
अशोक चतुर्वेदी।
हिंदी पत्रकारिता का संस्कार ,संघर्ष का है।
1857 से 1947 तक पत्रकारिता सत्ता के खिलाफ खड़ी हुई थी। 1947 के बाद वो सत्ता के साथ बैठ गई। परिदृश्य 180° घूम गया।
दुश्मन बदल गया, पर तेवर कैसे बदल जाता?
पहले पत्रकार का दुश्मन था अंग्रेज़। अखबार उसका हथियार था। जमानत जब्त, जेल, फांसी - रिस्क था पर रुतबा भी था। गणेश शंकर विद्यार्थी गोली खाकर मरे, पर 'प्रताप' नहीं रुका।
बाद में दुश्मन थी सरकार,सो भी अपनी। पर अब हथियार की धार कुंद हो गई। "सरकार हमारी है" बोलकर सवाल करना गुनाह मान लिया गया। संघर्ष का निशाना धुंधला पड़ गया।
मिशन से बाजार बनने तक का सफर ऐसा तय हुआ
पहले का अखबार चलाने का मकसद ही था -देश को जगाना। घाटा हो जाए पर सिद्धांत न बिके। बालकृष्ण भट्ट 'हिंदी प्रदीप' बंद कर देंगे पर अंग्रेज़ की विज्ञप्ति नहीं छापेंगे।
बाद में अखबार या तो खुद इंडस्ट्री बन गया या उसका उपकरण। 1955 में प्रेस कमीशन आया, विज्ञापन का खेल शुरू हुआ। संपादक की कुर्सी के बगल में मार्केटिंग मैनेजर की कुर्सी लग गई।
पंच लाइन: पहले पाठक के लिए खबर लिखी जाती थी, अब विज्ञापनदाता के लिए खबर छोड़ी जाने लगी।
चौथा स्तंभ से चौकीदार तक बनने की त्रासदी
पहले के पत्रकार का रुतबा"जनता का वकील" का था। वह अदालत में सरकार के खिलाफ बहस करता था। बालमुकुंद गुप्त 'शिवशंभु के चिट्ठे' लिखकर लॉर्ड कर्जन की नींद उड़ाते थे।
- बाद के ज्यादातर पत्रकार = "सत्ता का प्रवक्ता"। इमरजेंसी 1975 ने असली चेहरा दिखा दिया। अखबारों पर सेंसरशिप लगी। 'इंडियन एक्सप्रेस' छोड़कर बाकी सब ने "censored" छापना मंजूर कर लिया।
उस दिन के बाद हिंदी पत्रकारिता के तेवर में से "ना" कहने वाली हिम्मत निकल गई।
फिर परिदृश्य ऐसे बदला -
आज़ादी से पहले की पत्रकारिता आग थी। अंग्रेज़ की नाव जलाती थी।
आज़ादी के बाद पत्रकारिता हीटर बन गई। सत्ता के कमरे गरम करती है।
आज़ादी से पहले खबर बेचूक माचिस थी। अंधेरे में रास्ता दिखाती थी।
आज़ादी के बाद खबर बेचारी लाइटर बन गई। बस सिगरेट सुलगाने के काम आती है।
आज़ादी से पहले संपादक भगत सिंह जैसे थे। कलम चलती थी तो लाठी चलती थी।
आज़ादी मिली तो कुछ दिन नवनिर्माण का माहौल रहा। बाद में तो संपादक ही मैनेजर बन बैठे। TRP चलती है तो कलम चलती है।
कड़वा सच यह है कि
संघर्ष का तेवर मरा नहीं, बिक गया।
पहले सरकार अखबार बंद कराती थी। अब अखबार खुद सरकार की भाषा बोलता है ताकि बंद न हो।
पहले पत्रकार जेल जाता था खबर के लिए। अब पत्रकार VIP लाइन में लग रहा है -खबर बेचने , सुविधा पाने के लिए!
बकौल बशीर बद्र:
"यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं"
आज यहाँ चैनल की TRP की कीमत है, सच की नहीं।
पर उम्मीद बाकी है। जैसे 1857 में एक 'उदंत मार्तंड' से शुरुआत हुई थी, वैसे ही आज भी यूट्यूब, पोर्टल पर कुछ लोग वही पुराना तेवर बचा रहे हैं। आग बुझी नहीं है, बस अंगारे राख में दब गए हैं।
लाख टके का सवाल-
क्या डिजिटल मीडिया वो पुराना संघर्ष वाला तेवर वापस ला पाएगा?
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