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समान शिक्षा : महान नागरिक राष्ट्र की आधारशिला

           Jul 08, 2026


डॉ. दिलीप सिंह।

 

"जब समुदाय, विद्यालय और सरकार मिलकर कार्य करते हैं, तब प्रत्येक सरकारी विद्यालय उत्कृष्टता का केंद्र बन सकता है और प्रत्येक बच्चा अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँच सकता है।"

इक्कीसवीं सदी में विकास की एक नई सोच उभरकर सामने आई है, जो केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं है। "गरिमामय भारत" इसी विचार पर आधारित है कि प्रत्येक मनुष्य की जन्मजात गरिमा, समान अवसर, स्वतंत्रता और सम्मान किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति के मूल आधार हैं। केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है; ऐसा विकास आवश्यक है जो प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने, अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास करने तथा सुखी और सार्थक जीवन जीने का अवसर प्रदान करे।

सन् 1949 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने अपने उद्घाटन भाषण में विश्व के अनेक देशों को "अविकसित क्षेत्र" बताते हुए उनके आर्थिक विकास के लिए सहायता की आवश्यकता पर बल दिया। उसी समय से विकास की अवधारणा को मुख्यतः आर्थिक वृद्धि, सकल घरेलू उत्पाद, आय तथा भौतिक समृद्धि के आधार पर मापा जाने लगा। सन् 1990 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) की शुरुआत की। इसके प्रणेता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. महबूब उल हक का स्पष्ट मत था कि विकास का अर्थ केवल राष्ट्रीय आय बढ़ाना नहीं है, बल्कि लोगों के विकल्प और स्वतंत्रता  का विस्तार करना है। एचडीआई तीन प्रमुख संकेतकों पर आधारित है-स्वास्थ्य (औसत जीवन प्रत्याशा),जीवन स्तर (प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय), और शिक्षा (वयस्कों की औसत स्कूली शिक्षा तथा बच्चों के अपेक्षित स्कूली शिक्षा वर्ष)

इन दोनों दृष्टिकोणों—आर्थिक विकास और गरिमा-आधारित मानव विकास—में एक बात समान है कि शिक्षा दोनों की अनिवार्य शर्त है। शिक्षा ही व्यक्ति को आर्थिक रूप से सक्षम बनाती है और साथ ही उसे गरिमापूर्ण जीवन जीने की चेतना भी प्रदान करती है।

भारत विश्व की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्था का संचालन करता है। देश में लगभग 14.71 लाख विद्यालय, 24.69 करोड़ विद्यार्थी तथा 1 करोड़ से अधिक शिक्षक हैं। यह शिक्षा के प्रति राष्ट्र की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है। किन्तु इस विशाल व्यवस्था के पीछे अनेक गंभीर चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। शिक्षा मंत्रालय द्वारा 7 जुलाई, 2026 को जारी 'यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस' (UDISE+) 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों के स्कूल में बने रहने और स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के बावजूद, क्लास-1 में दाखिला लेने वाले केवल 51.9 प्रतिशत छात्र ही क्लास-12 तक स्कूल में बने रहते हैं।   एएसईआर -2024  के अनुसार कक्षा 5 के लगभग 56 प्रतिशत विद्यार्थी कक्षा 2 का पाठ सहजता से नहीं पढ़ पाते। लगभग 70 प्रतिशत बच्चों में बुनियादी अंकगणितीय दक्षता का अभाव है। अनेक विद्यालयों में एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को एक साथ पढ़ाता है। अनेक छात्र प्राथमिक स्तर की बुनियादी पढ़ने-लिखने और गणना करने की क्षमता से भी वंचित हैं, जबकि अनेक बालिकाएँ केवल आधारभूत सुविधाओं के अभाव में विद्यालय छोड़ देती हैं (नीति आयोग 2026 )।

भारत आज विश्व का सबसे युवा देश है। वर्तमान में देश की औसत आयु लगभग 29 वर्ष है। किन्तु 2047 में यही युवा आबादी वृद्धावस्था की ओर बढ़ जाएगी। यदि हम आज अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आवश्यक कौशल प्रदान नहीं कर पाए, तो भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश  का लाभ उठाने का अवसर खो रहा है। भारत पहले भी अनेक अवसरों को गंवा चुका है—चाहे आर्थिक सुधारों में विलंब हो अथवा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप शिक्षा एवं कौशल विकास में पर्याप्त निवेश का अभाव। यदि शिक्षा में सुधार नहीं हुआ, तो 2047 तक "विकसित भारत" का लक्ष्य प्राप्त करना अत्यंत कठिन होगा।

अर्थशास्त्र के अनेक शोध स्पष्ट करते हैं कि यदि किसी देश के विद्यार्थियों के सीखने के स्तर में एक मानक विचलन का सुधार हो जाए, तो दीर्घकाल में उसकी आर्थिक विकास दर लगभग दो प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। अर्थात शिक्षा केवल सामाजिक न्याय का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा निवेश भी है।

इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने जुलाई 2021 में निपुण भारत मिशन (एन.आई.पी.यू.एन) प्रारम्भ किया, ताकि प्रत्येक बच्चा प्रारम्भिक कक्षाओं में मूलभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक दक्षता (एफ.एल.एन.) प्राप्त कर सके। प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में पढ़ने, लिखने और गणना करने की बुनियादी क्षमता विकसित करना है, जबकि उच्च शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को रोजगार, नवाचार तथा जीवन की जटिल समस्याओं के समाधान हेतु तैयार करना है । यह केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी है ।

 

 



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