राकेश दुबे।
इसे क्या कहूँ! एक पर्व की शोभायात्रा पर देश के छह राज्यों में हिंसा का फूटना महज संयोग नहीं है। इस पर विचार कर ही रहा था, देश की परिस्थिति और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यानन ‘अज्ञेय’ याद आए।
साथ ही याद आई उनकी कविता जो आज भी मौजूँ है, बीते कल यानि 4 अप्रैल ‘अज्ञेय’जी का निर्वाण दिवस था।
अमृतकाल में उनकी यह कविता आज सटीक है। 75 साल बाद भी होती हिंसा के लिए उनकी यह पंक्तियाँ कितनी मुफ़ीद है:-
साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ--(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना--
विष कहाँ पाया?
यह विडंबना ही है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष व गंगा-जमुनी संस्कृति वाले देश में पर्व-त्योहारों पर हिंसक घटनाओं का अनवरत सिलसिला थम नहीं रहा है।
महाराष्ट्र के मलाड, बिहार के सासाराम, बिहार शरीफ व नालंदा, वडोदरा से लेकर हावड़ा तक भड़की हिंसा दर्शाती है कि हिंसा के मूल में महज स्थानीय कारक ही शामिल नहीं थे।
आशंका जतायी जा रही है कि दो संप्रदायों में विभाजन की कोशिश करके भयादोहन किया जा रहा है। कहीं न कहीं ध्रुवीकरण के जरिये वोटों की फसल सींचने की कवायद जान पड़ती है।
विपक्ष जहां इसे राज्य सरकारों की कानून-व्यवस्था बनाये रखने में विफलता बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष उपद्रवियों को भड़काने का आरोप दल विशेष पर लगा रहा है, लेकिन एक बात तो तय है कि कई राज्यों में एक साथ हिंसा का होना महज संयोग नहीं है।
जो कई तरह के सवालों को जन्म दे रहा है। यूं तो विगत में भी रामनवमी के जुलूस पर पथराव की घटनाएं होती रही हैं। लेकिन ये घटनाएं छिटपुट रूप में सामने आती रही हैं। पिछले साल दिल्ली की जहांगीरपुरी में भी हिंसा हुई थी। लेकिन इस बार कई राज्यों में एक साथ हिंसा का होना गंभीर स्थितियों की तरफ इशारा करता है।
देश में विभिन्न पर्व-त्योहार मिल-जुलकर शांति से मनाने की समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन हाल के दिनों में कटुता व विद्वेष का यह आलम है कि संशय की दीवार लगातार ऊंची होती जा रही है। जिसके चलते पर्व-त्योहारों पर हिंसा आम घटनाएं होती जा रही हैं।
सबसे ज्यादा चिंता तो हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति के संकुचित होने की है। सांप्रदायिकता से परे मिल-जुलकर साथ चलने की सोच में लगातार पराभव नजर आता है।
पर्व-त्योहारों के मौकों पर भड़की हिंसा के जख्म पीड़ितों को सालों-साल सालते रहते हैं।
जो विभिन्न संप्रदायों में लगातार दूरी को ही बढ़ावा देती है। वहीं नेताओं के सांप्रदायिक दुर्भावना बढ़ाने वाले भाषण आग में घी का काम करते हैं।
ऐसे में नफरत बढ़ाने वाले तत्वों पर अंकुश लगाने वाली एजेंसियों की ऊहापोह की स्थिति समस्या को जटिल ही बनाती है।
एक बड़ा प्रश्न यह भी कि किसी राज्य विशेष में चुनाव से पहले इस तरह की हिंसा और टकराव के मामले क्यों सामने आते हैं? फिर चुनाव के पश्चात तूफान के बाद जैसी शांति कैसे छा जाती है?
निष्कर्ष स्पष्ट है कि आम लोग शांति व सौहार्द से रहना चाहते हैं मगर राजनेताओं को यह स्थिति रास नहीं आती।
राजनेताओं को नहीं भूलना चाहिए कि हिंसा की बुनियाद पर बने राजनीति के गुंबदों को ध्वस्त होने में भी देर नहीं लगती।
इस हिंसा से कालांतर भस्मासुर जैसा एक वर्ग ऐसा तैयार हो जाता है जो लोकतांत्रिक परंपराओं और कानून-व्यवस्था के प्रतीक व प्रतिमानों को निगल जाता है।
जिसे भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिये शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। यह घटनाक्रम हमारे दिल-दिमाग पर ऐसा जहरीला प्रदूषण फैला रहा है, जिस पर काबू पाना भविष्य में आसान नहीं रहेगा।
देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का संवर्धन हो और सामाजिक समरसता समृद्ध हो, इसके लिये हमारे एनजीओ, सामाजिक संगठनों व बुद्धिजीवियों को आगे आना पड़ेगा।
आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को संरक्षित करने और देश में अमन-चैन कायम करने के लिये यह वक्त की मांग भी है।
Comments