फिल्म समीक्षा:मलाल देखें, या न देखें कुछ मिस नहीं करेंगे

पेज-थ्री            Jul 06, 2019


डॉ.प्रकाश हिंदुस्तानी।
इस शुक्रवार कुछ नया नहीं घटा। न निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट में, न बॉक्स ऑफिस में। बजट 90 के दशक का है और फ़िल्म भी।

संजय लीला भंसाली की भानजी और जावेद जाफरी के बेटे को लेकर गुलशन कुमार के भाई किशन कुमार ने 15 साल पुरानी तमिल फिल्म '7जी रेनबो कॉलोनी' का जो रीमेक बनाया है उसे देखना न देखना बराबर है।

'मलाल' संजय लीला भंसाली की फिल्म तो है लेकिन उस भंसाली की नहीं जो देवदास, हम दिल दे चुके सनम, खामोशी, पद्मावत और बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्में बना चुके हैं।

इस फिल्म का निर्देशन किया है मंगेश हड़ावले ने।

मंगेश की 12 साल पहले आई मराठी फिल्म 'टिंग्या' पसंद की गई थी। मलाल प्रेम में पगी हुई कहानी पर है, जिसका अंत अनपेक्षित होता है। तमिल और हिन्दी फिल्मों की पृष्ठभूमि अलग है।

मलाल की पृष्ठभूमि मुंबई की अंबेवाड़ी चाल है। मराठीभाषी लड़का अपने दोस्तों के साथ आवारागर्दी करता है और फिर इश्क में पड़ जाता है। उसे उत्तर भारतीयों से नफरत है, पूरी हिन्दी पट्टी के लोग पसंद नहीं हैं, लेकिन पड़ोसन आस्था त्रिपाठी से मिलने के बाद उसका ख्याल बदल जाता है।

दोनों में चाहत की दरकार, तकरार, इकरार, इंकार, इसरार...न जाने क्या-क्या होता है और अंत प्रेम के अनेक रास्तों से गुजरती हुई फिल्म अनपेक्षित मोड़ पर खत्म हो जाती है। जावेद जाफरी का बेटा मीज़ान मेहनती है, भंसानी की भानजी शर्मिन मामा के भरोसे है, इस फिल्मी बाज़ार में टिक नहीं पाएगी।

'मलाल' देखें, या न देखें - कुछ मिस नहीं करेंगे।

 


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