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निर्धन के धन राम! सच यहां पराजित लगता है

खरी-खरी            Dec 26, 2017


गुरूदत्त तिवारी।
जब व्यक्ति सदाचारी-सत्यव्रती और ईश्वरीय चौखट पर समर्पित रहता है, फिर भी गरीबी व तमाम तरह की दारिद्रता घेरे रहती है। तब भी वह संतोष भाव से कहता है कि निर्धन के धन राम। मगर, बड़ों को यह स्वीकार नहीं, क्योंकि उनके यहां तो व्यवस्था ही सिर झुकाएं खड़ी रहती है। यही सच है।

न्याय व्यवस्था हो या सरकारें, अफसर हों या माफिया वे अपने चश्में से ही दुनियां देखते हैं। गांव-गरीब, असलियत और मौके की सच्चाई से उनका लेना-देना नहीं होता। तभी तो 2g जैसे मामलों में सब बरी हो जाते हैं। सीबीआई्र जैसी संस्थाओं पर उंगलियां उठती हैं। जब घोटाला ही नहीं हुआ तो इतना बड़ा नाटक क्यों खेला गया? कोर्ट को तो उन अफसरों को जेल भेज देना चाहिए जिन्होंने टूजी के इस मसले को खोला था।

सच यहां पराजित लगता है। हिरन मामले में भी सच सलमान के आभामंडल में गुम हो गया। फिल्मी दुनियां वालों के कई मामलों में सत्य और न्याय रिरियाते दिखाई पड़े। आय से अधिक संपत्ति मामले में माया-मुलायम सब के आगे व्यवस्था का दम टूटते सबने देखा। चारा वाले नेताजी अभी भी मौज काट रहे हैं। हां हमारे देश में न्याय व्यवस्था बहुत सख्त है।

तभी तो रेयान कालेज के प्रदुम्न हत्याकांड में एक निर्दोष ड्राइवर जेल चला जाता है। सवा लाख शिक्षामित्र नौकरी से बाहर कर दिए जाते हैं। गांवों के कल्लू और मुनियां नीबू चोरी और जाम लगाने के मामलों में थानेदारों के पट्टे खाते और जेल जाते हैं...जहां वर्षों मुकदमा लड़ते हैं।

हजारों ऐसे कैदी जेलों में बंद हैं जिनके घर वालों के पास जमानत कराने व वकील करने के भी पैसे नहीं है। यानी गरीब के लिए कानून का खौफ होता है और बड़ों के लिए यही कानून मौज लेकर पहुंचता है। न विश्वास हो तो देख लीजिए विधानसभा के सामने तमाम अपराधिक प्रव़त्ति के लोग और माफियां लग्जरी वाहनों में पुलिस स्कोर्ट के साए में आते-जाते हैं। मगर,मुनिया...धनिया, रामनिबोरे और खरगू प्रसाद टुटही चप्पल पहने फटा-पुराना साल ओढे आज भी अपना दर्द बताकर न्याय मांगने भटक रहे होते हैं।

सच में व्यवस्था में बहुत छेद है और जिम्मेदारों के पास असलियत जानने का वक्त नहीं है। क्योंकि सत्ता आती-जाती है...इस लिए मलाई बटोरने की मारामारी में जितना लूट सको लूट लो...कल किसने देखा। बाकी निर्धन के धन राम तो हैं ही...।
कड़वा लगे तो भी बुरा न मानना...।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख उनके फेसबुक कमेंट से लिया गया है।

 


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