मल्हार मीडिया ब्यूरो।
संसद में आज गुरूवार 29 जनवरी को पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत को जो उद्यमशील राष्ट्र बनने की सख्त जरूरत है, उसके लिए आवश्यक है कि ईमानदार अधिकारियों को परेशान करने वाले मुकदमों से बचाया जाए।
इसमें कहा गया है कि कानूनी और संस्थागत ढांचों में सद्भावनापूर्ण निर्णय लेने के वास्ते अधिकारियों को संरक्षण देने के उपायों को संहिताबद्ध किया जाना चाहिए और त्रुटि को भ्रष्टाचार से स्पष्ट रूप से अलग किया जाना चाहिए।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में लोक सेवकों के अभियोजन से संबंधित कानूनों में संतुलन के अलावा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) जैसी एजेंसियों के दृष्टिकोण में बदलाव का सुझाव दिया गया है।
इसमें कहा गया है कि हर प्रतिकूल परिणाम, इरादे या क्षमता की विफलता नहीं होता, क्योंकि कुछ परिणाम परिकल्पनाओं, समय, समन्वय और जवाबदेही के लौकिक आयाम की विफलताएं होते हैं।
समीक्षा में कहा गया है, ‘‘पूर्वानुमानों के आधार पर स्पष्टता और परिणामानुसार आनुपातिकता, वास्तविक समय की जांच से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसी एजेंसियों और सतर्कता प्रणालियों के दृष्टिकोण में स्पष्ट बदलाव की आवश्यकता हो सकती है। साथ ही, लोक सेवकों पर मुकदमा चलाने से संबंधित कानूनों में उचित संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक होगा।’’
समीक्षा रिपोर्ट में ‘‘रणनीतिक लचीलापन और रणनीतिक अनिवार्यता का निर्माण: राज्य, निजी क्षेत्र और नागरिकों की भूमिका’’ शीर्षक के एक अध्याय में कहा गया कि भारत को जिस उद्यमशील राष्ट्र (बनाने) की सख्त जरूरत है, उसके लिए ईमानदार अधिकारियों को परेशान करने वाले अभियोजन से बचाया जाना चाहिए।
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