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शिक्षक की नौकरी प्रबंधन की कलम की नोंक पर रख सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद बेमानी

खरी-खरी            Aug 30, 2025


 

 हेमंत कुमार झा।

 

हाल के वर्षों में दुनिया भर में जितने भी रिसर्च हुए हैं प्रायः सभी में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति और उनकी सेवा सुरक्षा का गहरा संबंध शिक्षा की गुणवत्ता से है।

किसी भी शिक्षक की नौकरी को प्रबंधन की कलम की नोंक पर रख कर उससे सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद नहीं की जा सकती। अब यह अलग बात है कि प्रबंधन का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता है या शिक्षा की दुकान खोल कर मुनाफे का खेल रचाना।

इस परिप्रेक्ष्य में विश्वविद्यालयों में कॉन्ट्रैक्ट/अतिथि आदि टाइप की नियुक्तियों की बढ़ती प्रवृत्ति गंभीर सवाल उठाती है। सरकार अपने नागरिकों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देना चाहती है या एक ऐसा स्ट्रक्चर डेवलप करना चाहती है जिसमें क्वालिटी शिक्षा धीरे धीरे कुछ खास संस्थानों तक सिमटती जाए और बाकी तमाम संस्थान औसत दर्जे की शिक्षा देकर औसत दर्जे के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट की फसल पैदा करें जो औसत दर्जे की नौकरियों के लिए आपस में प्रतिस्पर्द्धा करते रहें।

 बीते दस वर्षों में उच्च शिक्षा के संस्थानों में जिस स्तर पर फीस वृद्धि हुई है वह पिछले 75 वर्षों में नहीं हुई थी। मेडिकल शिक्षा तो आम आदमी क्या, मिडिल क्लास के लोगों की औकात से बाहर हो चुकी है, प्रबंधन, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा देने वाले अन्य संस्थानों में भी बेतहाशा फीस वृद्धि हुई है।

सामान्य शिक्षा देने वाले संस्थानों में भी फीस वृद्धि का यही आलम है। बिहार में जब से नई शिक्षा नीति, 2020 के तहत स्नातक शिक्षा में सेमेस्टर सिस्टम लागू किया गया है, छात्रों की फीस में लगभग छह गुने की वृद्धि कर दी गई है।

   छह गुनी वृद्धि ।

यह असामान्य है। तब, जबकि बिहार के अधिकतर कॉलेज नियमित और स्थायी शिक्षकों की घोर कमी से जूझ रहे हैं और क्लास संचालित करने के लिए उनकी निर्भरता कॉन्ट्रैक्ट/अतिथि शिक्षकों पर बढ़ती जा रही है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में कॉरपोरेट कल्चर का दखल जितना बढ़ेगा, शिक्षकों के अधिकार और छात्रों के हित उतने ही अधिक प्रभावित होंगे।

त्रासदी यह कि यह दखल बढ़ रहा है और बढ़ता ही जा रहा है। स्वायत्त कॉलेजों की अवधारणा पर बातें चाहे जितनी बना ली जाएं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसे कॉलेजों में शिक्षकों की गरिमा में ह्रास और छात्रों के आर्थिक शोषण के तमाम उपकरण विकसित होते गए हैं।

एक बार पटना के एक नामी महिला कॉलेज का विज्ञापन नजरों से गुजरा था जिसे सरकार स्वायत्त संस्थान का दर्जा दे चुकी है। उस विज्ञापन में कुछ विषयों के अध्यापन के लिए कॉन्ट्रैक्ट आधारित कुछ शिक्षकों की रिक्तियां निकली थी। उनमें आवेदकों के लिए जो योग्यता निर्धारित की गई थी उसे देख कर लगा कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में जब प्रोफेसरों की वैकेंसी निकलती होगी तो इससे अधिक अर्हता क्या मांगते होंगे वे लोग भी। लेकिन, जब वेतन वाले कॉलम पर नजर पड़ी तो पता चला कि इस नामी "ऑटोनोमस" कॉलेज में कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्ति पाने वाले शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति में मिलने वाले वेतन का लगभग आधा मिलेगा।

