मल्हार मीडिया ब्यूरो।
सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के महाकाल मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में फैसला मंदिर प्रशासन करेगा, न कि सुप्रीम कोर्ट।
कई मंदिरों में दर्शन के लिए एक वीआईपी कोटा होता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकाल मंदिर में भी ऐसा होता है। एक शख्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके इसी व्यवस्था को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया और उस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि मंदिर में किसे एंट्री देना है और किसे नहीं देना है, इसका फैसला अदालत नहीं कर सकती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मंदरि के गर्भगृह में वीआईपी लोगों को जाने दिया जाता है तो बाकी लोगों को भी इसकी अनुमति मिलनी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मंदिर में एंट्री के नियम तय करने का अधिकार मंदिर समिति के पास है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इससे पहले, वर्ष 2025 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट भी इसी याचिका को खारिज कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि महाकाल मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना सभी भक्तों का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत मिला है। उनका कहना था कि जब वीआईपी लोगों को गर्भगृह में जाने दिया जा रहा है, तो आम भक्तों को भी वही सुविधा मिलनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाए थे कि पिछले ढाई साल से आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह का प्रवेश बंद है जबकि इसी अवधि में वीआईपी और अमीर लोगों को नियमों को दरकिनार कर गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दी जाती रही है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा कि अदालत मंदिर प्रबंधन के मामलों में केवल सीमित फैसला कर सकती है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वीआईपी प्रवेश की अनुमति होनी चाहिए या नहीं, यह फैसला कोर्ट नहीं करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर गर्भगृह में मौलिक अधिकारों के आधार पर सभी को प्रवेश की अनुमति दे दी जाए, तो इसके दूरगामी और गलत नतीजे हो सकते हैं। उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि भविष्य में लोग अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत मंदिर में मंत्रोच्चारण या अन्य अन्य गतिविधियों की मांग भी करने लगेंगे, जिससे मंदिर के नियमों का उल्लंघन हो सकता है।
2025 में हाई कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले याचिकाकर्ताओं ने यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी उठाया था। वहां उन्होंने तर्क दिया था कि देश के कई शिव मंदिरों में सभी भक्त गर्भगृह में जाकर भगवान शिव पर जल चढ़ाते हैं, इसलिए महाकालेश्वर मंदिर में भी सभी को यह अधिकार मिलना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और याचिका को खारिज कर दिया था।
गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं का प्रवेश क्यों बंद है?
महाकालेश्वर मंदिर समिति ने वर्ष 2023 में श्रावण माह के दौरान भारी भीड़ को देखते हुए गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उस समय भक्तों की लंबी कतारें लग रही थीं और भीड़ नियंत्रण के लिए यह फैसला लिया गया था।
हालांकि, उस दौरान भी वीआईपी लोगों का प्रवेश जारी रहा। तब से अब तक आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह का प्रवेश प्रतिबंध हटाया नहीं गया है। आंकड़ों के अनुसार, महाकाल मंदिर में रोजाना करीब डेढ़ से दो लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गर्भगृह में प्रवेश संभव नहीं है। इसी कारण मंदिर प्रशासन द्वारा आम भक्तों के गर्भगृह में प्रवेश पर रोक लगाए जाने को भीड़ प्रबंधन से जोड़कर देखा जा रहा है।
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