना कठिन है।

लेकिन हम इसे जिस घिन आने वाले स्तर तक जाता देख रहे हैं उसी के चलते सत्ता , नौकरशाह, बिल्डर, उद्योगपति के साथ देह व्यापार,विष कन्या और अब अंग्रेजी में हनी ट्रेप जैसा नाम राजनेता अफसर,सैक्सी सुन्दरियों तक जा पहुंचा है।

इसमें अखरने वाली बात ये है इन कड़ियों में अब मीडिया की भागीदारी भी बराबर की हो गई लगती है। जो आईना बदसूरती बताता था वो खुद ही स्याह हो गया है। और यहीं से शुरू होती है बात दलालो पत्रकारिता छोड़ो। क्योंकि पत्रकार दलाल नहीं हो सकता और दलाल कभी पत्रकार नहीं हो सकता।

असल में सरकार में बैठे लोगों के लिए पत्रकारिता में दलाली पसंद है।

नए जमाने के हिसाब से मीडिया उद्योग हो गया है तो उसमें मालिकों के लिए खबर नहीं बल्कि सरकार से माल लाने और अफसरों से काम निकलवाने वाला मीडिया मैनेजर(दलाल) पसंद है। इसके लिए मीडिया और इवेन्ट मैनेजरों की एक नई नस्ल पैदा हुई है जो रेड लाईट एरिया से होती हुई वैश्विक भाषा में बैंकाक की मौजमस्ती भरी दुनिया बनाने में लग गई।

भोपाल इंदौर में जो सैक्स सुन्दरियां नाम इसलिए दिया जा रहा है कि कभी चंबल के बीहड़ों में दस्यु गिरोह में जो महिला डकैत होती थीं उन्हें बाद में दस्यु सुन्दरी कहा गया। सत्ता के गलियारों में पिछले बीस साल में जो बीहड़ विकसित हुए हैं उसमें चंबल के दस्यु सम्राटों और उनके गिरोह को ठंडा रखने वाली सुन्दरियां अब पढ़ी लिखी फर्राटे से अँग्रेजी बोलने वालियों का गिरोह भी हनी ट्रैप के नाम से काम कर रहा है।

सियासत के लिए ईमानदार पत्रकारिता सबसे ज्यादा खतरनाक है। इसलिए एक योजना के तहत सरकारें किसी भी पार्टी की हों उनका निशाना पत्रकारों और खबरों को संदेहास्पद बनाना रहा है। मीडिया हाउस को पैसे का लाभ देने के बाद सरकारों ने अपने दलालों को कब पत्रकारों का चोला पहनाकर अपना गुलाम बनाया पता ही नहीं चला।

पिछले पन्द्रह दिनों से मध्यप्रदेश में मंत्री सांसद विधायक अफसर और उद्योगपतियों के बीच बिछने वाली सैक्स सुन्दरियों के सौदे कराने में दलाली करने वाले कथित पत्रकारों के नाम आ रहे हैं। इसमें मीडिया से जुड़ी महिलाएं भी शामिल हैं। जांच में लगी एजेंसी और सरकार को एक बिन मांगी सलाह है कि वे सियासी तौर पर अपने दुश्मन और दोस्त के नाम जब सुविधाजनक हालात हों तब उजागर करें लेकिन मीडिया से जुड़े जो भी नाम सैक्सी सुन्दरियां बता रहीं हैं उन्हें जितना जल्दी हो सके जनता के सामने लाएं।

ऐसा नहीं होने पर ये मान लेना चाहिए कि पत्रकारिता और राजनीति तो अपनी जगह है लोकतंत्र के लिए प्रति घंटे नुकसान हो रहा है। अगर पत्रकारिता में पवित्रता हालांकि अभी यह शब्द किताबी लगता है मगर इस पेशे की ईमानदारी संकट में आई तो सभी को नुकसान है।

फिलहाल मीडिया हाउस में दिल्ली से लेकर चंबल, बुन्देलखण्ड और भोपाल में मीडिया की आड़ में दलाली करने वाले पत्रकारों के नाम यहां की फिजां को गन्दा कर रहे हैं। ये तमाम लोग सत्ता में बैठे लोगों की मूंछ और पूंछ के बाल रहे हैं।

