
राकेश कायस्थ।
राहुल गाँधी में 101 कमियां हैं। वो स्वभाविक राजनेता नहीं है। चुनावी लड़ाई के किसी सफल योद्धा की तरह वो विरोधी की संभावित चालों को भांपकर नहले-पे-दहला जड़ने के मामले में कमज़ोर हैं। उनकी संगठन क्षमता लगभग शून्य है।
वैचारिक स्पष्टता के बावजूद कम्युनिकेशन के मामले में दक्ष नहीं हैं, लिहाजा अपने भाषणों में कई बार विरोधियों के लिए गुंजाइश छोड़ जाते हैं कि वो उनकी बात को अलग तरह से घुमा सकें।
इन सब बातों के बावजूद राहुल गाँधी मेरे लिए परम आदरणीय हैं। वो भारतीय राजनीति के सबसे बड़े अनथक योद्धा हैं लेकिन सिर्फ यही बात उन्हें मेरी नजरों में आदरणीय नहीं बनाती हैं।
राहुल गाँधी संभवत: आज़ाद भारत के सबसे बड़े और इकलौते ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने इस देश के गणशत्रु आरएसएस को ठीक से पहचाना है और उसके खिलाफ सीधे टकराव का रास्ता चुना है। यही बात उन्हें सबसे अलग बनाती है।
संघ के पोगापंथ से लड़े बिना भारतीय समाज और राजनीति में कोई सकारात्मक और स्थायी बदलाव नहीं आ सकता है।
संघ एक नैतिकता शून्य संगठन है, जिसकी कथनी और करनी में कोई साम्य नहीं है और पूंजी के साथ धर्मांधता का जोड़ जिसका सबसे बड़ा हथियार है।
राहुल गाँधी ने ये समझ लिया है कि बहुजन राजनीति को मजबूत किये बिना मानव मुक्ति का मार्ग ढूँढ पाना असंभव है और इस पूरी प्रक्रिया में आधी आबादी की शत-प्रतिशत सहभागिता अपरिहार्य है। कई लोगों को पितृ सत्ता के खिलाफ राहुल गाँधी का अति-आक्रमक होना बचकाना लग रहा है।
उन्हें इस देश की नौजवान लड़कियों से बात करनी चाहिए। एक ज्वालामुखी है जो धधक रहा है।
लड़ाई किस तरह आगे बढ़ेगी और कहाँ तक पहुँचेगी ये कोई नहीं जानता लेकिन ये तय है कि राहुल गाँधी ने रास्ता सही चुना है और इस बात का अंदाजा संघ परिवार के भीतर बढ़ रही बेचैनी को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है।
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