संजय श्रीवास्तव।
मेरठ में 65 साल के एक रिटायर्ड पत्रकार राजेश अवस्थी पार्क में घूमने के लिए बाहर निकले. पार्क में एकांत में ऐसी जगह जाकर बैठ गए, जहां कोई देख नहीं सके. फिर सल्फास की गोलियां गटक लीं. परिवार बाहर गया था. शाम और रात को परिवार ने मोबाइल फोन मिलाया तो ये बंद मिला. अगले दिन उनका शव वहीं मिला. लंबे कद के राजेश अवस्थी जी खामोश रहकर खूब काम करने वाले डेस्क के पत्रकार थे. 80 के दशक में मेरठ में लखनऊ से नौकरी करने आए. फिर जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों में काम करते हुए वहीं जिंदगी गुजार दी. ज्यादातर अखबार 58 साल की उम्र में अपने पत्रकारों को रिटायर कर देते हैं(बशर्ते वो पूरी नौकरी कर पाएं) लिहाजा वो भी रिटायर हो गए.
उनकी असली चुनौती इसके बाद शुरू हुई. 40 साल से ज्यादा काम करने के बाद शायद आखिरी वेतन जो उन्होंने ड्रा किया होगा, वो बमुश्किल 35000 या 40000 रहा होगा. वह इतने सालों की नौकरी के बाद भी चीफ सब एडीटर तक ही बमुश्किल पहुंच पाए. रिटायरमेंट के बाद मामूली फंड मिला. पेंशन भी अगर मिलती रही होगी तो 1500 या 2000 रुपए या बहुत ज्यादा मान लें तो 3000-4000 रुपए.
अब अवस्थी जी रोजी रोटी चलाने के लिए कम पैसों में मेरठ के लोकल अखबारों में रिटायरमेंट के बाद काम करना शुरू किया. लड़की की शादी की. जिस आवास विकास के घर में रहते थे. उसकी किश्तें भी जाती थीं. खुद भी बीमार रहते थे. बेटा बेरोजगार जैसी स्थिति में था. यानि परिवार का गुजारा बमुश्किल ही चल रहा था. धनाभाव बना रहता था. हमेशा ही कर्जा लेने की जैसी स्थिति भी.
खुद्दार किस्म के आदमी थे, लिहाजा किससे दुखड़ा रोते. किससे पैसा मांगते. हमारे एक कॉमन फ्रेंड का कहना है कि वह पिछले 6 महीने से अवसाद की स्थिति में थे. उस मित्र ने कुछ आर्थिक मदद भी की. आखिरकार हारकर उन्होंने जीवन खत्म करने वाला रास्ता चुन लिया.
रिटायर होने के बाद ज्यादातर कम वेतन भोगियों और मध्यम वेतन भोगी ईमानदार पत्रकारों की हालत यही होती है. पेंशन मिलती नहीं या बहुत ही कम. पैसों की बचत कम ही होती जाती है. बचत भी कैसे हो, जब सारा वेतन हर महीने के तमाम खर्चों में ही निकल जा रहा हो. रिटायरमेंट के बाद ना तो उनके पास स्वास्थ्य की कोई सुरक्षा होती है और ना ही आर्थिक सुरक्षा ....
छोटे शहरों यहां तक की राज्य की राजधानी के पत्रकारों की सैलरी भी ज्यादा नहीं होती. काम करने की स्थितियां मुश्किल होती हैं. टाइम का ठिकाना नहीं होता. इस महंगाई के जमाने में आप 50000 भी पा रहे हों तो अखबारों में इसे बहुत मान लिया जाता है. जबकि इतने पैसे में तरीके से रहना और घर चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है. 80 फीसदी पत्रकारों की सैलरी 40000 रुपए या नीचे ही है. वो क्या जीवन जीते होंगे, समझ सकते हैं, तो उनके सामने दूसरा रास्ता बचता है कि दलाल बन जाएं, सांठगांठ में लग जाएं. बहुत से ऐसा करने भी लगते हैं. बहुत से नहीं कर सकते. जो नहीं कर सकते, वो बेचारे ही हो जाते हैं.
अब इससे भी बड़ा सवाल - पूरे देश में निम्न मध्य वर्ग की स्थिति वाकई बहुत दयनीय लगने लगी है. नौकरी से रिटायर होने के बाद तो और भी दयनीय. ना आर्थिक सुरक्षा और ना ही स्वास्थ्य की सुरक्षा...60 के बाद जब वाकई आपको पैसे और स्वास्थ्य के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत होती है तब आप ठनठन गोपाल रहते हैं....इंश्योरेंस कंपनियां 60 के बाद और ज्यादा दूहने लगती हैं.
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