स्वरांगी साने।
मेरे हाथ एक किताब आती है, किताब कहूँ या डायरी, चलिए डायरीनुमा किताब कह लेते हैं। उस किताब का शीर्षक है- ‘अब मैं बोलूँगी’। यह शीर्षक धमकी है या सूचना, इससे अनजान होकर मैं कुछ पन्ने पलटती हूँ और लगता है यह तो एक विस्फ़ोटक किताब है। यह किताब माचिस की तीली की तरह है, जिसके भीतर बारूद का ढेर हो, वह इस किताब को पढ़ते ही फट सकता है। डरिए नहीं यह किताब कोई राजनीतिक या धार्मिक परिवेश पर नहीं लिखी गई है कि तुरंत फतवे जारी कर, इस पर रोक लगा दी जाए।
यह किताब मीडिया जगत् की सच्चाई को बयाँ करती है। बीते लगभग एक दशक में मीडिया जिस तेज़ी से कॉरपोरेट जगत् में तब्दील हुआ है, उसकी हकीकत को उजागर करती है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, जैसी कोई बात इस किताब के बारे में कह सकते हैं।
यह किताब अनगढ़ व्यक्तित्व का दर्पण है, कहीं-कहीं उसकी शैली भी उतनी ही अनगढ़ लगती है, पर इसलिए बहुत सरल और तरल भी है। किसी तरह का लाग-लपेट इसमें नहीं है। ऐसा लगता है दुनिया से बिरले होते जा रहे अनगढ़ लोगों की सामूहिक आत्मकथा ही इसमें एक व्यक्ति की कलम से उभरी है।
शिवना प्रकाशन से यह किताब इसी साल आई है। इसकी लेखिका हैं- स्मृति आदित्य। जो लोग स्मृति को जानते हैं, वे जानते हैं कि स्मृति कितनी सरल और तरल है, वैसी ही उनकी लेखनी भी है। डायरी को जिस तरह पारदर्शी होना चाहिए, वैसी ही यह है। कई स्थानों पर व्यक्तियों के सही नाम छिपा दिए गए हैं।
आंचलिकता का पुट इस किताब में है और जो उस अंचल के हैं, या मीडिया से जुड़े हैं वे बिना नाम के भी उन लोगों के वर्णन पढ़, उनके बारे में जान सकते हैं। बेखौफ़ होकर लिखा है तो नाम भी दे दिए जाते तो क्या गलत होता। किताब की पारदर्शिता और बढ़ती। डायरीनुमा किताब को ऐसा ही होना भी चाहिए कि जो सच है, उसे वैसे ही लिख दिया जाए। यह संकोच शायद लेखिका के व्यक्तित्व से आया है, जिसमें शालीनता की सीमा को लाँघा नहीं गया है।
लेखिका पर जिस तरह की तोहमतें लगीं और दूसरी ओर लगातार जिस तरह अवार्ड मिलते गए। यह विरोधाभास कॉरपोरेट जगत् के दोगलेपन को दिखाने के लिए काफ़ी है। लाड़ली मीडिया अवार्ड मिलने वाली लेखिका से संस्था में कहा जाता है कि उसे बेहतर काम करना नहीं आता तो कोई संवेदनशील उसे कैसे स्वीकारेगा।
इस किताब को पढ़ते हुए यह बात रेखांकित हो जाती है कि आज के युग में संवेदनशील या आत्मसम्मान से जीने की चाह रखने वाले मिसफ़िट होते जा रहे हैं। संवेदनशील होना आज गुण के बजाय अवगुण बन गया है। पत्रकारिता जो पहले मिशन था, अब नौकरी भर बनकर रह गया है। आप नौकरी कर रहे हैं, हर महीने आपके खाते में वेतन जमा हो रहा है तो आप सारे अपमान, जिल्लत के खून के घूँट पीकर नौकरी करते रहे। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। इस डायरी की शुरुआत 26 जुलाई 2023 से होती है और दिसंबर तक के ब्यौरे इसमें दर्ज हैं। पतली-सी किताब है, कहने को आप एक बैठक में पढ़ सकते हैं पर यदि आप बिटवीन द लाइंस पढ़ने की चाह रखते हैं तो थोड़ा इत्मीनान से इसे पढ़िए।
यह डायरी केवल स्मृति की नहीं है। कई मीडियाकर्मियों को लग सकता है कि कमोबेश ये सब उनके साथ भी हुआ है या होता आ रहा है। पत्रकारिता के जिस जुनून को सिर पर बाँध उन्होंने कदम रखा था वह सिर पर कफ़न बाँधने जैसा हो गया है। आज की पीढ़ी कॉरपोरेट युग की है। वह जानती है कि मीडिया में काम करना मतलब अखबार के मालिक का चार भला करना और दो अपना भी कर लेना, उन्हें इस किताब में कुछ नहीं मिलेगा। हो सकता है उन्हें यह भी लगेगा कि इसमें इतनी हाय-तौबा करने की क्या बात है। पर जिन्होंने सच के लिए लिखना स्वीकारा था और जिनका भ्रम तेजी से टूटा है उनके लिए यह उनकी अपनी अभिव्यक्ति है। वैसे अब यह कहना मुश्किल है कि आईने पर धूल है या लोगों के चेहरों पर ही, क्योंकि उन्हें आईना तो साफ़ ही दिख रहा है, शायद पहले से अधिक चमकदार और लुभावना भी। अखबारों के पन्ने चिकने होने लगे हैं, चिकनी-चुपड़ी बातें करने वालों की बढ़ती तादाद की तरह। यह किताब आने वाले समय का दस्तावेज है जो बताएगी कि मीडिया का असली चेहरा धीरे-धीरे कितना दूषित होता गया। ‘अब मैं बोलूँगी’ किताब यदि ‘हैश टैग मीटू’ की तरह की लहर बन गया तो जाने कितनों के चेहरे और पर्दाफ़ाश हो सकते हैं। यह किताब पूछ रही है- क्या आपमें इतनी हिम्मत है, कि आप भी कहे कि अब तो मैं भी बोलूँ ....
किताब- अब मैं बोलूँगी
लेखिका- स्मृति आदित्य
प्रथम संस्करण- 2025
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन
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