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25 साल पुरानी बॉर्डर देखो फिर पिप्पा देखो

पेज-थ्री            Nov 19, 2023


अविनाश त्रिपाठी।

आपको लगेगा बॉलीवुड वाले फिल्म बनाना बिल्कुल भूल चुके हैं।

जब मुफ्त में घर बैठे देखने को मिल रही है तब आपसे दो घंटे झेले नहीं जाएगी। हीरो जो फौजी है, उसे आपको अनुशासनहीन, बत्तेमीज, बिगड़ैल दिखाना है क्योंकि वो हीरो ही क्या जो तमीज में रहे फिर चाहे वो सैनिक ही क्यो न हो। एनसीसी कैंप में जब कोई एक गलती करता था तो सारे कैडेट्स को सजा मिलती थी क्योंकि सेना के लिए अनुशासन ही सब कुछ है आपकी एक लापरवाही आपकी यूनिट, आपकी सेना और आपके देश के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती है लेकिन यहां हीरो फुल अपने ताव में है विलेन वो है जो उससे अनुशासित रहने को कह रहे हैं।

शरीफ होना फिल्म वालों के लिए बोर होना है। कितनी ही फिल्मों में आपको हीरोइन के साथ एक लड़का दिखाएंगे जो सीधा, शरीफ सज्जन है लेकिन हीरोइन को पसंद क्यों नहीं क्यों शरीफ होना आपको बोक बनाता है। यहा हीरो की बहन की शादी जिससे होनी है  उसे ऐसे ही दिखाया गया है।

और सबसे लूल डॉयलॉग है हीरो की मां को जो हीरो को कहती है जब तुम दो साल के थे हम भी पाकिस्तान से आए थे, हम भी तो रिफ्यूजी है। अब कोई इनसे पूछे कि आप पाकिस्तान करने क्या गए थो जो वहां से आना पड़ा? हिन्दुओं में इतनी भी बेसिक समझ नहीं कि पाकिस्तान जैसी कोई चीज 14 अगस्त 1947 से पहले थी ही नहीं। आज जो पाकिस्तान है वो सब भारत ही था और किसी हिन्दू ने पाकिस्तानी नहीं मांगा, जो 1947 में आए वो रिफ्यूजी बनकर दूसरे देश में नहीं आए। वो भारतीय ही थो जो चलकर वापस भारत में ही आए और जो नहीं आ पाए वो पाकिस्तान में हिन्दू होने की कीमत आज तक चुका रहे हैं। फिल्म के डॉयलॉग के हिसाब से तो चाणक्य पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी मे पढ़ाते होंगे क्योंकि तक्षशिला तो पाकिस्तान में थी और भगत सिंह भी पाकिस्तानी हुए तो हमें तो उन्हें हीरो मानने की जगह विदेशी मानना शुरू कर देना चाहिए।

लेकिन न फिल्म बनाने वाले को पता है

न देखने वाले को

क्या लूल पिक्चर है

करैक्टर देखना है तो बॉर्डर में मथुरादास का देखो जो पूरी फिल्म में निगेटिव करेक्टर है, जिसका कमांडर उसे गद्दार बताकर गोली मारने की धमकी देता है और वो अपनी कैंसर से मरती पत्नी को छोड़कर आधे रास्ते से वापस अपनी यूनिट के साथ मरने के लिए आ जाता है।

यह है सैनिक का जज्बा

सुबह का नाश्ता जैसलमेर में करेंगे

दोपहर का खाना जोधपुर में करेंगे

रात का खाना नई दिल्ली में करेंगे

कब लिखोगे ऐसे डॉयलॉग?

सारी फिल्मों में एजेंडा घुसाए रखो

न गाने बन रहे हैं, न फिल्में

2 मिनट का ट्रेलर ही बना पा रहे है बड़ी मुश्किल से

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