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विनोद दुआ को खोने का मतलब

वीथिका, मीडिया            Dec 04, 2021


राकेश कायस्थ।


अस्सी के दशक के आखिरी साल थे। बहुत लंबे हाँ-ना के बाद हमारे यहां टीवी लाया गया था। लेकिन जल्द ही पिताजी ने महसूस किया कि टीवी देखने की लत लगी तो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई चौपट हो जाएगी।

समाचार, वाइल्ड लाइफ सीरीज़, द वर्ल्ड ऑफ सर्वाइवल, सिद्धार्थ बसु का क्विज टाइम, स्पोर्ट्स वर्ल्ड ये कुछ खास कार्यक्रम थे, जिन्हें देखने पर कोई रोक नहीं थी क्योंकि पापा को लगता था कि इनसे जनरल नॉलेज बढ़ता है, जो आगे काम आएगा।

विनोद दुआ की जनवाणी भी इन्हीं कार्यक्रमों में एक था। दूरदर्शन को उस वक्त के अख़बार राजीव दर्शन कहते थे। लेकिन उसी दूरदर्शन पर विनोद दुआ केंद्र सरकार के बड़े-बड़े मंत्रियों की खाट खड़ी करते नज़र आते थे।

मैंने विनोद दुआ के सामने एच.के.एल भगत को हकलाते हुए और कल्पनाथ राय को कलपते हुए देखा है। देश के अख़बार बोफोर्स की ख़बरों से रंगे हुए थे और विनोद दुआ को मैंने रक्षा सौदों के कथित दलाल विन चड्ढा का इंटरव्यू करते और उनके पसीने छुड़ाते हुए देखा।

बोफोर्स को लेकर राजीव सरकार सवालों के घेरे में थी और विनोद दुआ दूरदर्शन पर लगातार सभी पक्षों के लोगों के इंटरव्यू कर रहे थे। बीजेपी नेता जसवंत सिंह से लंबी बातचीत मुझे आजतक याद है। याद रखिये कि वो कथित सरकारी नियंत्रण वाला दौर था, आज की तरह 'इंडिपेंडेंट' मीडिया का नहीं।

1989 का लोकसभा चुनाव मेरी यादाश्त का वो पहला चुनाव था, जब मैंने राजनीति को कुछ-कुछ जानते समझते सबकुछ टीवी पर देखा। काउंटिंग दो-तीन चलती थी। दर्शक भाग ना जाये इसलिए बीच-बीच में हिंदी की सुपरहिट फिल्में दिखाई जाती थीं।

मगर सबसे सुपरहिट विनोद की चुनावी एंकरिंग थी। सीधे और तीखे सवालों के बीच शेरो-शायरी ने ऐसा रंग जमाया था कि पुराना कवरेज़ एंटरटेनिंग हो गया था। केंद्र की सरकार बदली तो पुरानी बहुत सी चीज़ें बदल गईं। विनोद का कार्यक्रम जनवाणी भी बंद कर दिया गया और उसकी जगह करण थापर और मृणाल पांडे का एक कार्यक्रम शुरू हुआ।

लेकिन विनोद दुआ तब तक सही मायने में जनता की वाणी बन चुके थे। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि जल्द ही उन्हें वापस लाना पड़ा। न्यूज़ मैगजीन परख का दौर संभवत: विनोद दुआ के करियर का सबसे शानदार दौर था।

विनोद दुआ ने इस कार्यक्रम के लिए ना सिर्फ हिंदी के सुयोग्य पत्रकारों की टीम बनाई पॉलिटिक्स और करेंट अफेयर्स पर ज़बरदस्त रिपोर्टिंग करवाई, साथ ही बहुत से यादगार इंटरव्यू भी किये। नेताओं-मंत्रियों से पूछे जानेवालों के सवालों में और धार आई। बहुत से इंटरव्यू मुझे आज भी याद हैं।
राजनीति से परे मुझे सबसे अच्छा इंटरव्यू उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का लगा था, जो बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद यह कहते हुए पाये गये " हमें नमाज पढ़ने से मतलब है। किसी भी पेड़ के नीचे पढ़ लेंगे। बाकी जिन लोगों ने यह सब किया है, अपनी समझ से ठीक ही किया है लेकिन नतीजे सबके सामने हैं।"
1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान विनोद दुआ और सईद नक़वी ने ज़ी न्यूज़ के इलेक्शन कवरेज़ की एंकरिंग की। मुझे पहली बार विनोद को सामने से देखने और उनके साथ काम करने का मौका मिला। लेकिन दुआ उस वक्त सुपर स्टार थे और मैं अख़बार से टेलिविजन पत्रकारिता में भर्ती हुआ नया रंगरूट। ज़ाहिर है उस पेशेवर रिश्ते में एक हद तक फासला था।
जिन विनोद दुआ के सामने इस देश के तमाम बड़े राजनेताओं की घिग्घी बंधती थी, जीवन के आखिरी दौर में मैंने उन्हें ट्रोल होते और कथित राष्ट्रद्रोह वाली याचिकाओं के बाद अग्रिम जमानत के लिए अदालतों के चक्कर काटते देखा।

समझना कठिन नहीं है कि इस देश में पिछले तीन दशक में क्या-क्या बदला है।
विनोद दुआ ने सरकार और सिस्टम से सवाल पूछना बंद नहीं किया। स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बनाये गये उनके वीडियो खूब देखे जाते थे।

कोरोना की दूसरी लहर ने पहले विनोद दुआ की पत्नी को उनसे छीना और उसके बाद पुरानी सेहत हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे विनोद दुआ भी दुनिया छोड़ गये। जिसने भी अस्सी और नब्बे के दशक वाले विनोद दुआ को देखा है, वो समझ सकता है कि उन्हें खोने का मतलब क्या है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हाल ही में उनकी रामभक्त रंगबाज किताब प्रकाशित हुई है

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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