घबराहट सब में है लेकिन सवाल आईने का है। उसके गंदे रहने से साफ सुथरी पत्रकारिता के चेहरे हैं वे भी बदरंग के रूप में बदनाम हो रहे हैं। बात यहीं रुकती जो भले राजनेता और सज्जन अधिकारी भी मुसीबत में हैं। सोशल मीडिया पर जोक चल पड़े हैं कि शाम होते ही नेता और अधिकारी अपने घर पत्नी से फोन कर पूछते हैं आज सब्जी में क्या लेकर आना है। खबर ये है कि सरकार ने हनी गैंग के मनी मामले में शामिल लोगों के नाम उजागर करने के बजाए ठंडे बस्ते में डाल दिए हैं।


हनी मनी मामले में डीजीपी वीकेसिंह औऱ एसटीएफ के मुखिया पुरुषोत्तम शर्मा में गाजियाबाद फ्लैट को रेस्टहाऊस बनाने के मामले में शर्मनाक विवाद शुरू हो गया है। फ्लैट किराए से लिय़ा था एसटीएफ से जुड़े लोगों को रुकने के लिए मगर इसके दुरुपयोग की खबरें आ रही हैं।

मुख्यमंत्री कमलनाथ के आने तक इन दोनों अफसरों में तनातनी चलती रहेगी। खबर ये भी है कि एसटीएफ में दो महिलाओं का भी दखल है। एक डीएसपी रैंक की है तो दूसरी भोपाल में पदस्थ एक थाने की एएसआई।

मध्यप्रदेश के साथ छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र की राजनीति में बवाल मचाने वाले सैक्स स्केंडल की जांच के लिए अंतर्राज्यीय अधिकारियों की टीम बनाने की बात भी हो रही है। चूंकि इसमें मंत्री सांसद और आईएएस,आईपीएस अफसरों की सैक्स रिकार्डिंग और आडियो क्लीपिंग भी है।

ऐसे में प्रदेश के जूनियर आफीसर मंत्रियों और बड़े अफसरों से निर्भय होकर कैसे पूछताछ कर सकते हैं? कहा जा रहा है केन्द्र सरकार या हाईकोर्ट मामले की गंभीरता को लेकर संज्ञान ले और विभिन्य राज्यों के चुनिन्दा अफसरों की जांच टीम बनाए और इसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति करें।

हाईप्रोफाइल सैक्स स्केंडल की जांच के लिए गठित एसआईटी में पहले आईजी सीआईडी डी.श्रीनिवास वर्मा को कमान सौंपी थी। 24 घंटों के भीतर ही उन्हें हटा दिया गया और सख्त मिजाज एडीजी संजीव शमी को जांच सौंपी गई। अब अंदर खाने की खबर ये है कि शमी को भी हटा कर किसी अन्य अफसर को यह काम सौंपा जा सकता है।

हालांकि ऐसा करना कठिन होगा और इससे सरकार मुश्किल में पड़ सकती है। देखते हैं सत्ता,सियासत,सैक्स सुन्दरी औऱ सौदेबाजी का ये खेल क्या क्या गुल खिलाता है।

अभी तो सब दम साधे देख रहे हैं क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के साथ नौकरशाही के दिग्गजों की इस काजल की कोठरी में कलमुंहें बनने की खबरें हैं।

भारत : या तो सपने या बदला
हम देश और विदेश दोनों में भारत के विकास के सपने दिखा रहे हैं | इन सपनों को पूरा करने के मंसूबे हिकमत और हिम्मत के कसीदे पढ़ रहे है | हकीकत कुछ और ही है | आर्थिक मंदी से गुजरते देश के सामने बेरोजगारी और गरीबी बड़े संकट है इनके मूल में जनसंख्या वृद्धि और प्राकृतिक आपदा हैं | इन चारों को नियंत्रित करने की कोई ठोस योजना नहीं दिख रही | देश की हालत यह है और हम भारत के लिए बल्कि नहीं बल्कि पूरे विश्व के प्रति सरोकार दिखा कर और अपनी चिंताएं साझा कर रहे हैं । प्रधानमन्त्री के अमेरिका से लौटने और पिछले ३ दिनों में गाँधी जी के बहाने पक्ष-प्रतिपक्ष के देश में प्रचारित चिन्तन का तो यही सार है |

जैसा प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि भारत के विकास के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनका परिणाम पूरी दुनिया के लिए लाभदायक होगा। इस तरह हम पूरी दुनिया के सपने के लिए काम कर रहे हैं। वे कहते हैं कि भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिया है, वह विश्व बंधुत्व और शांति का पक्षधर है। दूसरी और कांग्रेस है,वो सारी बातें करती हैं, आलोचना भी करती है पर कोई ठोस उपाय नहीं सुझाती | प्रतिपक्ष कोई भी रहा हो, उसका रवैया हमेशा से ऐसा ही रहा है | हम कुर्सी पर तो ठीक वरन तो न रचनात्मक सुझाव देंगे और ही सही दिशा के लिए कोई जन जागरण ही करेंगे | आन्दोलन तो दूर की बात है | महात्मा गाँधी से दोनों को सीखने की जरूरत है |