यानी, योग्यता चाहिए ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में पढ़ाने वाले असिस्टेंट प्रोफेसरों की तरह लेकिन वेतन देंगे जूनियर क्लर्क के लेवल का।

विडंबना यह कि स्वायत्त यानी "ऑटोनोमस" घोषित होने के बाद उक्त कॉलेज ने अधिकतर कोर्सेज की फीस कई गुने बढ़ा दी। यह स्वायत्तता देने के नाम पर किसी संस्थान को बाजार के नियमों के हवाले करने की नीति है जहां शिक्षकों के आर्थिक और मानसिक शोषण का रास्ता तैयार हो और निर्धन छात्रों के प्रवेश का रास्ता बाधित हो।

अन्य सरकारी कॉलेजों में भी यही स्थिति है। कॉन्ट्रैक्ट/अतिथि के नाम पर नियुक्त शिक्षकों का वास्तविक वेतन स्थायी के आधा से भी कम है।

 जिस देश और समाज में ज्ञान प्रक्रिया में इतना शोषण और बौद्धिक वर्ग के आत्मसम्मान पर इतने प्रहार हों वहां का सत्तासीन राजनीतिक दल अगर अपने मतदाताओं के बीच जल्दी ही "विश्वगुरु" बन जाने का दावा करता हो तो यह और कुछ नहीं, राजनीतिक फलसफे का प्रोपेगेंडा में बदल जाने का आख्यान मात्र ही है।

   सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा, "प्रोफेसर समाज की बौद्धिक रीढ़ हैं"।

  संस्थानों में हावी होता कॉरपोरेट कल्चर इस बौद्धिक रीढ़ को खोखला करने के षड्यंत्र का हिस्सा है। इस षड्यंत्र में सत्ता संरचना सफल होती दिख भी रही है। अभी यह सफलता आंशिक है, आने वाले दिनों में षड्यंत्र की इस सफलता का ग्राफ बढ़ता दिखने वाला है।

 हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में समाज और सभ्यता के समक्ष जलते सवालों से जूझने का माद्दा घटता जा रहा है और अकादमिक पतन का ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है जिसकी विवेचना आने वाले समय के इतिहासकार करेंगे।

जिधर देखो, जहां देखो, "भारत की ज्ञान परंपरा" के नाम पर सत्ता प्रायोजित सेमिनार संगोष्ठियों की बहार आई हुई है। इनमें भाग लेने वाले अधिकतर बड़े बड़े विद्वतजन मंच पर पहुंच कर सत्ता की मानसिकता को सहलाने वाली ऐसी ऐसी बातें उवाच रहे हैं जिनका आज के चुनौतीपूर्ण सवालों से कोई संबंध नहीं।

 जिस समाज का बौद्धिक तबका वर्तमान के समक्ष जलते सवालों से मुंह चुरा कर सत्ता संरचना के प्रोपेगेंडा का वाहक बन जाए वह अकादमिक पतन की गाथा ही लिख सकता है। हमारी हिन्दी पट्टी में बौद्धिकों की इस प्रवृत्ति का खास असर देखा जा सकता है।

व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का असर देश में सबसे अधिक हिंदी भाषी क्षेत्र में ही क्यों दृष्टिगोचर हो रहा है इसे समझने के लिए हम इस बौद्धिक पतन की प्रक्रिया का विश्लेषण कर सकते हैं।

  हर दौर में सत्ता संरचना की कृपा छाया में पनपने वाले बौद्धिकों की जमात संस्थानों में महत्व पाती रही है लेकिन अब जो दृश्य है वह निराला है। ज्ञान विरोधियों की अनैतिक जमात का इतना व्यापक वर्चस्व शिक्षा संस्थानों पर कभी नहीं बढ़ा था।

यह वर्चस्व किसी भी समाज को अकादमिक पतन की गहरी तलहटी में ही धकेल सकता है। कुछ भी सार्थक करने की योग्यता और कल्पना शक्ति से रहित भ्रष्ट लोगों की प्रमुखता संस्थानों को दीमक की तरह खोखला कर रही है।

