Breaking News

लोग हैरान हैं कि ऐसा कैसे हो रहा है, सरकार कुछ करती क्यों नहीं

खरी-खरी            May 20, 2026


 

हेमंत कुमार झा।

बहुत शोर है कि भारत की कुछ निजी तेल कंपनियां इस संकट के दौर में भी रिफाइंड पेट्रोल का बड़े पैमाने पर निर्यात कर रही हैं।

कुछ ऐसा ही शोर इस बात पर भी मचा है कि भारत के कॉरपोरेट घराने संकट में घिरी भारतीय अर्थव्यवस्था से अपना पैसा निकाल कर विदेशों में भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं।

लोग हैरान हैं कि ऐसा कैसे हो रहा है, सरकार कुछ करती क्यों नहीं।

सरकार क्या करे और क्यों करे? सरकार माने मोदी जी। तो, वे क्या करें?  जितना जरूरी उनके लिए स्कूटर पर चलता क्लर्क, मास्टर है उससे ज्यादा इम्पोर्टेंट है उनके लिए खरबपतियों का साथ और समर्थन।

मिडिल क्लास का समर्थन तो बिहार, बंगाल से घुसपैठिया भगाने की हांक लगा कर, नागरिकों की उनके कपड़ों से पहचान करवा कर, देशवासिनियों के मंगलसूत्र की सुरक्षा का वास्ता आदि दे कर वे ले लेंगे। ले ही लेते हैं।

लेकिन, घाघ, चतुर अरबपतियों का समर्थन पाने के लिए कुछ ठोस करना पड़ता है।

 वह ठोस क्या है?

वह है मुनाफा, अधिकतम मुनाफा कमाने के लिए उचित, अनुचित सहूलियत मुहैया कराना, नीतियों को उनके "मुनाफा कूटो अभियान" के खूब खूब अनुकूल बनाना, मिडिल क्लास पर टैक्स लाद कर कॉरपोरेट के कंधों से टैक्स का लोड कम करना।

मोदी जी ने यह सब किया। आंकड़े गवाह हैं कि उनके राज में कंपनियों का मुनाफा कितना बढ़ा। और, आंकड़े ही गवाह हैं कि इस दौरान कंपनियों में काम करने वाले कामगारों की पगार कितनी बढ़ी।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि इस दौरान कामगारों के वेतन में ऋणात्मक बढ़ोतरी हुई। यानी बाजार की गति से पिछड़ती हुई उनकी क्रय शक्ति घटती ही गई।

दुनिया जानती है कि मोदी राज में भारत में कंपनियों के मुनाफे की वृद्धि और कामगारों के वेतन में वृद्धि का अनुपात कितना असंतुलित हो गया। लेकिन, दुनिया जले तो जले, अपने मोदी जी का चुनावी जलवा लोकतंत्र के सिर पर चढ़ कर बोलता रहा।  

लोकतंत्र की आत्मा में समा कर नहीं, लोकतंत्र के सिर चढ़ कर जब किसी नेता का चुनावी जलवा बोलने लगता है तो मान लेना चाहिए कि चीजें सही दिशा में तो नहीं ही जा रही होंगी।

जो आर्थिक परिदृश्य बन चुका है, जो परिदृश्य बनता जा रहा है वे बता रहे हैं कि चीजों की दिशा सही नहीं थी। जिधर चला, जैसे चला, देश को इस हाल में पहुंचना ही था। अब जब यहां पहुंच गया तो...

मोदी जी ने आम नागरिकों को अपीलों और आह्वानों की लंबी फेहरिस्त थमा दी लेकिन उन्होंने उन अरबपतियों से अब तक कोई अपील नहीं की कि इस संकट काल में पेट्रोल का निर्यात कम कर दें, देश से बाहर भेजी जा रही अपनी पूंजी को भी देश के लिए देश में ही रहने दें।

जब प्रधानमंत्री मोदी देशवासियों को अपीलों की लिस्ट सुना रहे थे तो बार बार एक शब्द को दोहरा रहे थे..."देशभक्ति"।

मोदी जी को अच्छी तरह पता है कि देशभक्ति का का नाम लेकर वे इस देश के आमलोगों को तो संबोधित कर लेंगे लेकिन कॉरपोरेट...?

