विपुल रेगे
अजित सिंह करप्ट, मदन तिवारी जैसे फेस्बुकियों को पढ़ने के बाद लगता है जैसे ये ही लोग पत्रकारिता कर रहे हैं सही मायनों में। दिल्ली, बिहार और उत्तरप्रदेश की तरफ देखिये फेसबुक पर जैसे आग लगी रहती है। स्थानीय मुद्दा हो या राष्ट्रीय, कलम एक जैसी चलती है। बिना भय के लोग अपनी बात कह रहे हैं। अब मध्यप्रदेश की बात करे तो यहाँ निर्भिकता केवल राष्ट्रीय मुद्दों पर ही दिखाई जाती है। किसी फेस्बुकिये को अपने क्षेत्र के नेता या अधिकारी से तकलीफ है तो वो कभी उसकी पोस्ट में नहीं दिखाई देती। पत्रकार स्थानीय पोस्ट से होशियारी से कन्नी काट जाते है(नौकरी का सवाल है)। नागरिक सोशल मिडिया को हथियार बनाने के बजाय अपने सुन्दर फोटो और अपनी यात्राओ पर मिले लाइक्स और कमेन्ट गिनने में व्यस्त हैं लेकिन कालोनी की समस्या को यहाँ नहीं लिखेंगे(भिया से बनाकर जो रखना है)। स्थानीय ख़बरों पर मिडिया की खिंचाई नहीं करते। इंदौर शहर सोशल मिडिया पर दरअसल मनोरंजन में ही व्यस्त रहता है। वरिष्ठ पत्रकार भी इस माध्यम से कुछ सकारात्मक करने के बारे में नहीं सोचते। क्यों डरते हो जब कलम का हथियार तुम्हारे पास है या तुम्हारी भी सोच यही ( सबसे बनाकर चलना है) है। क्या फेसबुक पर खेलते ही रहोगे या बड़े भी होगे कभी।
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