रमेश शर्मा
दिल्ली सचिवालय में मीडिया के प्रवेश को लेकर पत्रकार आक्रोशित हैं। मसला है केजरीवाल सरकार की पहली प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के साथ बदसलूकी का जिसमे बवाल का अंत ये हुआ कि सरकार में मंत्री नंबर दो मनीष सिसोदिया उठ कर चले गए। अब यहां सवाल है कि मीडिया की स्वतंत्रता का मतलब क्या है ? क्या कोई भी सरकार ये चाहेगी कि उसके सचिवालय मे जहां तमाम गोपनीय दस्तावेज होते हैं वहाँ मीडिया को मय-कैमरा आने दे ? क्या सिस्टम और रेस्ट्रिक्शन कोई चीज है या नहीं ? सड़क पर धरना हो तो मीडिया स्वतंत्र है, कोई सार्वजनिक जगह है तो पूरी छूट है करिए कवरेज, ...किसी मरते हुए आदमी को अस्पताल भिजवाने की बजाय उसके मुंह में माइक घुसा कर पूछ लीजिए -"कैसा लग रहा है" मगर सचिवालय में तो नियंत्रित प्रवेश ही संभव है और जायज भी। सारे पत्रकारों को तो लांछित नही किया जा सकता मगर एक जिक्र लाजिमी है। जब मैं दिल्ली सरकार की पत्रकार मान्यता समिति का सदस्य था(1998 ) तो करीब 250 फर्जी पत्रकारों के मामले समिति के सारे सदस्यों ने एक स्वर में मिल कर कैंसिल कराए थे। बताते हुए कोई संकोच नही कि कैसे -कैसे बिरादरी भाई लोग थे जिनमे से एक ने तो खुद को संपादक और अपनी श्रीमतीजी को ही साप्ताहिक का संवाददाता बना डाला था और जब सारे मामले में जांच शुरू हुई तो हमको दलाल और न जाने क्या -क्या बता कर खबरें दी गई मगर पहली बार एक सिस्टम बना था। और सिस्टम से ही चीजें चलनी चाहिए । सरकार की मर्जी हो बुलाए न बुलाए तो नमस्ते कहिए .. किसी पत्रकार के लिए खबरें सिर्फ सचिवालय तक सीमित नही है।
Comments