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पूरा विश्व महात्मा गांधी की १५० वीं जयंती मना रहा है। उनका सत्य और अहिंसा का संदेश आज भी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। उन्होंने विवेकानंद का भी नाम भी कहीं लिया और कहा कि करीब सवा सौ साल पहले भारत के आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में विश्व धर्म संसद को शांति और सौहार्द का संदेश दिया था, आज सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का भी दुनिया के लिए वही संदेश है- शांति और सौहार्द। क्या देश का पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों शांति और सौहाद्र के पक्ष में हैं ? शायद नहीं |

प्रधानमंत्री भारत के नव निर्माण अभियान कि चर्चा करते हैं और कहते हैं कि सरकार की कई योजनाएं देश की तस्वीर बदल रही हैं। इस क्रम में वे आयुष्मान भारत, स्वच्छता अभियान और जनधन योजना की प्रगति के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि जन भागीदारी से जन कल्याण की भावना बडी है शायद हकीकत ऐसी नहीं है । प्रधानमंत्री मोदी ने कहीं यह भी कहा कि भारत सरकार जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके तहत १५ करोड़ घरों को पानी की सप्लाई से जोड़ा जाएगा।

 

अभी तो देश पानी-पानी है | हमारी जल संरक्षण की योजना सफल नहीं हुई है | भारी बरसात ने हमारे जल संचय की नीति को नाकाफी साबित किया है | सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्ति के लिए पूरे देश में एक बड़ा अभियान शुरू हो गया है।

भारत विश्व स्तर पर भी सोलर ऐनर्जी को प्रोत्साहित करने का काम कर रहा है। आतंकवाद पर हमारी आवाज से आतंक के खिलाफ दुनिया को सतर्क हुई है | लेकिन अभी और गंभीरता की जरूरत है । गाँधी जी तरक्की के रास्ते पर पूरे विश्व के साथ मिलकर चलना चाहते थे और वे हमेशा दुनिया में अमन-चैन की स्थापना का पक्षधर रहे ।

देश का दुर्भाग्य है देश का प्रतिपक्ष इससे मुतमईन नहीं है | जैसा श्रीमती सोनिया गाँधी ने कहा कि “ पिछले ५ सालों में जो हुआ उससे बापू की आत्मा दुखी होगी |” अगर बापू होते तो वे रचनात्मक सुझाव देते, जन जागरण करते और बात न बनने पर आन्दोलन करते | अब प्रतिपक्ष सिर्फ वो आन्दोलन करता है जिसका उद्देश्य कतई रचनात्मक नहीं होता और सरकार भी व्यवस्था सुधार के नाम पर प्रतिपक्षियों पर जो कार्रवाई करती है वो बदले जैसी दिखती है | दोनों को बापू को समझना चाहिए, इसी में सार है |

तुम तब तक सुखी नहीं हो सकते : बापू
कुछ दिन पहले हुए सर्वे में यह पता चला कि देश के ७७ फीसदी युवा अपना आदर्श गांधी को मानते हैं। इसका अर्थ यह है कि देश के अधिकांश युवा गांधी को अपना रोल मॉडल मान रहे हैं। माने क्यों नहीं, ७० बरस बाद भी देश में ऐसा कोई दूसरा रोल मॉडल नहीं दिखता जिसके पीछे देश चले | गाँधी के बाद लालबहादुर शास्त्री में गाँधी सी चमक थी, पर धमक नहीं थी | उसके बाद जो भी आये, गये और हैं उनमें से एक-दो को छोड़ दे तो कोई भी वैसा नहीं है | गाँधी के आलोचक भी इस बात से इंकार नहीं कर सकते की गाँधी ने ही भारतीयों “सविनय अवज्ञा” की दीक्षा दी जिससे हम भारतीय आज दुनिया में सर उठाते हैं | दुर्भाग्य ७० साल में देश में अच्छा- बुरा सब कुछ हुआ, पर वो नहीं हुआ जो गाँधी चाहते थे |

