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खुला खेल फरूर्खाबादी, रिमोट से शतरंज चाहें तो आउटडोर खेल लें या इनडोर

राजनीति            Aug 30, 2019


प्रकाश भटनागर।
खुला खेल फरूर्खाबादी चल रहा है। शतरंज जोरदार खेल है। चाहें तो आउटडोर खेल लें। मर्जी हो तो इसे इनडोर भी खेला जा सकता है।

मध्यप्रदेश में जो हो रहा है वो राजनीति की शतरंज का आउटडोर गेम है, जिसकी गोटियां इनडोर में बैठे लोग संचालित कर रहे हैं। खुले में सिर्फ मोहरे हैं।

यह तकनीकी युग है। इसलिए बंद जगहों पर बैठे असली खिलाड़ी अदृश्य रिमोट से पैदल दस्ते को इधर से उधर कर रहे हैं।

डॉ. गोविंद सिंह ने बेहद बासी जानकारी बहुत मौके पर तड़का मारकर सार्वजनिक की है। उन्होंने वह कहा जो सब जानते हैं, लेकिन कहा इस अंदाज में कि सब यह भी जान गये कि उनके निशाने पर कौन है।

खनन माफिया और पुलिस की जुगलबंदी की जो रेट लिस्ट उन्होंने सार्वजनिक की, उसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट की दुकान बंद करने का तगड़ा प्रयास किया गया है।

जवाब में कांग्रेस के दो ऐसे विधायक आगबबूला हो गये, जिनकी प्रतिबद्धता जयविलास पैलेस के प्रति उतनी ही अधिक है, जितनी ज्यादा नापसंदगी इस महल के लिए सिंह की है। इसके साथ ही मंत्री तथा विधायकों, ओपीएस भदौरिया तथा रणदीप जाटव के बीच तलवारें खिंच गयी हैं।

हालांकि रेत खनन के मामलों में अब तक मध्यप्रदेश में कोई भी दूध का धुला सामने नहीं आ पाया है। न भाजपा की पन्द्रह सालों की सरकार में न कांग्रेस की पुरानी या वर्तमान सरकार में।

तो यहां जो सामने आ रहा है वो है पैदल सैनिकों यानी प्यादों का मामला। अब जरा राजा और वजीर पर भी आ जाएं। मध्यप्रदेश में जैसी सरकार चल रही है, उसे देखकर यह भ्रम हो जाना स्वाभाविक है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में से किसे राजा और किसे वजीर कहा जाए।

अलबत्ता, इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं कि शतरंज के आउटडोर वाले खेल का रिमोट इन दो की मर्जी एवं आपसी सहमति से ही संचालित किया जा रहा है।

'एक तीर से दो निशाने' वाली बात पुरानी हो चुकी। यहां तो दो तीर से एक निशाना खेला जा रहा है। निशाना यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया।

राजा और वजीर, महाराजा के साथ सियासत के तिलिस्म में ऐयारी का खेल, खेल रहे हैं। सियासत के लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यानी नाथ-सिंह की युगल जोड़ी उस गीत की धुन बनाने में मसरूफ है, जिसे सिंधिया का सियासी मर्सिया बनाने की कोशिश कहने में हमें कोई हिचक नहीं है।

यह बिसात भी बड़े मौके से हरकत में लायी गयी है। मामला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद का है। जिस पर सिंधिया की निगाह भी गड़ी हुई है। लेकिन इस डगर पर इतनी निगाहें गड़ चुकी हैं कि उस पर अब गड्ढे ही गड्ढे दिखते हैं।

जिनसे होकर अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचना किसी के लिए भी आसान नहीं रह गया है। किसी का नाम लेना ठीक नहीं हैं, किंतु ऐसी निगाहों मेंं से कई को आप बिना शक गिद्ध दृष्टि भी कह सकते हैं।

कुल जमा मामला यह कि ज्यों ही सिंधिया के हरावल दस्ते ने इस पद के लिए दुुंदुभि के स्वर बुलंद किए, त्यों ही डॉ. गोविंद सिंह के भीतर के नमक ने भी जोर मारा।

सिंह की दिग्विजय के प्रति अगाध निष्ठा तथा नाथ के लिए समयानुकूल समर्थन, किसी से छिपे नहीं हैं। लिहाजा इस दुंदुभि में नमक का पानी डालकर वह उसके स्वर मंद करने में जुट गये हैं।

जाहिर है कि प्रदेश प्रमुख की गद्दी पर नाथ और सिंह किसी 'जी हुकुम-जो हुकुम' वाले शख्स को ही बिठाना चाहेंगे। इसके लिए सबसे जरूरी है सिंधिया की रफ्तार को थामना और उसके लिए गोविंद के जरिये स्पीड ब्रेकर जैसा बंदोबस्त रचा गया है।

सिंधिया गुट उलझ गया। अवैध उत्खनन वाली बात पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया देकर महल समर्थक दो विधायकों ने साफ कर दिया है कि मामला 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाला है।

बात रेत के अवैध उत्खनन और उससे जुड़ी कमाई की हो रही है। रेत का महल अव्वल तो आसानी से बनता नहीं है। अगरचे बन भी जाये तो किसी भी समय टूटकर गिर जाता है।

ध्यान देने की बात यह कि न तो जयविलास पैलेस रेत का है और न ही राघौगढ़ किले का ऐसा हिसाब। यहां तक कि कमलनाथ छिंदवाड़ा में 'शिकारपुर कोठी' भी किसी भी तरह से कमजोर नहीं है।

हां, रेत के बगैर सीमेंट की मजबूती भी नहीं बन पाती। तो सवाल यह कि मध्यप्रदेश की सरजमीं पर उड़ाई जा रही इस बेतहाशा रेत को सीमेंट कहां से मिल पाएगी। जवाब भी हम ही दिये देते हैं। यह सीमेंट उन ठोस इरादों में है, जिनके तहत कोई ठानकर बैठा है कि अध्यक्ष पद सिंधिया को नहीं ही मिलना चाहिए।

यह सीमेंट उन हौंसलों में भी है, जो दिल्ली दरबार में ज्योतिरादित्य के नंबर घटने (यूपी के लोकसभा चुनाव नतीजे और अनुच्छेद 370 पर मोदी का समर्थन) के बावजूद जुटा हुआ है कि सिंधिया ही अध्यक्ष बनाये जाएंगे।

अंत में एक बात और रेत तथा सीमेंट से किये गये निर्माण में तब तक मजबूती नहीं आ सकती, जब तक कि उस पर पानी से तराई न की जाए।

मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर जिसकी भी सीमेंट मजबूती से चिपकेगी, उसे इस बात से बेफिक्र रहना चाहिए कि इसकी तराई के लिए पानी कहां से आएगा। वह पानी हरेक उस सच्चे कांग्रेसी की आंख से मूसलाधार गिरेगा, जो आज भी यही चाहता है कि वह किसी एकजुट पार्टी का कहलाए, बिखरी हुई पार्टी के किसी गुट विशेष का नहीं।

न उसकी यह कामना पूरी होना है और न ही उसकी आंख से आंसूओं का सैलाब कभी रुक पाएगा। क्योंकि इन आंसूओं को पोंछने की ताकत/क्षमता जिन हाथों में है, वे सभी रिमोट से शतरंज खेलने के माहिर हैं और यह उनका स्थायी भाव बन चुका है। जय हो।

 


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