धार से इब्राहिम रिजवी।
मध्यप्रदेश के धार जिले में आने वाली धर्मराज की नगरी और मां रेवा के तट पर आज जागीरदार के भक्तों का रेला उमड़ पड़ा। महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व जागीरदार अपने भक्तों का हाल जानने वर्ष में एक बार निकलते हैं। आज पुलिस की चाक चौबंद सुरक्षा के बीच नगर के सकरे मार्ग पर लोगों के लिए सीमित जगह ही थी। जवाहर मार्ग और तारापुर मार्ग के मुहाने पर भारी भीड़ जमा थी। इतनी कि छोटे कद वालों को पीछे से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। लगातार लग रहे जागीरदार -महादेव के नारों से उत्साहित एक शख्स जब पंजों के बल खड़े होकर भी कुछ नहीं देख पाया तो दोस्त के कांधों पर ही चढ़ गया।
उस शख्स की आस्था और अपने अराध्य जागीरदार के दर्शन के लिए के लिए व्याकुलता के दोस्तों के कांधों पर चढ़ने से भी गुरेज नहीं किया। बस उस पल को उसी तरह देखने की कोशिश कर रहा हूं। खुश हूं, यह सोचकर कि धर्म में गहरी आस्था बरकरार है और यह उम्मीद भी कि इसमें अब भी बदलाव लाने का सामर्थ्य है। यह उम्मीद, यह सपना, यही ख्वाहिश ही तो है, जो इस तरह लोगों को खींच लाती है।
एक महीने से अधिक की तय्यारी.....!कभी रातों मे ध्वज घरों पर लगाते बच्चों की टोली, तो कभी बिल्वामृतेश्वर महादेव के फ्लेक्स लगाते युवा, अपने प्रतिष्ठानों के स्वागत द्वार लगाते व्यवसायी तो घरों के चोके और हॉल मे भोलेनाथ की मेंहदी और हल्दी और शाही सवारी के दिन रंगोली के बारे मे बतियाती मां-बहनें हर घर,मोहल्ले और चौराहे पर सिर्फ एक ही चर्चा इस बार बिल्वामृतेश्वर महादेव की शाही सवारी को भव्य बनाने मे क्या योगदान दे!
बिल्वामृतेश्वर की शाही सवारी नगर भ्रमण कर कुछ ही देर में स्थानीय तहसील प्रांगण स्थित ऋणमुक्तेश्वर मंदिर से शुरू होने वाली है। मंदिर के आगे हजारों लोगों की भीड़ जमा है। सलामी देने के लिए पुलिस वाले बंदूक थामे खड़े हैं और भक्त जयकारे लगाते हुए एक-एक पल पहाड़ की तरह गुजार रहे हैं। कोई यहां घुस रहा है, कोई वहां से आंख घुसाने की कोशिश में है। पूरी जुगाड़ इस बात को लेकर कि कहीं से भी एक झलक मिल जाए। तहसील वाले गेट पर इतनी भीड़ की बच्चों को कांधे पर चढ़ा दिया गया है। श्रद्धालुओं को जहां-जैसे जगह मिल गई जम गए फाल्गुन की धूप भी चुभ रही हैं। लेकिन मजाल है की धूप और भीड़ भी उनके कदम पिछे कर दे बस सब अपलक निहार रहे है।
जरा सी कोई हलचल होती है कि सब पूछ पड़ते हैं, दर्शन हो गए क्या? ये अपलक इंतजार उनके भीतर बहुत कुछ सींच रहा है। पूरे वर्ष के खालीपन को भर रहा है। वह जानता है, ये लाव-लश्कर तो कई बार और किसी और आयोजन मे जुटेंगे, लेकिन शाही सवारी के लिए बिल्वामृतेश्वर महादेव प्रजा का हाल जानने साल मे एक बार ही निकलेंगे।
