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भागीरथपुरा त्रासदी और जन-सेवा का 'कैलाश' मॉडल: जब सिस्टम सोया, तब एक जननायक जागा

मध्यप्रदेश            Jan 01, 2026


मल्हार मीडिया भोपाल/ इंदौर

मध्यप्रदेश के इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित जल वितरण से हुई मौतों और बीमारी ने शहर की "स्मार्ट सिटी" छवि पर एक बदनुमा दाग लगा दिया।

जहां एक ओर प्रशासनिक अमला अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ता नजर आया, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि असली जननायक वह है जो प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि पीड़ा देखता है।

इस पूरी घटना का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि यदि विजयवर्गीय समय रहते मोर्चा नहीं संभालते, तो स्थिति अत्यंत भयावह हो सकती थी।

संकटमोचक की भूमिका में कैलाश विजयवर्गीय: त्वरित कार्रवाई और संवेदनशीलता

जिले के प्रभारी मंत्री और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी नदारद थे, लेकिन कैलाश विजयवर्गीय ने अपने पूर्व निर्धारित सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रम तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए। उनका उद्देश्य कोरी संवेदना प्रकट करना नहीं था, बल्कि समाधान देना था।

मैदान में मौजूदगी : विजयवर्गीय ने वातानुकूलित कमरों से निर्देश देने के बजाय प्रभावित क्षेत्र में ही अपना 'अड्डा' जमा लिया। उनकी इस जमीनी सक्रियता ने जनता को कोरोना काल के उस दौर की याद दिला दी, जब वे अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की मदद कर रहे थे।

प्राथमिकता - जीवन रक्षा: उनकी पहली प्राथमिकता जनहानि को रोकना थी। उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए कि कोई भी पीड़ित इलाज से वंचित न रहे। उनकी घोषणा—"सभी प्रभावितों का अच्छे से अच्छा इलाज मुफ्त होगा"—ने गरीब बस्ती के लोगों में आत्मविश्वास जगाया।

दोहरी रणनीति: एक तरफ वे अस्पतालों में जाकर बीमारों की मिजाजपुरसी कर रहे थे और डॉक्टरों का हौसला बढ़ा रहे थे, तो दूसरी तरफ लापरवाही बरतने वाले अफसरों की क्लास भी लगा रहे थे। यह संतुलन ही कुशल प्रशासन की निशानी है।

शोध और जमीनी हकीकत यह बताती है कि इस संकट के समय जिले के प्रभारी जमीन पर नजर नहीं आए। जब जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी, तब शहर की प्रशासनिक कमान जिनके हाथ में है वो चेहरे अदृश्य थे।

अधिकारियों की लापरवाही स्पष्ट थी—दूषित पानी की शिकायतों को समय रहते अनसुना करना ही इस त्रासदी का मुख्य कारण बना। ऐसे में विजयवर्गीय का हस्तक्षेप ही वह ढाल बना जिसने प्रशासन की नाकामी के असर को कुछ हद तक कम किया।

भागीरथपुरा की घटना ने प्रदेश की शासन पद्धति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। यह स्पष्ट है कि वर्तमान में शासन पद्धति 'व्यक्ति केंद्रित' होती जा रही है, जहां शीर्ष नेतृत्व की 'मैं ही सर्वोपरि' वाली शैली ने निचले स्तर पर जनप्रतिनिधियों को लाचार बना दिया है।

  1. बिकाऊ अफसर बनाम जवाबदेह जनप्रतिनिधि:

आज का कड़वा सच यह है कि कई अधिकारी मोटी रकम चुकाकर, 'अभयदान' का पट्टा लेकर कुर्सियों पर बैठते हैं। इन अफसरों का शहर की मिट्टी या जनता के सुख-दुःख से कोई सरोकार नहीं होता। उनका लक्ष्य केवल अपना कार्यकाल पूरा करना और निवेश (रिश्वत) की वसूली करना होता है। उन्हें पता है कि वे खरीदे हुए पद पर हैं, इसलिए उन्हें जनता का डर नहीं है।

इसके विपरीत, एक पार्षद या स्थानीय जनप्रतिनिधि को पांच साल बाद उसी जनता के बीच जाना होता है। रात के अंधेरे में जब कोई दरवाजा खटखटाता है, तो जवाबदेही अफसर की नहीं, पार्षद की होती है। यदि वह जनता के हित में नहीं चीखेगा, तो उसका राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

  1. ध्वस्त होता नियंत्रण:

एक समय था जब पार्षद की एक हुंकार से कमिश्नर और कलेक्टरों की कुर्सियां डोल जाती थीं। जनहित के कार्यों में आनाकानी का मतलब सीधी बर्खास्तगी होता था। लेकिन आज, जब जनप्रतिनिधि इन बाबुओं के आगे असहाय महसूस करते हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि शहर में 'अराजकता का नंगा नाच' शुरू हो चुका है। वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसर जब जमीनी नेताओं के आदेशों को जूते की नोक पर रखने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

सरकार चलाने की शैली में बदलाव की तत्काल आवश्यकता

भागीरथपुरा कांड केवल दूषित पानी की समस्या नहीं है, यह दूषित प्रशासनिक व्यवस्था का परिणाम है। कैलाश विजयवर्गीय ने अपनी तत्परता से स्थिति को संभालकर एक 'रियल हीरो' की भूमिका निभाई है, लेकिन यह घटना एक चेतावनी है।

शीर्ष नेतृत्व को अपनी अहंकारी और केंद्रीयकृत कार्यशैली बदलनी होगी। अफसरों को जनप्रतिनिधियों के अधीन लाना होगा, न कि जनप्रतिनिधियों को अफसरों का मोहताज बनाना होगा।

जब तक "लाचार जनप्रतिनिधि और बिकाऊ अफसर" का समीकरण नहीं टूटेगा, तब तक जनता ऐसे ही पिसती रहेगी। कैलाश विजयवर्गीय की सक्रियता ने दिखा दिया है कि जब नेता मजबूत होता है, तभी प्रशासन घुटनों पर आता है। अब समय है कि इस 'कैलाश मॉडल' को पूरे प्रशासनिक ढांचे में लागू किया जाए ताकि भविष्य में किसी भागीरथपुरा को रोना न पड़े।

 


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