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मध्यप्रदेश में सियासत के पंडित शीर्षासन करें तब भी उलझती गुत्थी का सिरा नहीं मिलेगा

राजनीति            Jul 08, 2019


राघवेंद्र सिंह।
राजनीति के धागे दिन पर दिन उलझते जा रहे हैं। जितना सुलझाओ गुत्थी का सिरा ढूंढ़ना उतना कठिन हो रहा है। हालात ऐसे हैं कि सियासत के पंडित शीर्षासन करें तब भी न तो हल दिखाई पड़ रहा है और न बाहर निकलने का रास्ता दिखाई पड़ रहा है।

दिखने को सब शांत है मगर मुसीबत में सब नजर आते हैं। हैरानी परेशानी की सुई मोदी सरकार के निर्मला बजट से होती हुई कमलनाथ सरकार,किसान और मध्यम वर्ग पर आकर टिक गई है।

कर्नाटक की कुमार स्वामी सरकार के 11 विधायकों के इस्तीफे की खबर के साथ प्रदेश की कमल सरकार पर भी संकट की घटाएं सूबे के भाजपाई नेता बरसने की आस लगाए हैं। इसी तरह निर्मला के रीते बजट के बाद अब किसान और मध्यम वर्ग कार्पोरेट मास्टर कमलनाथ से उम्मीद लगाए हुए हैं।

हालांकि यहां भी बजट के मामले में झोली खाली है। या कह सकते हैं यहां कर्ज लो और घी पियो का कल्चर सरकार को फकीर बनाए हुए है।

मोदी सरकार के बजट के मामले में हम पहले भी मध्यम वर्ग की अनदेखी का जिक्र कर चुके हैं। पाठक माई बापों को याद होगा वित्तमंत्री के रूप में अरुण जेटली का पहला बजट भाषण। इसमें जेटली ने कहा था देश का मिडिल क्लास सरकार के भरोसे न रहे। इस बेरुखी को उन्होंने पूरे पांच साल निभाया भी।

फिर चुनाव हुए भोले मध्यम वर्ग ने अपने वोटों से एक दफा फिर भाजपा और मोदी की झोली 303 लोकसभा सीटें दिलाकर भर दी। जेटली की जगह निर्मला सीतारमण आईं लोगों को उम्मीद थी महिला हैं थोड़ी नरम दिल होंगी लेकिन मध्यम वर्ग के लिए न तो ममता नजर आई और न उदारता।

अब सबका ध्यान कमल सरकार के तरुण मंत्री भनोट पर टिका हुआ है। मिडिल क्लास को सरकारी शिक्षा में उच्च गुणवत्ता की दरकार है और इसी तरह इलाज के लिए शासकीय अस्पतालों में डाक्टरों के साथ अच्छी दवाओं की जरूरत है।

हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रविवार को प्रेस को बताया कि भोपाल में मुहल्ला क्लीनिक की शुरूआत की जाएगी। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने मुहल्ला क्लीनिक का जो प्रयोग किया है उसे स्वास्थ के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जा रहा है।

दिग्विजय सिंह की घोषणा पर कमलनाथ सरकार को बधाई लेकिन सरकारी स्कूल प्रदेश में पढ़ाई कम भोजनालय ज्यादा बन गए हैं। इस मामले में एक बार फिर केजरीवाल के एजुकेशन सिस्टम को प्रदेश में अपनाने की जरूरत है। लेकिन यह सब करने के लिए निजी क्षेत्र के शिक्षा और नर्सिंग होम माफिया से टक्कर लेने के लिए छप्पन इंच का सीना करना पड़ेगा।

अभी तो सरकारी स्वास्थ बीमाधारक ही निजी अस्पतालों में इलाज के लिए परेशान हो रहे हैं। सच्चाई बहुत कड़वी है स्वास्थ बीमा धारी का या तो निजी अस्पतालों में ठीक से इलाज नहीं होता है,इलाज हुआ तो उससे पहले बिल का भुगतान करना पड़ता है।

अस्पताल प्रबंधन कहता है जब हमारे पास आपका पैसा आ जाएगा तब भुगतान की राशि लौटा दी जाएगी। इसके अलावा जो उदार अस्पताल हैं इलाज करते हैं वे बीमारी के अलावा बीमा के हिसाब से पूरी राशि का बिल बनाते हैं। इसके लिए गैर जरूरी मंहगी मंहगी जांचें भी करा दी जाती हैं।

