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मध्यप्रदेश की राजनीतिक जमीन पर बहुत सारी बातें बासी हो चुकी हैं

राजनीति            Apr 29, 2022


ममता मल्हार। 

पिछले दिनों भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक से औपचारिक मुलाकात हुई। बातों—बातों में कांग्रेस का जिक्र निकला विधायक बोले जब तक दिग्विजय सिंह हैं भाजपा को कोई दिक्कत नहीं हो सकती।

बाकि इस बार बजट सत्र पर उन विधायक सहित कई अन्य भाजपाई और कांग्रेसी विधायकों का भी यह मानना है कि यह सत्र यूं ही चला गया। कुछ हुआ ही नहीं।

अब जब फिर से दिग्विजय कुछ न कुछ अंटशंट बयान देने लगे हैं,पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भी सदन के बारे में ठीक राय नहीं रखते।

बजट सत्र कैसे निपटाया गया? इस सवाल का जवाब विधानसभा कवर करने वाले पत्रकारों और विधानसभा सदस्यों के लिए कोई रॉकेट सांइंस नहीं है।

अब जब कमलनाथ की जगह डॉ. गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है तो कयास यह लगाए जा रहे हैं कि कमलनाथ की बयानबाजी नित नए संघर्षों से जूझती कांग्रेस को भारी पड़ने लगी थी। इसलिए उनका रिपलेसमेंट गोविंद सिंह के रूप में किया गया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं कमलनाथ। राज्य से ज्यादा राष्ट्रीय सियासत का अनुभव उन्हें है। मगर राज्य में तो जबसे आए बहुत कुछ ऐसा हो गया जो कि मध्यप्रदेश कांग्रेस को और गर्त में धकेलने के लिए काफी है।

विधानसभा जैसे सदन की कार्यवाही के बारे में उनके द्वारा की गई टिप्पणी इतनी हल्की थी कि सवाल यह भी उठने लगे कि क्या प्रदेश में राष्ट्रीय नेताओं की आमद इतनी हल्की छवि भी बना सकती है।

बहरहाल विधायक महोदय से इस छोटी सी चर्चा ने कई ओर—छोर पकड़ा दिए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के रवैये भाजपा नेता की बात को सही साबित करने के लिए काफी है।

लेकिन...लेकिन, मध्यप्रदेश की राजनीति में यह सब इतना बासा हो चुका है कि कितने ही बार लिखा जाए? नया कुछ लगता नहीं है।

खैर अब यह बात भाजपाई भी खुले तौर पर मानने लगे हैं कि दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश में भाजपा की ब्रांडिंग कुछ उसी तरह करते हैं जैसे राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करते आ रहे हैं।

अति विरोध और अति समर्थन दोनों ही बहुत घातक ही नहीं बल्कि आत्मघाती साबित होते हैं। पिछले 7 सालों में यह साबित भी हो गया।

अब या तो व्यक्ति विरोध है या व्यक्ति समर्थन है, वह भी अति के बाहर।

नीतियों पर, मुद्दों पर न तो राजनीतिक लोग जाते हैं न ही आम जनता इस ओर देखने की इच्छुक समझ आती है। कोई राशन में खुश तो कोई कॉरपोरेट कर्जमाफी और सब्सिडी में। बचा मध्यवर्ग वह खाने—कमाने में ही उलझा है बस कसमसा के रह जाता है।

तो मान के चलिए अगले 10 साल भाजपा हिलेगी नहीं मध्यप्रदेश से। कोई तगड़ा थर्ड फ्रंट जब तक यहां सक्रिय नहीं हो जाता। पर थर्ड फ्रंट की गुंजाईश भी यहां उतनी दिख नहीं रही।

बसपा फिलहाल गिनती में नहीं है बची समाजवादी पार्टी और आप इनकी सक्रियता भी वैसी नहीं दिख रही। मध्यप्रदेश में ढेर मुद्दे हैं मगर कोई भी दल जनता से जुड़े इन मुद्दों पर तरीके से सामने नहीं आ रहा। सबके लिए सोशल मीडिया ही जिंदाबाद है।

जनता को जोड़ना आसान नहीं है मगर मुश्किल भी नहीं है अगर वाकई जनता के बीच जनता के मुद्दों को लेकर सक्रिय हो जाएं तो।

खैर मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में बमुश्किल 17 से 18 महीने बचे हैं। कोई समय पर जागे तो जागे वरना इससे भी खराब विपक्ष झेलने जनता तो मानसिक रूप से पहले ही तैयार है।

 


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