एक इस सवाल का देश की सारी सरकारों से पूछना होगा जो अब तक गांधी को नकारती आईं हैं| महात्मा गांधी ने जिस ‘हिन्द स्वराज’ का खाका दिया था, उस पर हमारे नेतृत्वकर्ता हमेशा चलने से क्यों कतराते रहे? गांधी लघु उद्योग और स्वरोजगार से देश के हर व्यक्ति को काम देना चाहते थे। जबकि हमारे पिछले- अगले और वर्तमान नेतृत्व अपनी आर्थिक नीतियों से युवाओं को बेरोजगारी के दलदल में धकेलते रहे हैं। यही देश का भाग्य बनता जा रहा है | सही मायने में आजादी के बाद जो थोडा लघु उद्योग फैला वह अंतिम सांसें गिन रहा है। बड़े पूंजीपति घरानों के चंगुल में तो देश बहुत पहले जकड़ चुका था। अब विदेशी पूंजी के हवाले हमारे खुदरा और घरेलू रोजगारों को भी सौंपा जा रहा है। कुल मिलाकर हम ऐसी अर्थ व्यवस्था के हवाले कर दिए गये हैं जिसे महात्मा गांधी गरीब पैदा करने वाली व्यवस्था बताते थे।

बावजूद इस अनर्थ अर्थतंत्र में महात्मा गांधी ही एकमात्र विचार हैं जिन्हें अपनाकर देश और समाज को बचाया जा सकता है। यह सोचने की बात है कि गांधी जी को राष्ट्रपिता क्यों कहा गया? दरअसल, महात्मा गांधी पूरे विश्व के लिए सोचते थे। वैचारिक दृढ़ता और हर इंसान की फिक्र ने उन्हें स्वतः ही राष्ट्रपिता बना दिया। उनके जीवन में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं था, उनका पूरा जीवन एक संयुक्त परिवार था। जिसमें उनके लिए भी जगह थी जो उनसे घोर असहमत थे। भारत में विदेशी कपड़ों की होली जलाने के लिए प्रेरित करनेवाले महात्मा गाँधी जब गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए ब्रिटेन गये , तो मौका मिलते ही वे लंकाशायर के कपड़े कारखानों के मजदूरों के बीच जा पहुंचे | जो भारत में चल रहे स्वदेशी आंदोलन के कारण बेकार हो रहे थे और उन्हें समझाने की कोशिश की कि हमें तो आपसे प्रेम ही है, पर हम नहीं चाहते कि इंग्लैंड की मिलों में बनने वाले कपड़े भारत के लाखों जुलाहों को बेरोजगार कर दें और हमारी आर्थिक आत्मिनर्भरता को नष्ट करने का औजार बने। ऐसी अपेक्षा वर्तमान नेतृत्व से व्यर्थ है | अब तो सर्वहारा की जगह सर्वसमर्थ के कसीदे पढने की परम्परा बन रही है |

एक बात यहाँ यह भी समझना जरूरी है कि महात्मा गांधी कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं थे कि जो आत्मिक शांति का कोई मन्त्र दे जाते जिससे परलोक सुधर जाता या जायेगा | उन्होंने कई बार कहा था कि “मैं दोबारा जन्म लेना नहीं चाहता-मुझे तो मोक्ष चाहिए” लेकिन उनका मोक्ष किसी आध्यात्मिक साधना में नहीं था। दरअसल, वे जिसे आध्यात्मिक कहा करते थे, वह पूरी तरह से इहलौकिक था। गांधी जी को इस संसार की चिंताएं ही सताती थीं। उनका पूरा जीवन इन चिंताओं से लड़ते हुए ही गुजरा। भारत ने उनके चिन्तन को संवारा नहीं, अब नई पीढ़ी सोच रही है | अच्छा है |

वस्तुत: सत्य, अहिंसा, प्रेम, सादगी जैसे विचारों की पूंजी पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। ऐसे में आधुनिक तकनीकी उपाधियों को हासिल करके वैश्विक अर्थव्यवस्था का शिकार और एकल जीवन की ओर उन्मुख आज की युवा पीढ़ी महात्मा गांधी से अगर कुछ सीख सकती है तो वह है- किसी भी ऐसी चीज का इस्तेमाल करना अनैतिक है जो जनसाधारण को सुलभ नहीं कराई जा सकती। इसका सार तत्व है कि तुम तब तक सुखी नहीं हो सकते जब तक तुम्हारा समाज सुखी नहीं हो जाता।

 


Tags:

सरकार-में-बैठे-लोगों-के-लिए-पत्रकारिता-में-दलाली-पसंद-है

इस खबर को शेयर करें


Comments