समझने के लिए कह सकते हैं कि पांच लाख का बीमा है तो अस्पताल प्रबंधन की कोशिश होती है कि एक बार में ही चार लाख नव्बे हजार रुपए का बिल बन जाए। ऐतराज करने पर कहा जाता है आपका तो कुछ खर्च हो नहीं रहा है। लिहाजा मध्यम वर्ग बच्चों की पढ़ाई बीमारी के इलाज में दबा और मरा जा रहा है।

केन्द्र से निराश होने के बाद उसकी आंसू भरी आंखें कमल के तरुण पर लगी हैं। फिर हम एक बार स्मरण करेंगे हमने लिखा था सरकार का मान और प्रतिष्ठा अच्छे वित्तमंत्री पर ही टिकेगी। खाली खजाने में भनोट कितने तरुण होकर निकलते हैं विधानसभा में पेश होने वाला बजट उनकी परीक्षा का पहला पड़ाव होगा।

खजाना खाली और कर्ज कोई नई बात नहीं है। 2003 में उमा भारती की सरकार को भी सड़क बिजली पानी से बदहाल और कर्ज में लदा खाली खजाना मिला था। उस समय राघवजी भाई वित्तमंत्री थे।

पेशे से आयकर के जानकार और वकील राघवजी ने टैक्स लगाने के साथ वसूली का ऐसा सिस्टम बनाया कि सड़क बिजली पानी के इंतजाम में धन की कोई कमी नहीं आई और कर दाताओं को तकलीफ भी नहीं हुई।

तब एक बात और थी उमाजी के बाद बाबूलाल गौर सीएम बने उन्होंने भी घोषणाओं के मामले में खजाने को ध्यान में रखते हुए काम किया। कह सकते हैं आय के साथ सरकार के खर्च पर भी नियंत्रण रखा गया।

हाल अब और खराब हैं। कर्ज का ब्याज अदा करना है। किसानों की ऋण माफी के लिए पहाड़ जैसे करीब चालीस हजार करोड़ की और व्यवस्था करनी है। कर्मचारियों को वेतन विकास कार्यों का भुगतान और नए विकास कार्यों के लिए वित्त का प्रबंधन करना बहुत टेढ़ी खीर होगा। इसमें कमी कमल सरकार को हर दिन अपयश का शिकार बनाएगी।

ऐसे में कर्नाटक में कुमार स्वामी की सरकार संकट में आती है तो मध्यप्रदेश के भाजपा नेता कांग्रेस सरकार के गिरने का ख्वाब देखना शुरू कर देंगे। इसके बाद शुरू होगा चर्चाओं में अस्थिरता का दौर। लेकिन कम लोगों को पता है कि जिन औद्योगिक घरानों से भाजपा के कर्ताधर्ताओं के संबंध हैं उनसे कमलनाथ की निकटता भी कम नहीं है।

इसलिए दो महिने पहले राज्य में लग रहा था कि सरकार कभी भी गिर सकती है। बॉस का इशारा मिलते ही सरकार पलक झपकते ही गिरा देंगे।

इस तरह की बात करने वाले भाजपा नेताओं को आलाकमान की डांट पड़ी और उनके सुर कुछ इस तरह बदले कि हमारी दिलचस्पी सरकार बनाने में नहीं है कांग्रेस सरकार तो अपने बोझ से ही गिर जाएगी।

इस तरह किसान मिडिल क्लास के साथ कमल के लिए भी आने वाले दिन मुसीबत भरे हो सकते हैं। विधानसभा का मानसून सत्र बजट के साथ बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। अंत में भाजपा के सदस्यता अभियान पर भी सबकी निगाहें हैं।

मिसकाल के मेम्बर पार्टी को कितना मिस करेंगे और कितना मिसगाइड करेंगे ये आने वाला समय बताएगा। पिछला तजुर्बा कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है।

अभी तो किसान कर्ज के मामले में बैंक के ब्याज से बचे,कमल सरकार गिरने की अफवाहों से बचे और मध्यम वर्ग अपने परिवार के लिए जो सपने देखता है वो टूटने से बचे। इसके लिए हमारी शुभकामनाएं।

 


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