कॉर्पोरेट संस्कृति ज्ञान की प्रक्रिया और उसकी दिशा को निर्धारित करने की शक्ति खुद में समाहित करने की कोशिश करती ही है। उसे सोचने समझने वाला समाज नहीं चाहिए, उसे दिशा निर्देशक संकेतों पर चलने वाला समुदाय चाहिए।

दिशा वे निर्धारित करेंगे, तंत्र पर वर्चस्व उनका होगा।

 प्रतिरोध और स्वतंत्र चिंतन जैसे शब्दों से कॉरपोरेट संस्कृति के सूत्रधारों को गहरी आपत्ति है। इसलिए संस्थानों पर कब्जा जरूरी है क्योंकि ये संस्थान ही हैं जो चिंतन की स्वतंत्रता और प्रतिरोध की चेतना को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

 समय की मांग है कि चिंतन और प्रतिरोध की चेतना का विकास हो जबकि सत्ता और समय की लहरों पर सवार कॉर्पोरेट संस्कृति के अलंबरदारों की मांग है कि यह चेतना कुंद हो।

  स्वतंत्र चिंतन से ही सशक्त प्रतिरोध की चेतना का विकास होगा इसलिए चिंतन की स्वतंत्रता पर ही लगाम लगानी होगी। देखना होगा कि शिक्षक समुदाय के चिंतन की दिशा क्या है, उसके लेखन में, उसके व्याख्यानों में युग की कैसी व्याख्या है और प्रतिरोध की कैसी और कितनी प्रेरणा है। इसके लिए सबसे अधिक जरूरी है कि इस समुदाय को कमजोर और पालतू बनाया जाए।

 महज तीस हजार रुपए महीने पर पढ़ाने वाले गुजरात के सरकारी कॉलेजों के कॉन्ट्रैक्ट प्राध्यापकों के सांस्थानिक शोषण और उनकी आर्थिक दुर्दशा पर सुप्रीम कोर्ट ने जो भी नाराजगी व्यक्त की उसका दायरा बिहार आदि राज्यों में भी उसी दुर्दशा को झेल रहे हजारों कॉन्ट्रैक्ट/अतिथि शिक्षकों तक भी बढ़ना चाहिए।

न्यायालय समाज की बौद्धिक दिशा तय नहीं कर सकते न प्रतिरोध की चेतना का परिष्कार ही कर सकते हैं। यह तो किसी भी समाज को खुद के भीतर से ही हासिल करना होगा। हिन्दी भाषी समाज इसके लिए आज कितना तैयार है, इस पर मंथन की जरूरत है।

कॉर्पोरेट परस्त सत्ता संरचना ने समाज में सरकारी शिक्षकों की छवि गिराने में बड़ी भूमिका निभाई और इसके लिए शीर्ष पर भ्रष्ट और अनैतिक लोगों के वर्चस्व को बढ़ावा दिया। 

गलत लोग संस्थानों को सही संस्कृति प्रदान कर ही नहीं सकते। आज हिंदी पट्टी के अधिकतर संस्थानों की दुर्दशा ने आम लोगों की आस्था को खंडित किया है और इस बढ़ती अनास्था ने समाज में शिक्षकों की गरिमा और प्रतिष्ठा को बुरी तरह प्रभावित किया है।

 कॉर्पोरेट संस्कृति में ढलते संस्थान बाजार के लिए हितकारी हो सकते हैं, सत्ता की आश्वस्ति का आधार बन सकते हैं लेकिन युग की ज्ञान प्रक्रिया की दिशा को मनुष्य विरोधी बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखने वाले होंगे। आज अगर व्यवस्था मनुष्य विरोधी बनती जा रही है तो इसके मूल में ज्ञान की प्रक्रिया पर बाजार की शक्तियों और उनके दलालों के बढ़ते वर्चस्व की भूमिका पर विचार करने की सबसे अधिक जरूरत है।

लेखक पटना यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं

 

 

 


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