पंकज शुक्ला।
इन दिनों उप्र के भाजपा विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी मिश्रा के प्रेम विवाह पर तर्क-वितर्क जारी है। बड़ा खेमा कह रहा है कि साक्षी ने पूरे परिवार की प्रतिष्ठा और पालन-पोषण को मिट्टी में मिला दिया। बेटियों के ऐसे कृत्य पर हत्या और आत्महत्या की बातें की जा रही है।
इस प्रकरण में क्या सही और क्या गलत, यह बहस बाद में होगी मगर एक सवाल का उत्तर बकाया है कि देश में छह माह में 24 हजार 212 बच्चों के साथ बलात्कार हुआ और मात्र 4 फीसदी मामलों का निपटारा हुआ। इन मामलों पर हमारा खून क्यों नहीं खौला?
इन मामलों में सर्वाधिक 3457 प्रकरण उप्र और 2389 मामले मप्र से हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई का यह सवाल भी बकाया है कि क्या देश में कानून का डर खत्म हो गया है? सवाल तो यह भी है कि कब तक हम ऐसे मामलों में मूक साक्षी बने रहेंगे?
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने ही उजागर किया है कि 1 जनवरी से 30 जून 2019 तक देश भर में बच्चों से दुष्कर्म की 24,212 एफआईआर दर्ज हुई हैं। इनमें से 11,981 मामलों में जांच चल रही है, जबकि 12,231 केस में चार्जशीट पेश हो चुकी है लेकिन ट्रायल सिर्फ 6449 मामलों में ही शुरू हुआ है। इनमें भी सिर्फ चार फीसदी यानी 911 मामलों का निपटारा हुआ।
सुप्रीम कोर्ट की पहल पर तैयार इस सूची में उत्तर प्रदेश 3,457 एफआईआर के साथ सबसे ऊपर है। वहां 50 फीसदी से ज्यादा केसों में 1779 में जांच चल रही है। मध्यप्रदेश 2,389 मामलों के साथ दूसरे नंबर पर है। मप्र में बच्चों के साथ बलात्कार के कुल 2 हजार 389 मामले दर्ज हुए। पुलिस 247 प्रकरणों में अंजाम तक पहुंची। यानि कुल मामलों का दस फीसदी।
मप्र के बाद राजस्थान का नंबर आता है। राजस्थान में 1992 बच्चों के साथ दुष्कृत्य हुए जिनमें से 4 फीसदी मामलों का निराकरण हो पाया। महाराष्ट्र में 1940 बच्चे दुष्कृत्य का शिकार हुए।
फिर पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। जहां कुल 1551 मामले आए। वहां 99 मामले निराकृत कर लिए गए। छत्तीसगढ़ में 1285 मामलों में से 133 यानि 10 फीसदी का निराकरण हुआ। चंडीगढ़ में बच्चों के साथ बलात्कार के 29 मामले हुए जिनमें से 12 का निराकरण कर दिया गया। निराकरण की यह 41 फीसदी दर देश में सबसे ज्यादा है।
यदि हम इस बात से खुश है कि बच्चों के साथ बलात्कार पर फांसी की सजा होगी तो यह भी खुशफहमी भर है। 2012 में निर्भया गैंगरेप के बाद क़ानून में बदलाव कर मौत की अधिकतम सज़ा लाई गई। कहा गया था कि फांसी के खौफ से अपराध कम होंगे। मगर ऐसा तो हुआ ही नहीं।
तंत्र की विफलता की बात करने से पहले यह जानना जरूरी है कि नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार के 94 फीसदी मामलों में अपराधी पीड़िता का क़रीबी या फिर जान पहचान वाला ही था। एनसीआरबी के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक इन अपराधियों में 29 फीसदी पड़ोसी, 27 फीसदी शादी का वादा करने वाले प्रेमी और 6 फीसदी रिश्तेदार और बाकी 30 फीसदी दूसरे क़रीबी थे। आरोपी के रिश्तेदार होने के कारण बच्चियों की आवाज दबा दी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट 15 जुलाई को जानना चाहती है कि इन मामलों को रोकने के लिए वह क्या कर सकती है? हमने तो कभी नहीं सोचा कि बच्चों के साथ बलात्कार रोकने के लिए समाज क्या कर सकता है? साक्षी और ऐसे ही अन्य मामलों में जाति के ठेकेदार बने बयानवीरों ने कभी सोचा है कि उनके आसपास बेटियों के साथ हो रहे बलात्कार से देश का सिर शर्म से झुकता है? वे इन मामलों को रोकने में क्या कर सकते हैं?
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