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फिल्म समीक्षा : जन नेता विजय का भौकाल !

पेज-थ्री            Jul 25, 2026


डॉ.प्रकाश हिन्दुस्तानी ।

जोसेफ विजय की फिल्म 'जन नेता' का राजनीति से उतना ही रिश्ता है, जितना सोनू निगम का इंदौर नगर निगम से ! इसमें विजय 'वन मैन आर्मी' नहीं, 'वन मैन सिस्टम' बने हैं।

फिल्म की कहानी राजनीति, भ्रष्टाचार और जनता के अधिकारों को इस अंदाज़ में परोसती है मानो फ़िल्मी एक्शन का फीफा विश्वकप चल रहा हो। यह फिल्म पर्दे पर तमिलनाडु के सीएम विजय का 'पॉलिटिकल भौकाल' है! बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ का सन्देश भी है और कम्युनल हार्मनी बनाये रखने का भी। यह अपने तमिल वोटरों को 'मैं हूँ ना' की आश्वस्ति है।

हिंसा के अतिरेक के कारण फिल्म प्रमाणन बोर्ड में यह फिल्म महीनों अटकी रही और अब 'A' सर्टिफिकेट लेकर आई है। जहाँ पुलिस असफल हो जाती है, वहाँ विजय पहुँच जाते हैं। जहाँ नेता भाषण देते हैं, वहाँ विजय फैसला सुना देते हैं और जहाँ दर्शक निराश होते हैं, वहाँ बैकग्राउंड में संगीत बज उठता है।

राजनीति यहाँ विचारधारा से कम और 'स्टाइलधारा' से ज़्यादा चलती है। भाषण कम हैं, पंचलाइन ज़्यादा। बहस कम है, भड़भड़कूटा ज़्यादा। यह विजय की आखिरी फिल्म। अब वे नेतागीरी ही करें शायद !

यह संदेश भी है कि जनता सबसे बड़ी ताकत है। हालाँकि इस संदेश तक पहुँचने के लिए नायक जितने लोगों की पिटाई करता है, उतने वोट शायद किसी उम्मीदवार को भी न मिलें! एक्शन सीन इतने बड़े हैं कि न्यूटन अगर थिएटर में बैठकर देख लेते, तो शायद अपने गति के नियमों को फिर से लिखने बैठ जाते।

इसमें हीरो लोकतंत्र भी बचाता है, व्यवस्था भी सुधारता है और बीच-बीच में खलनायकों को उड़ाता भी चलता है, फिल्म के वीएफएक्स आपको कभी अफ्रीका के कल्पित देश में ले जाते हैं, कभी तमिलनाडु के घने जंगलों में। यह तकनीक कभी मारधाड़ के दृश्यों बीच ले जाती है तो कभी चीनी ड्रोन की उड़ान में। कमजोर तकनीक और तीन घंटे तीन मिनट की लम्बाई रिक्लाइनर पर विराजे दर्शकों को लंबायमान कर देती है!

जन नेता की रेसिपी की ज़रूरी चीज़ें हैं - विजय का थलपति वेत्री कोंडन (टीवीके) वाला स्टाइल, डैडी कूल वाला इमोशन, आर्मी वाला टशन, देशभक्ति का जूनून और खलनायक बॉबी देओल का खूंखारपन। बचा ग्लैमर और नाच गाना ! बस, पिच्चर खल्लास !

फिल्म में साउथ की फिल्मों का एक और टिपिकल खलनायक प्रकाश राज भी है, नेता कम गुंडा कम देशद्रोही। एक तथाकथित जर्नलिस्ट कायल (कोयल नहीं, कायल) पूजा हेगड़े भी है, और कलाकारों की भीड़ में रेवती, प्रियामणि, मलयालय की सबसे ज्यादा कमानेवाली फिल्म प्रेमलू की हीरोइन ममिता बैजू से अलावा साउथ के कई सितारों का कैमियो भी है। कैमियो में एनिमल फिल्म के डायरेक्टर एटली, संगीतकार अनिरुद्ध, लोकेश कनगराज, शेखर आदि भी हैं, जिन्हें हम हिन्दी फिल्म दर्शक नहीं जानते। आनंदी अजय भी फिल्म में थीं, पर उनके सीन काट दिए गए हैं।

यह फिल्म हिन्दी फिल्म दर्शकों की सहनशीलता की परीक्षा के लिए बनाई गई है। इसका उपयोग दुर्दांत कैदियों को यातना देने के लिए भी किया जा सकता है। किसी से बदला लेना हो तो तो इसके टिकट भिजवा दो!

अझेलनीय और यातनीय फिल्म !

 

 

 



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