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1892 में बालकृष्ण नाखरे ने आलकाट से शुरू किया था सागर में प्रिटिंग का सफर

वीथिका, मीडिया            Apr 03, 2019


ममता यादव।
मध्यप्रदेश में प्रिटिंग प्रेस का इतिहास काफी पुराना है। इसका गवाह है सागर संभाग। सन् 1892 में सागर के एक प्रगतिशील नौजवान नारायण बालकृष्ण नाखरे ने 'आलकाट प्रेस' नाम से शहर की पहली प्रिंटिंग यूनिट स्थापित करके इस शहर में प्रिंटिंग तकनीक की नींव डाली थी। दो साल बाद 1894 में इसी प्रेस से सागर की पहली मासिक पत्रिका 'विचार वाहन' शुरू हुई।

बहुत खोजने पर उस प्रिटिंग प्रेस की जानकारी तो नहीं मिल पाई कि वह आज किस स्थिति में और कहां पर है मगर इस बहाने सागर की एक बिरली एतिहासिक उपलब्धि सामने आई। नाखरे परिवार के वंशज उल्लास नाखरे बस इतना ही बता पाए जो उपर जानकारी है।

मगर सागर के वरिष्ठ पत्रकार रजनीश जैन की फेसबुक वॉल से बहुत मदद मिली। उल्लास नाखरे बताते हैं कुछ दो—एक पत्रकार आये बातचीत करके सामग्री ले गए मगर वापस नहीं आये। पत्रकारों का यह व्यवहार निश्वित ही पत्रकारिता जगत के लिए दुखदायी और संबंधितों के लिए महादुखदायी हो जाता है।

इस यूनिट की स्थापना के पीछे की कहानी जानने के लिए सवा सौ साल पहले सागर में पत्रकारिता के आरंभ और समाज में हो रहे वैचारिक बदलाव के सूत्रों को खोजा जा सकता है।

नारायण बालकृष्ण नाखरे ने अपनी प्रिंटिंग यूनिट का नाम अमेरिका से भारत आए थियोसोफिकल सोसायटी के विद्वान कर्नल हेनरी स्टील आलकाट के नाम पर रखा था।

नाखरे जी कर्नल आलकाट के विचारों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने मराठी ब्राहम्णों की वेशभूषा से एकदम जुदा कर्नल आलकाट की तरह ही दाढ़ी बढ़ा रखी थी।

आलकाट से उनका जुड़ाव महाराष्ट्र के प्रसिद्ध थियोसाफिस्ट दामोदर के मावलंकर के कारण हुआ था जो कि सागर के मराठा राजपरिवार गोविंद पंत खैर की तरह ही कराहदा ब्राहम्ण थे।

थियोसाफिकल सोसायटी यानि 'ब्रहम विद्या' संस्था के आध्यात्मिक अभियान में जाति, धर्म रंग और लिंग भेदों से ऊपर उठ कर विश्वबंधुत्व की स्थापना के साथ धर्म दर्शन के साथ विज्ञान के अध्ययन , प्रकृति के अज्ञात नियमों और मानव की अन्तःशक्तियों पर अनुसंधान किया जाना शामिल था।

युवा नाखरे ने इन्हीं विचारों के प्रचार प्रसार के लिए निरंतर लेखन करने और विचारों के प्रकाशन के लिए प्रिटिंग मशीन लगाने का फैसला किया था।

सागर में प्रिटिंग यूनिट लगाने का फैसला उस समय एक मंहगा लेकिन क्रांतिकारी फैसला था। लागत के बरक्स लाभ या रिटर्न के लिहाज से इस निवेश में खतरे ज्यादा थे लेकिन नाखरे ने यह जोखिम उठाया।

यह भी बताया जाता है कि आलकाट प्रेस नाखरे परिवार को थियोसोफिकल सोसायटी ने दान की थी।

1892 में चेम्बर प्राइस कंपनी की प्रिंटिंग मशीन सागर में लाकर उन्होंने छापाखाना स्थापित किया। नाम रखा 'आलकाट प्रेस'।

हेंड कंपोजिंग पद्धति वाली पैरों से चलने वाली इस मशीन की शोहरत इतनी फैली कि दूसरे शहरों से लोग इसे देखने आते थे। शुरूआती दौर में छपाई का काम कम मिला।

नाखरे जी ने दो साल बाद ही अपनी मासिक पत्रिका 'विचार वाहन' छाप कर समाज में हलचल मचा दी। पत्रिका में अंधविश्वास और कर्मकांड के खिलाफ विज्ञान सम्मत विचार और नई वैज्ञानिक खोजों के समाचार टिप्पणियों सहित छप रहे थे।

