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जाग जाओ शेखचिल्ली जाग जाओ

प्रदेश लार्इव            Aug 20, 2019


नीतिश कुमार पाल।
शहर की कानून व्यवस्था पर लिखने का अब मन नहीं करता है। लिखूं भी तो क्या लिखूं। शिवराज के राज में निरंकुश हुई इंदौर की पुलिस कमलनाथ और उनके खास बाला बच्चन के भी वश में नहीं आ पा रही है।

इंदौर में चार-चार सालों तक आतंकवादी छुपे बैठे रहते हैं। एनआईए उन्हें उठाकर ले जाती है और इंदौर पुलिस गांधारी के सामान अंधत्व को प्यार करती रहती है।

शहर में राह चलते लूट की घटनाएं बढ़ती जाती है। मालवा मिल पर पत्रिका इंदौर के संपादक को लूटा जाता है तो विजयनगर में भय्यू महाराज की पत्नी का मोबाइल लूट लिया जाता है और पुलिस के लिए ये सामान्य घटना होती है।

इससे भी बढ़कर पुलिस की हरकतें हैं। थानों में बैठे पुलिसवाले शिकायत करने आने वालों से जिस तरह का व्यवहार करते हैं वो किसी भी इज्जतदार को खौफजदा करने के लिए काफी है।

इंदौर में अपराध बढ़ रहे हैं ये कहते हुए संजीव शमी ने इंदौर के सराफा, राजबाड़ा, मालवा मिल, 56 दुकान, सहित पुराने बाजारों को 12 बजे ही बंद करवाना शुरू कर दिया था। उस समय दलील दी गई थी कि बाजार बंद होने से पुलिसिंग में मदद मिलेगी और अपराध कम होंगे, लेकिन हो इसका उल्टा ही रहा है।

बाजार खुले रहते थे तो अपराधी भी डरते थे, और पुलिसवालों को भी सजग रहना पड़ता था। लेकिन जब से बाजार बंद हुए हैं, तब से पुलिस के अफसर या तो थानों में ही गश्त निपटा लेते हैं या सड़क पर भी घूमते हैं तो सोते हुए।

साहब लोग अपनी नींद के लिए बाजारों को खुलने ही नहीं देना चाहते हैं। पुलिस के जवान से लेकर अफसर गुंडों के साथ अपनी दोस्ती निभाने में लगे रहते हैं।

कोई गुंडा, नशे का कारोबारी यदि थाने चला जाता है तो पूरा थाना उसकी आवभगत में जुट जाता है, वहीं कोई आम आदमी जिसका काम करने के लिए उसे पैसे नहीं मिलेंगे वो यदि थाने जाता है तो उसके साथ जो सलूक होता है कि वो खुद को ही अपराधी मान अपनी ही नजर में जलील हो जाता है।

इस हालत को सुधारने के नाम पर कभी बच्चों को गोद में ले लिया जाता है तो कभी अपराधियों के मकान को तोडऩे की नौटंकी शुरू कर दी जाती है। लेकिन इसके बाद भी न तो अपराध रूक रहे हैं न पुलिस का कोई खौफ कहीं दिख रहा है।

बरसों से एक ऐसा अफसर नहीं दिखा जो ये बोल सके कि रात हो या दिन शहरवासी जहां चाहें वहां घूमें, मैं देखता हूं कि कोई घटना कैसे होती है।

शायद ऐसे पुलिसवाले अब होंगे भी नहीं, क्योंकि पैसों की खनक और चाटूकारिता के निप्पल से दूध पीने वाले इन कथित सरमायेदारों को अपनी ही हैसियत का कोई ज्ञान नहीं है तो फिर ये क्या खाक शहर को सुरक्षित रखेंगे।

नेताओं के आगे पीछे घूमकर नौकरी चलाने वालों से शहर को सुरक्षित रखने की उम्मीद करना ही बेमानी सा है।

कभी प्रदेश की कानून व्यवस्था को सुधारने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ हों या उनके गृहमंत्री बाला बच्चन किसी ने भी इंदौर के पुलिस अफसरों से इन बढ़ती घटनाओं पर कभी जवाब नहीं मांगा, मांगें भी तो कैसे, क्योंकि इंदौर में जो नाकारा अफसर बैठे हैं वो इनके ही रहमोकरम पर बैठे हैं।

प्रदेश के मुखिया कहते थे कि प्रदेश में निवेश बढ़ाना है तो यहां की कानून व्यवस्था दुरूस्त करनी होगी, लेकिन प्रदेश के सबसे बड़े शहर में रोज बिगड़ती कानून व्यवस्था नजर रखने की उन्हें फूर्सत नहीं है, और प्रदेश की औद्योगिक व्यापारिक राजधानी में निवेश बढ़ाने के वे सपने देख रहे हैं।

शेख चिल्ली जी जाग जाइए, क्योंकि यदि जनता ने इसका विरोध शुरू कर दिया तो शायद आपके और आपके समर्थकों को मुंह छिपाने की जगह नहीं मिलेगी।

 

फेसबुक वॉल से।

 


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साहब-लोग-अपनी-नींद-के-लिए-बाजारों-को-खुलने-ही-नहीं-देना-चाहते

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