इसलिए उसे भीड़ से कोई फर्क नहीं पड़ता, आसपास की धक्का परेल.सबको नज़र अंदाज़ कर सबकी एक ही भावना रहती है की बुजुर्ग महिलाओं बस एक बार बिल्वामृतेश्वर महादेव के रजत मुखोटे के दर्शन हो जाएं। हमारी नजर उन पर पड़े या न पड़े, उनकी निगाहों का करम हम पर हो जाए।
खलघाट रोड से बस स्टेंड
और फिर क्या हजारों भोलेभक्तों का कारवां नृत्य करते,जयकारे लगाते दल,बैंड, झांकियों के साथ बस स्टैंड पहुंचता है !... फूलों से लदे , अप्रीतम सौंदर्यशाली रथ मे बाबा के दर्शन कर कोई ताली बजाना भूल जाता है, किसी के मुंह में जयकारे अटक जाते हैं। कोई जोर से चीख पड़ता है और किसी की आंख से आंसू ढुलक जाते हैं। कोई बच्चों को कांधों पर उठाता है, बुजुर्गों को सावधान करता है और खुद हाथ जोडक़र किसी तरह प्रणाम करता है।
लोग कुछ क्षण वैसे ही खड़े रह जाते हैं, उन्हीं पलों में डूबे रहते हैं। तंद्रा भंग होती है तो कोई दंडवत करता है, कोई जयकारा लगाता है। आनंद उनके चेहरे से नहीं रूह से छलकता महसूस होता है।
धर्मराज की नगरी, रेवा का तट के लोग बिल्वामृतेश्वर महादेव के ब्याह के कभी घराती तो कभी बराती बन जाते है।
इसके बाहर का नजारा तो कहते ही नहीं बनता है। कोई पानी की सेवा कर रहा तो कोई खिचड़ी की,कोई बिस्किट तो किसी जगह ठंडाई, मुट्ठियों में भर-भरकर प्रसाद बांटा जा रहा है। दुनिया का 24 घंटे खाते पेट नहीं भरता और यहां बिल्वामृतेश्वर के भक्त जैसे सबकुछ लुटाने पर आमादा है।
भक्तों का जोश और जुनून पूरे ओज पर है। मतवालों की मस्ती भी पूरे चरम पर है। कोई चार-छह लोगों के झुंड में नाच रहा है, कोई करताल, झांझ-मंजीरे बजा रहा है। उनके सबके चेहरे गवाही दे रहे हैं कि वे इस वक्त किसी और ही लोक में है, किसी अनूठी मनोदशा का आनंद उठा रहे हैं। जिसमें कहीं कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, सब द्वेष, लोभ, मोह और लालच से परे होकर सिर्फ भक्त के तल पर बने रहना चाहते हैं। घंटों धरमपुरी की सड़कों और चौराहे पर नाचे और झूमे है, लेकिन कोई थकान, कोई शिकन नहीं है। अगर कुछ है तो आंखों के आगे बिल्वामृतेश्वर का वह स्वरूप, जिसे उन्होंने क्षण के बहुत छोटे से हिस्से में निहारा है।
भक्ति का यही आनंद है कि वह मनुष्य को उसके तल पर नहीं रहने देती। कुछ क्षण के लिए तो सभी को अपने आप से बड़ा होने का मौका देती है। जो उस बड़प्पन को बरकरार रख पाते हैं, वे सांसरिक प्रपंचों से परे हो जाते हैं। जो लोग कुछ पल बाद फिर पुराने तल पर लौट आते हैं, उनके भीतर भी वह प्यास तो जाग ही जाती है, जो उन्हें बार-बार, हर बार बिल्वामृतेश्वर की सवारी में खींच कर ले आती है। आज नहीं तो कल वे भी अपने तल से उठेंगे ही। यहीं जाकर हमारे तमाम धार्मिक उत्सव मनुष्य को बाहर दौड़ाते हुए भी अपने भीतर की यात्रा करा देते हैं। असतो मां सद्गमय के पथ पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं।
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