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अवसरवादी मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के लिए ये पोस्ट नहीं है

मीडिया            Jun 22, 2019


ममता यादव।
मीडिया एक अकेला ऐसा कार्यक्षेत्र है जो Thank less Price less है और विशुद्ध पत्रकार इसके सबसे बड़े माध्यम। यहां काम सबको चाहिए दाम की कोई बात नहीं करता। व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा निराश करने वाला कोई कार्यक्षेत्र है तो वो यही है।

ऊपरी डेकोरम पूरा है बस जो कुछ है वही है। ईमानदारी और स्वाभिमान से पत्रकारिता करने वाले किसी नामी पत्रकार के पास इतनी भी जमापूंजी नहीं होती कि कभी घर मे कोई बीमार हो जाये तो तुरंत 20-25 हज़ार हाथ मे रख ले।

ऐसा नहीं होता कि कोई भी संस्थान टोटल फुक्कड़ ही बैठा हो। विज्ञापन से लेकर दूसरे आय के साधन भी पर्याप्त होते हैं। ऊपरी स्तर के अधिकारी पूर्ण सम्पन्न होते हैं पर ये भी क्या करें बेचारे इनके कंधों पर देश से कम भार थोड़े ही होता है। कल एक फोन आया तो ख्याल आया।

दुनिया भर की आवाज उठाने एक पैर पर खड़े रहने वाले ये लोग खुद के लिए कभी एक साथ खड़े नहीं होते। आपका शोषण कोई तब तक नहीं कर सकता जब तक आप तैयार नहीं हों। यहाँ लोग खुद करवाते हैं।

फ्री में काम करेंगे जिससे हक मांगना हो बस उसी से नहीं कहेंगे बाकी पूरी दुनिया को इनका दुखड़ा पता होगा। इसमें भी तुर्रेदार ज्ञान ये रोजी-रोटी चलानी हो तो पत्रकारिता में मत आईये। पत्रकार इसकी चिंता क्यों न करे? क्या वो इंसान नहीं है?

फिर ये बड़े-बड़े पत्रकारिता की पढ़ाई करवाने वाले संस्थान बन्द कराइये। रोजगार के अवसर उपलब्ध कराइये। या फिर ज्ञान देना बंद करिये। थे कुछ दो चार दशक पहले के लोग जिन्होंने अच्छा दौर देखा। पर अब जो दौर है इससे बुरे से बुरा समय तो आएगा पर अच्छा नहीं।

पर अब बुरी चीजें इतनी हावी हो गईं कि पत्रकार को सिर्फ और सिर्फ गालियां मिलती हैं। जो मुठ्ठी भर अच्छे पत्रकार हैं उनकी बात ही नहीं होती दरअसल हम नकारात्मक इतने हो गए कि सकारात्मकता हमें दिखती ही नहीं।

अभी कुछ दिन पहले एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा था मीडिया गांव की भौजाई हो गई है।

पर इसका आकर्षण इतना है कि क्या नेता क्या ड्राईवर क्या कोई औऱ धंधा करने वाला उसे तो बस कार्ड चाहिए जिस पर प्रेस लिखा हो।

जिस पर अधिमान्य पत्रकार लिखा हो। फिर वह रौब झाड़ता फिरे। बाकी असल पत्रकार जो सालों इस फील्ड में खर्च करते हैं उन्हें मतलब ही नहीं रहता न वो कभी उतने प्रयास करते हैं। काम तो कर ही रहे हैं कार्ड से क्या फर्क पड़ना है।

अब एक नया चोंचला हावी हो गया टीवी मीडिया में माईक आईडी। चैनल का पता भले न हो माईक आईडी जरूर घूमती है।

यही सब बातों ने तो धन्नासेठों को उकसाया कि तुम्हें गुलाम बनाकर उंगलियों पर नचायें। इसमें सोने पर सुहागा किया है पार्टी पत्रकारों ने। जिनकी प्राथमिकताएं निष्ठाएं हमेशा सत्ता के साथ होती हैं। ये बहुत भले लोग होते हैं कभी किसी को बुरा नहीं बोलते।

बस पत्रकारों की रोटियों की गिनती जरूर पता होती है। वो भी हमेशा उस पत्रकार की बखत से ज्यादा। जितना उसे खुद पता नहीं होता इन पार्टी पत्रकारों को पता होता है।

खुद का फ्री ऑफ कॉस्ट शोषण करवाने वाले लोग नहीं देखे हों तो मीडिया में आईये। एक से एक धन्ना सेठों की दुकानदारी इन्हीं फ्री ऑफ कॉस्ट लोगों से चलती है। जागो पत्रकारों! जागो!

नोट:भक्त चापलूस अवसरवादी मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के लिए ये पोस्ट नहीं है।

 


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पत्रकारिता-की-पढ़ाई-करवाने-वाले-संस्थान-बन्द-कराइये मीडिया-गांव-की-भौजाई-हो-गई-है

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