सागर के तत्कालीन रूढिवादी मराठी ब्राहमण समाज से तीखा विरोध हुआ। नाखरे नहीं झुके बल्कि अपनी विधवा बहिन का विवाह संपन्न करके अपने प्रगतिशील विचारों पर अपना दृढ़ भरोसा सार्वजनिक कर दिया।

'विचार वाहन' के अंतिम पृष्ठ पर सूचना छाप कर पाठकों की प्रतिक्रियाएं आमंत्रित कर उन्हें भी पत्रिका में स्थान दिया जाने लगा। इससे परिवर्तन की गति और तीव्र हो गयी।

आलकाट प्रेस को प्रकाशन के लिए एक बड़ा काम मिला 1894 में ही मिल गया। सिंधिया राजघराने के सहयोग से सागर की हितसभा नामक संस्था ने 'बाल विकास' नाम से पत्रिका छपवाना शुरू कर दी।

इस पत्रिका के संपादक मोरेश्वर राव चांदोरकर थे जो उन विसाजी चांदोरकर के वंशज थे जिन्होंने गोविंद पंत बुंदेले के लिए गढ़ामंडला राज्य यानि आज का जबलपुर फतह करके मराठा साम्राज्य में मिलाया था।

जल्दी ही नारायण बालकृष्ण नाखरे ने समसामयिक विषयों पर आधारित एक और मासिक पत्रिका 'प्रभात' शुरू की। 'प्रभात' के अंक देखने पर पता चलता है कि विवेकानंद के शिकागो भाषण, मारकोनी के वायरलैस उपकरण, रेडियम की खोज, उत्तरी ध्रुव का पता लगाने भेजी गयी अमेरिकी टीम, 1895 से 1903 के बीच भारत में प्लेग से साढ़े पंद्रह लाख से ज्यादा लोगों की मौत, टाटा की रिसर्च यूनिवर्सिटी की स्थापना की खबरें इस पत्रिका में रोचक टिप्पणियों के साथ हैं।

आलकाट प्रेस जल्द ही बुंदेलखंड की साहित्यिक और पत्रकारिक चेतना का केंद्र बन चुकी थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकार लगातार पत्र लिख कर आलकाट के प्रकाशनों को बढ़ावा दे रहे थे।

नाखरे और आलकाट के वैचारिक अधिष्ठान पर सागर की उस समृद्ध पत्रकारिता की परंपरा खड़ी हुई जिसने स्वतंत्रता की अहिंसक लड़ाई लड़ी। सागर के वर्तमान रामपुरा इलाके में रहने वाले 1860 के दशक में जन्मे नारायण बालकृष्ण नाखरे का निधन 1930 के आसपास हुआ।

उनके बाद आलकाट प्रेस को उनके बेटे गोविंदराव नाखरे ने संभाला। अपने पिता के ऊंचे सिद्धांतों के अनुरूप उनके पुत्र गोविंदराव नाखरे ने 1942 के एक सांप्रदायिक दंगे को रोकते हुए आज के साबूलाल मार्केट इलाके में वैसे ही अपनी जान गंवाई जैसे कि पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने शहादत दी थी।

पर आलकाट प्रेस का कारवां तब भी नहीं रूका। 1992 में बदलती प्रिंटिंग तकनीक की दौड़ में दम तोड़ रही आलकाट प्रेस की सौवीं वर्षगांठ मना कर नाखरे परिवार और सागरवासियों ने नारायण बालकृष्ण नाखरे और आलकाट प्रेस के वैचारिक योगदान का पुण्यस्मरण किया था।

तब भी यह प्रेस गुजराती बाजार स्थित ओल्ड शिव टाकीज के पास अपने प्राचीन मुद्रण संगीत के साथ खटर...पटर की ध्वनियाँ विखेरती थी।

इसके बाद आठ साल के भीतर सरकारी सेवाओं में पहुंच चुकी नाखरे वंश की नई पीढ़ी ने आलकाट प्रेस को बेचने का फैसला किया।

आलकाट प्रेस 21 वीं सदी का सूरज नहीं देख सकी। तकनीक के एक दौर ने बड़ी ही शान के साथ इतिहास और संस्कृति के दौर को समृद्ध करने की अपनी भूमिका को धैर्य और गौरव से निभाया।

संदर्भ:रजनीश जैन के आलेख और नाखरे परिवार के वंशज उल्लास नाखरे से बातचीत के आधार पर

 


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