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फिल्म समीक्षा:दूरदर्शन के पुराने सीरियल जैसी फर्रे

पेज-थ्री            Nov 24, 2023


डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी।

दो-तीन दशक पुराने दूरदर्शन के दौर में ले जाती है सलमान खान की भांजी अलीजेह अग्निहोत्री की यह फिल्म। बेहद साफ़ सुथरी फिल्म है। अभी अभी लॉन्ड्री से धुलकर आई चुनरिया जैसी। न हिंसा, न गाली गलौज़, न फूहड़ता, न अश्लीलता। निर्देशक सौमेंद्र पाधी हैं, जिन्होंने जामताड़ा बनाई थी। ओटीटी के लिए बनी थी फिल्म ‘फर्रे’ लेकिन सलमान खान के कारण सिनेमाघरों में आ गई।

फर्रे का मतलब परीक्षा में बनाई जाने वाली चिट, नकल पट्टी का पुर्जा, चीटिंग।  यही है इस फिल्म में।  सन्देश भी है कि जो चीज आप मेहनत करके पा सकते हो, उसकी चोरी क्यों करना? फिल्म स्कूल में परीक्षा के दौरान होने वाले नकल के बदलते तरीकों पर आधारित है। आम तौर पर जब बॉलीवुड में किसी स्टार किड को लॉन्च किया जाता है, तो लॉन्च पैड के रूप में ऐसी फिल्म बनाई जाती है, जिसमें रोमांस, नाच-गाना, एक्शन से लेकर ग्लैमर जैसे  कई नुस्खे होते हैं।

यह फिल्म एक अलग नजरिए से बनाई गई है।  बेहद जीनियस और जुगाड़ू नियति (अलीजेह अग्निहोत्री) से कहानी शुरू होती है, जो वॉर्डन (रोनित रॉय) और जोया (जूही बब्बर) के अनाथालय में दूसरे कई अनाथ बच्चों के साथ रहती हैं। पढ़ने-लिखने में कंप्यूटर-सा दिमाग रखने वाली नियति को स्कूल में टॉप करने के बाद दिल्ली के मंहगे और हाई-फाई स्कूल में दाखिला मिलता है, जहां रईसी का बोलबाला है। नियति स्कूल पर मंत्रमुग्ध है।

स्कूल के पहले ही दिन नियति फिजिक्स का एक सवाल हल करने के लिए अपनी क्लासमेट छवि  की मदद करती है। इस पहल के बाद वह अमीरजादों के ग्रुप में शामिल हो जाती है। चकाचौंध में आकर वह ग्रुप के लोगों को नक़ल करवाने लगती है और फिर एक रैकेट में शामिल हो जाती है। 

चीटिंग और नकल करने के नए-नए तरीके ईजाद करके वह ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच जाती है।  चीटिंग करवाकर अच्छे मार्क्स दिलाने के बदले मिलने वाले पैसों के लालच में वह दलदल में धंस जाती है।  यह  फिल्म कोरियन मूवी 'बैड जीनियस' से प्रेरित है।  फिल्म में प्यार-रोमांस के फॉर्मूलों को जबरदस्ती नहीं ठूंसा है। युवा दर्शकों के लिए देखनीय फिल्म है।

 

 



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