भला कॉरपोरेट का भी कोई देश होता है? नागरिकता उसके लिए जेब में रखे रुमाल की तरह है। जब चाहे बदल ले सकता है। बदलता ही है। बदलता ही रहता है।

बीते दस वर्षों की ही रिपोर्ट इकट्ठी की जाए तो अपना माल मत्ता समेत देश छोड़ विदेश जा बसने वाले अरबपतियों की सूची में नाम पढ़ते पढ़ते थक जाएं। 

मोदी जी को पता है कि धर्म आदि का माहौल बना कर वे आम लोगों को तो भरमा लेंगे लेकिन कॉरपोरेट?

 भला कॉरपोरेट का भी कोई धर्म होता है? धर्म उसकी बेहद बेहद निजी आस्था है लेकिन बतौर कंपनी मालिक, मुनाफा ही उसका धर्म है।

तो अपने धर्म पालन के लिए, यानी कि अपने मुनाफा के लिए बड़े कॉरपोरेट घराने अपनी बड़ी पूंजी देश से निकाल विदेश भेज रहे हैं तो इस पर शोर क्यों?

 अरबपतियों को पता है कि इस देश का फिलहाल तो कुछ खास होने वाला नहीं। जो राज कर रहे हैं उन्हें वोट पाने का सहूर तो खूब है, बल्कि खूब खूब है, लेकिन अर्थव्यवस्था चलाने का सहूर नहीं।

वे देख रहे हैं कि भारतीय बाजार में मांग बढ़ने का कोई चांस नजर नहीं आ रहा, बल्कि मांग घटती ही जा रही है क्योंकि इस देश के लोगों की क्रयशक्ति बढ़ने की जगह घटती ही जा रही है।

वे देख रहे हैं कि विदेशी निवेशक इस देश की अर्थव्यवस्था से अपना पैसा खींच रहे हैं और भारतीय शेयर बाजार गोते पर गोते खा रहा है। एक बार जो दो साल पहले इसने गोता लगाया तो फिर मुंडी उठाने का नाम ही नहीं लिया।

भारत की निजी पूंजी का भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कम हो गया है। यह गहरे संकट का संकेत है। निजी पूंजी को आप देशभक्ति का हवाला देकर अपने देश पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते।

जिस दिन भारत की अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार होगा, देश का बाजार फिर से गुलजार होगा, देशी क्या, विदेशी पूंजीपति भी अपने निवेश का झोला ले इधर की दौड़ लगाने लगेगें। फिर से शेयर बाजार भी गुलजार होगा, मिडिल क्लास की एसआईपी भी मुटाएगी, बेरोजगारों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। पता नहीं वह दिन कब आएगा और हम मदर इंडिया फिल्म के राजकुमार और नरगिस की तरह गाएंगे..."दुःख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे"।

इसके लिए देश के लोगों की क्रयशक्ति में इजाफा करना होगा। यह तभी होगा जब कामगारों की पगार और कंपनियों के मुनाफे के बीच संतुलन का एक अनुपात होगा। अभी इस अनुपात का असंतुलन चरम पर है जो भारतीय बाजारों की गति को अवरुद्ध कर रहा है।

ग्यारह हजार वेतन और बारह चौदह घंटे काम? देश के करोड़ों कामगारों का खून चूस कर कोई बाजार गुलजार नहीं हो सकता। हां, कुछ सेठ और मुटिया सकते हैं।

राजनीतिक सफलताएं हासिल करना और देश की अर्थव्यवस्था को चलाना...दोनों दो बातें हैं। तमाम आर्थिक विशेषज्ञ बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के इस गहरे संकट में फंसने की एकमात्र वजह युद्ध नहीं, बल्कि लंबे समय से नीतियों और क्रियान्वयन की विफलताएं भी इसके पीछे हैं। फिर, इस अंतरराष्ट्रीय संकट के दौर में भारतीय विदेश नीति को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं जो इस आर्थिक संकट को बढ़ाने वाली ही साबित हो रही हैं।

नैरेटिव्स सेट कर राजनीतिक सफलता तो पाई जा सकती है लेकिन अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने के लिए नैरेटिव्स से आगे बढ़ कर सोचने और करने की जरूरत होती है।

सोचना, करना सरकार को है। व्यापारी तो तेल निर्यात में मुनाफा देखेगा, वह निर्यात करेगा। भले ही देश के पेट्रोल पंपों पर लाइन लंबी होती जाए।

लेखक पटना यूनिवर्सिटी में एसोशिएट प्रोफेसर हैं

 


Tags:

oil-compnies indian-economy

इस खबर को शेयर करें


Comments