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फिल्म समीक्षा : 'द बोस फाइल्स : सच या साज़िश' न तो कोई रहस्य उजागर है , न षड्यंत्र !

पेज-थ्री            Aug 01, 2026


डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी।

यह फिल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आधिकारिक विमान दुर्घटना वाली थीसिस को चुनौती देती है और वैकल्पिक साक्ष्यों/जांच पर आधारित है।

यह फिल्म डॉक्यू-ड्रामा शैली की है और षड्यंत्र/रहस्य को उजागर करने का दावा करती है। दर्शक के सामने पूरे दो घंटे से ज्यादा की माथापच्ची के बाद भी न तो कोई रहस्य उजागर हो पाता है , न षड्यंत्र !

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन और उनसे जुड़ी अनसुलझी पहेलियाँ हमेशा से भारतीय इतिहास का एक संवेदनशील और कौतूहल से भरा अध्याय रही हैं। इस विषय पर काम करना हर फिल्मकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। निर्देशक राजेश गुप्ता की फिल्म 'द बोस फाइल्स: सच या साज़िश' इसी जटिल विषय को पर्दे पर उतारने का प्रयास करती है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लापता होने अथवा निधन को लेकर अब तक तीन आयोग गठित हो चुके हैं। संसद में भी यह बताया जा चुका है कि नेताजी का निधन 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (ताइवान) में हुए एक विमान हादसे में हुआ था। इसके बावजूद उनकी मृत्यु को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

यह फिल्म भी उसी बहाने नेताजी की मृत्यु को एक साज़िश के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि गुमनामी बाबा की पहचान की जा चुकी है और वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं थे।

इस फिल्म की सबसे आपत्तिजनक बात यह लगी कि इसमें एक पात्र नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तुलना जेम्स बॉन्ड से करता है। यह तुलना पूरी तरह अनुचित है, क्योंकि जेम्स बॉन्ड एक काल्पनिक पात्र है, जबकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के महान स्वाधीनता सेनानी थे। अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध उन्होंने जिस साहस और संगठन क्षमता के साथ आज़ादी की लड़ाई लड़ी, उसका इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान है।

जो दर्शक नेताजी के लापता होने से जुड़े रहस्यों और विभिन्न सिद्धांतों से परिचित नहीं हैं, उनके लिए यह फिल्म एक शुरुआती माध्यम का काम कर सकती है। नेताजी के व्यक्तित्व और उनकी भूमिका की झलक प्रस्तुत करने का प्रयास भी फिल्म में दिखाई देता है। लेकिन एक फीचर फिल्म के रूप में यह पटकथा के स्तर पर लड़खड़ा जाती है। फिल्म कई जगह लंबी बहसों, सम्मेलनों और भाषणों जैसी प्रतीत होने लगती है।

फिल्म डॉक्यू-ड्रामा बनकर रह जाती है। युद्धकालीन जासूसी, राजनीतिक षड्यंत्र और भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी के जीवन पर आधारित होने के कारण इस विषय को एक बड़े कैनवास और भव्य दृश्यात्मक प्रस्तुति की आवश्यकता थी, लेकिन फिल्म बड़े पर्दे पर वह प्रभाव पैदा नहीं कर पाती। ट्रीटमेंट के स्तर पर भी फिल्म में वह ताजगी और चौंकाने वाला नयापन नहीं है, जिसकी दर्शक अपेक्षा करते हैं।

यह फिल्म न तो भरपूर मनोरंजन करती है, न विश्वसनीय नई जानकारी देती है और न ही विषय का गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करती है। आखिर यह फिल्म क्यों देखी जाए?

अवांछनीय फिल्म ! कायकू देखने का ?

 

 


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