मल्हार मीडिया ब्यूरो।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश किया। इसमें एक नई तरह की टैक्स पॉलिसी का संकेत मिलता है। सर्वे अनहेल्दी फूड पर भारी टैक्स लगाने का सुझाव देता है। इसकी वजह देश में मोटापे की लहर है। इकोनॉमिक सर्वे में आगाह किया गया है कि भारत में मोटापे के बढ़ते मामले लंबे समय में स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी पड़ सकते हैं।
सर्वे के अनुसार, मोटापे से जुड़ी बीमारियां अब एक बार के अस्पताल इलाज के बजाय लगातार आउट पेशेंट देखभाल की मांग कर रही हैं। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, जांचों और प्राथमिक देखभाल सुविधाओं पर दबाव बढ़ेगा। ये बीमारियां सामान्य बीमारियों की तरह नहीं हैं जिनमें एक बार इलाज के बाद छुटकारा मिल जाता है।
मोटापे से जुड़ी बीमारियों में मरीजों को नियमित जांच, फॉलो-अप और लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है। इससे डॉक्टरों से सलाह लेने, जांच कराने और बार-बार फॉलो-अप के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ेगी।
सर्वे ने मोटापे को गैर-संचारी रोगों (NCD) और डिजिटल लत जैसी प्रमुख स्वास्थ्य चिंताओं के साथ जोड़ा है। इसमें कहा गया है कि इन समस्याओं से निपटने के लिए केवल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। हेल्थ पर फोकस्ड चैप्टर में मोटापे, गैर-संचारी रोगों और डिजिटल लत के प्रबंधन में निजी क्षेत्र और नागरिकों की भूमिका पर जोर दिया गया है।
मोटापा बन गया है टेंशन की वजह
2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, सर्वेक्षण में बताया गया है कि 24% भारतीय महिलाएं और 23% भारतीय पुरुष अधिक वजन वाले या मोटे हैं। 15-49 वर्ष की आयु के वयस्कों में 6.4% महिलाएं और 4% पुरुष मोटे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अधिक वजन की समस्या 2015-16 में 2.1% से बढ़कर 2019-21 में 3.4% हो गई है।
सर्वे ने बचपन के मोटापे को एक गंभीर चिंता का विषय बताया है। इसमें कहा गया है कि 2020 में भारत में 3.3 करोड़ से अधिक बच्चे मोटे थे। यह संख्या 2035 तक 8.3 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
सर्वेक्षण ने मोटापे के बढ़ते स्तर के पीछे जीवनशैली से जुड़े कारणों पर रोशनी डाली है। इनमें शारीरिक गतिविधि में कमी, स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी और खान-पान की आदतों में बदलाव शामिल हैं, खासकर बच्चों और युवाओं में।
सबसे ज्यादा टैक्स लगाने का सुझाव
एक मुख्य कारण भारतीय खान-पान में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) का तेजी से प्रसार है। सर्वे में कहा गया है, 'भारत UPF की बिक्री के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। इसमें 2009 से 2023 तक 150% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। 2006 में UPFs की खुदरा बिक्री 0.9 अरब डॉलर से बढ़कर 2019 में लगभग 38 अरब डॉलर हो गई। इसी अवधि में पुरुषों और महिलाओं दोनों में मोटापे का स्तर लगभग दोगुना हो गया।
सर्वेक्षण ने UPF की बढ़ती खपत के आर्थिक प्रभाव पर भी ध्यान आकर्षित किया। इसमें कहा गया है, 'UPFs के बढ़ते इस्तेमाल से स्वास्थ्य खर्च में बढ़ोतरी, उत्पादकता में कमी और दीर्घकालिक वित्तीय बोझ के जरिये एक महत्वपूर्ण आर्थिक लागत आती है।'
राजकोषीय उपायों की भी रूपरेखा तैयार की गई। सर्वेक्षण में कहा गया है, 'चीनी, नमक या वसा के लिए निर्धारित सीमा से ज्यादा UPFs पर जीएसटी का सबसे ऊंचा स्लैब और सरचार्ज लगाने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। इससे प्राप्त राजस्व का इस्तेमाल पोषण शिक्षा और गैर-संचारी रोग रोकथाम कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए किया जा सकता है।'
साथ ही, सर्वे में चल रहे सरकारी हस्तक्षेपों की रूपरेखा भी बताई गई। एनसीडी की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत 31.5 करोड़ से अधिक वयस्कों की जांच की गई है। 8.47 करोड़ को अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त पाया गया है। मोटापे में बढ़ोतरी को धीमा करने के प्रयासों के हिस्से के रूप में आहार जागरूकता, शारीरिक गतिविधि और तेल की खपत को कम करने पर केंद्रित अभियानों का जिक्र किया गया।
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