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तब उम्मीद होती थी, आज अपेक्षाओं का ढेर है

वीथिका            Jul 26, 2022


श्रद्धा जोशी।
बात उन दिनों से शुरू करु जब "अक्ल के लट्ठ" की संज्ञा गाहे बगाहे मिल ही जाया करती थी, और जिसकी पूर्ण संभावना के मद्देनजर ना कोई डर ही बचा था और ना ही कोई शर्म। सुनने मे शायद अजीब ही लगेगा पर सच तो सच ही होता है।

आज जैसे भारी भरकम प्रतियोगितात्मक बस्ते तो हमारे कांधो पर मम्मी पापा ने नही टंगाए थे क्योकि वे तो सीधे सादे प्राणी हमारे रोज़ स्कूल चले जाने से ही तब गदगद हुए जाते थे, लेकिन अरमान तो उनके मन मे भी हिलोरे मारते ही रहे होंगें, तभी किताब के दो पन्नों के खुलने के बाद ही अक्ल के लट्ठ, बुद्धिहीन, एक बार मे समझ नही आता, निरे गंवार जैसे कर्णप्रिय शब्दों से हमारा परिचय होता रहता।

खैर इन्ही शब्दों के बदोलत ही आज हम, इस युग की हमारी अगली पीढ़ी के सामने बड़े शान से खड़े होकर हमारे मम्मी पापा की डांट फटकार का उदाहरण देने मे पीछे नहीं रहते, कि कैसे हम घिघ्घी बिल्ली बने सब सुनकर किताब मे ऐसे सिर घुसेड़े होते कि भूल से भी किसी को हमारा चेहरा उस समय तो नही दिखता, और अगली पीढ़ी को यही मनवाने की कोशिश करते कि जो हमने उनका ना सुना होता तो आज थोड़े ही हम, हम होते!

पर ये हमारी अगली पीढ़ी , नानी के सिर चढ़ी औलादे काहे हमारी चलने देगी, पटाक से प्रतिउत्तर में मम्मी, नानी आपको इतना ना तंगाती होंगी, जितना सुबह शाम आप हमारे पीछे पड़ी रहती हो।

अब हम क्या समझाएं कि हम तब क्या क्या झेले हैं और अब क्या-क्या झेल रहे है। हां, लेकिन तब ये नही था कि हमे प्रतिशत के बोझ ढोने पड़े हो।

क्योकि तब तो फर्स्ट डिवीजन याने की 60% आना ही बड़ी बात हो जाती थी, और मजेदार तो ये था कि अगर 80%-90% आ जाता तो खुद अखबार मे दिया जाता था, और तब की खुशी का आलम तो कुछ और ही रहता।

आज बच्चो को तो छोड़ो, स्कूलो के बीच ही होड़ लगी हुई है कि किसका कितना अधिक % परिणाम रहा, और कोटी धन्यवाद अखबार को, जिनके माध्यम से हमे ज्ञात होता है कि कौन सा विद्यालय "द बेस्ट" मे श्रेणीबद्ध हो गया है।

पर कितना अजीब है कि हमारे समय मे इतने साधन, इतना भारी पाठ्यक्रम ना होने के बाद भी हमारे समय के कई बुद्धिजीवी गण ऐसे है जिन्हे आज भी कोई टक्कर नही सकता है, जबकि तब आज के समय जैसा ना कोई पढ़ाई का दबाव था और ना ही कोई प्रतिशत की विशेष मांग।

जबकि आज का बच्चा न जाने कितने बोझ को ना केवल कंधों पर टांगकर इस प्रतियोगिता मे दौड़ रहा है बल्कि अपने सिर मे भी ढोया हुआ है।

मजबूरी तो यही है कि तब शायद उम्मीद होती थी, लेकिन आज अपेक्षाओं का ढेर है, जिस पर बच्चों को बैठा दिया है, जो कभी ना खत्म होने वाला ढेर बन गया है।

लेखिका आईपीएस अधिकारी हैं वर्तमान में एआईजी ट्रेनिंग भोपाल और प्रिंसीपल आईटीआई इंदौर के रूप में पदस्थ हैं।

 


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