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तीन लापरवाहियां इंसानी जान पर भारी, बाईक एक्सीडेंट में पिता-पुत्री की मौत, मां-बेटा भोपाल रैफर

खास खबर            Apr 30, 2022


मल्हार मीडिया ब्यूरो सीहोर।

पहली लापरवाही खुद की, दूसरी सिस्टम की, तीसरी आपकी अंधश्रद्धा। ये सब मिलकर मानव जीवन पर भारी पड़ रही हैं। इसका उदाहरण है आज सीहोर जिले के सैकड़ाखेड़ी जोड़ पर बाईक पर सवार एक परिवार का हुआ एक्सीडेंट।

पेशे से शिक्षक भोपाल निवासी भगवान सिंह मीणा आज दोपहर भोपाल से बाईक पर अपनी पत्नि रामश्री मीणा पुत्र प्रतीक और पुत्री सौम्या के साथ मध्यप्रदेश के सीेहोर के पास स्थित पंडित प्रदीप मिश्रा के आश्रम कुबरेश्वर धाम जा रहे थे।

तभी सैकड़ाखेड़ी जोड़ पर उनकी बाईक के सामने कुत्ता आ गया। कुत्ते को बचाने के चक्कर में बाईक बहककर सामने से आ रही ट्रैक्टर ट्राली से टकरा गई।

इस हादसे में पिता—पुत्री की मौत तो अस्पताल लाते समय रास्ते में ही हो गई। पर मां और बेटे को भोपाल रेफर कर दिया गया। जहां उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

ये तो हुइ इंसान की खुद की लापरवाही और अंधश्रद्धा के कारण हुई परिणति का उदाहरण।

तीसरे में सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही दोनों सामने आ गए। आते रहते हैं कोई नई बात नहीं है।

बताया जा रहा है कि एक एम्बुलेंस सीएम ड्यूटी में डॉक्टरों को ले गई है और एक सुधरने पड़ी है। नतीजतन एम्बुलेंस के इंतज़ार में पिता ने भी दम तोड़ दिया।

स्थानीय पत्रकार योगेश उपाध्याय ने हादसे की तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा पहली तस्वीर आपको विचलित कर सकती है, लेकिन यह तस्वीर सिस्टम की आत्मा को हरगिज नहीं झकझोर सकेगी, क्योंकि इस सड़ियल सिस्टम की आत्मा कभी की मर चुकी है।

यह तस्वीर है पिता पुत्री की, शहर के नजदीक घटित सड़क हादसे में बाइक सवार पति पत्नी और बेटा, बेटी गम्भीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल लाते वक्त मासूम बालिका की मौत हो गई।

हादसे के पीड़ितों को एक तो समय पर एंबूलेंस नहीं मिली। तब तक पिता ओर पुत्री दम तोड़ चुके थे। बाद में बेटी को भोपाल भेजने के लिए भी एंबुलेंस का इंतजार करीब 40 मिनट तक करना पड़ा।

रेफरल सेंटर बन चुके ट्रामा सेंटर से पति, पत्नी और बेटे को भोपाल रेफर कर दिया गया, लेकिन उन्हें ले जाने के लिए एम्बुलेंस नहीं थी।

बाहर आने पर नर्सिंग होस्टल के केम्पस में खड़ी एम्बुलेंस पर नजर पड़ी। इस नई नवेली एम्बुलेंस के पास ही एक ओर एम्बुलेंस खड़ी है जो शायद खराब है, लेकिन जो नई एम्बुलेंस है उससे अगर समय रहते मरीज को भोपाल भेज दिया जाता तो शायद उसकी जान बच सकती थी।

इस एक हादसे की खबर में सबसे उपर लिखी गईं तीनों लापरवाहियां इंसानी जानों पर महंगी पड़ गईं।

इन दिनों फलाने पंडित ढिमके बाबा बहुत चर्चा में हैं और लोग इनके पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं। न तो मौसम देख रहे न समय न दिन न रात। एक बाई पर चार लोग वह भी 44 डिग्री तापमान वाली भरी दोपहर में।

क्या हो जाता अगर मीणा परिवार वहां नहीं जाता तो? एंबूलेंस में देरी अब कोई नई बात तो रह नहीं गई। तो इसे भी कितने बार लिखा जाएगा। जनता पहले खुद की जिम्मेदारी समझे खुद की जान की फिकर करे।

सीहोर के स्थानीय पत्रकारों से बातचीत के आधार पर।

 


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